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गोंडवाना की रानी दुर्गावती - भाग 5

गोंडवाना की रानी दुर्गावती - भाग 5

23 जून, 1564 ई.

"नराई नाले का भीषण युद्ध"

रानी ने अपना पड़ाव अपने राज्य के पूर्वी भाग में स्थित नराई में डाला | नराई एक ऐसा मुश्किल स्थान था, जहां पहुंचना और वहां से बाहर निकलना मुगलों के लिए मुश्किल था |

नराई चारों तरफ से ऊंची पहाड़ियों के बीच में स्थित था, जहां एक तरफ गौर नाम की एक नदी बह रही थी व दूसरी तरफ नर्मदा

आसफ खां ने दमोह में पड़ाव डाला और रानी का पता लगाने के लिए फौजी टुकड़ियां भेजी, लेकिन रानी का कोई पता नहीं चल पाया

आसफ खां ने गढ़ कटंगा की बस्तियों को जलाना व लूटमार करना शुरू किया, जिससे रानी का पता लगाने में वो कामयाब रहा

आसफ खां ने खुद ना जाकर अपनी आधी से ज्यादा फौज नायर बहादुर और अक मुहम्मद के नेतृत्व में भेज दी व खुद तोपों के साथ बाद में रवाना हुआ

रानी दुर्गावती के पास इस समय तक 5000 की सेना इकट्ठी हो चुकी थी, जिनमें गौड़, बैस, बाघेला राजपूत, कुछ चुनिंदा राजपूत वीरांगनाएँ व कबीले के आदिवासी सैनिक थे

सामंतों ने सलाह दी कि मुगल फौज इसी और आ रही है, इस खातिर किसी दूसरे स्थान पर चले जाना उचित होगा

रानी ने कहा "विजय या वीरगति"

मुगल फौज नराई से कुछ ही दूर थी, तो रानी ने हाथियों के फौजदार अर्जन दास बैस को लड़ने भेजा, जो कि बड़ी बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए

नराई तक पहुंचने का रास्ता संकरा था

अबुल फज़ल लिखता है "रानी दुर्गावती ने ज़िरहबख़्तर पहना और हाथी पर सवार हुई | रानी ने अपनी फौज से कहा कि जल्दबाज़ी ना करें, जब मुगल फौज संकरे रास्तों से यहां तक आए, उसके बाद हम सब अलग-अलग तरफ से उन पर टूट पड़ेंगे | एक बेहतरीन जंग शुरू हुई और दोनों तरफ से कई लोग मारे गए | 300 मुगल मारे गए और रानी ने इस लड़ाई में जीत हासिल की | रानी ने भगोड़ों का पीछा किया"

(अबुल फज़ल रानी दुर्गावती की बहादुरी का कायल था, ये पहला मौका है जब अबुल फज़ल ने मुगल सेना के लिए 'भगोड़े' जैसा शब्द प्रयुक्त किया)

मुगल फौज भागकर कुछ दूरी पर ठहर गई और अगले दिन फिर हमला करने का विचार किया

रानी दुर्गावती ने अपने साथियों से कहा कि हम आज रात को ही मुगल फौज पर हमला करेंगे, यदि अभी हमला नहीं किया तो कल आसफ खां तोपों के साथ यहां तक आ जाएगा और फिर उन्हें हराना मुश्किल हो जाएगा

रानी के इस प्रस्ताव को अधिकतर साथियों ने खारिज कर दिया, जिस वजह से रानी फिर अपने निवास की तरफ लौट गईं

अबुल फज़ल लिखता है "रानी दुर्गावती के सामंतों में एक भी ऐसा नहीं था, जो रानी की बहादुरी की बराबरी कर सके"

अगले दिन सुबह वही हुआ जो रानी ने सोचा था | आसफ खां के नेतृत्व में तोपों से लैस मुगल फौज ने संकरे पहाड़ी रास्तों पर नाकेबंदी कर दी |

24 जून, 1564 ई.

"रानी दुर्गावती का देहांत"

अबुल फज़ल लिखता है "रानी दुर्गावती अपने बुलंद और उत्सुक हाथी पर बैठी, जो कि उसके सभी जानवरों में सबसे बेहतर था, उसका नाम 'सरमन' था | रानी ने हाथियों को अपने सैनिकों में बांटा और लड़ने को तैयार हुई | मुगल फौज को तीरों और बंदूकों से लेकर खंजर और तलवारों से होने वाले हमलों से बचकर संकरा रास्ता पार करना पड़ा | रानी के बेटे राजा बीर सा ने बड़ी बहादुरी से बर्ताव किया | शम्स खां मियां और मुबारक खां बिलोच ने बहादुरी दिखाई | दिन के तीसरे पहर तक भी लड़ाई चलती रही | राजा बीर सा ने बादशाही फौज को 3 बार खदेड़ा, पर तीसरी बार वह सख्त ज़ख़्मी हुआ | रानी दुर्गावती ने फौरन अपने खास सिपाहियों को भेजा, ताकि उसे लड़ाई से बाहर निकाला जाए | रानी की तरफ से बहुत से बहादुर मारे गए और बीर सा के साथ बहुत से सैनिक लड़ाई छोड़कर निकल गए, जिस वजह से रानी के पास महज़ 300 सैनिक बचे, लेकिन इससे रानी के बर्ताव में कोई कमज़ोरी नहीं आई और वो अपने बचे खुचे बहादुर साथियों के साथ लड़ती रही, तभी एक सख्त तीर रानी की दायीं आंख में लगा और रानी ने बड़ी बहादुरी से बिना घबराए तीर को निकाल फेंका, पर तीर का नुकीला हिस्सा टूट गया और आंख में ही अटक गया | तभी एक और तीर रानी की गर्दन पर लगा, रानी ने इसे भी निकाल फेंका, पर बहुत ज्यादा दर्द के चलते उस पर बेहोशी छाने लगी | रानी ने इस हालत में भी सूझबूझ से काम लिया और अपने हाथी के ठीक आगे वाले हाथी पर सवार आधार को आवाज़ लगाई और कहा कि 'मैंने तुम्हें अपनी सेना में अहम पद पर रखा और वो कर्ज़ चुकाने का दिन आज है, भगवान के लिए मना मत करना क्योंकि मेरे लिए भी इज्जत से मरने का मौका आज ही है, मैं अपने दुश्मनों के हाथों में नहीं पड़ना चाहती, इस खातिर तुम एक वफादार सेवक की तरह अपनी कटार से मुझे ख़त्म कर दो' | उस वफादार आधार ने रानी से कहा कि 'मैं कैसे उन हाथों से आपको मौत दे सकता हूं, जिन हाथों ने हमेशा आपसे तोहफे लिए हैं, मैं आपके लिए इतना जरूर कर सकता हूं कि आपको इस मैदान से ज़िंदा बाहर निकाल सकता हूं, क्योंकि मुझे आपके बुलंद हाथी पर पूरा भरोसा है' | रानी ने ये लफ्ज़ सुने तो गुस्से में आकर आधार को धिक्कार कर कहा कि 'तुमने मेरे लिए इस अपमान को चुना' | रानी ने अपना खंजर निकाला और खुद पर वार करते हुए एक मर्द की तरह ख़त्म हो गई | बादशाही फौज ने एक बड़ी लड़ाई जीत ली | इस जीत से बादशाही फौज को रानी के 1000 हाथी, बहुत सा खज़ाना और सामान वगैरह हाथ लगा"

* रानी दुर्गावती के इतिहास के अगले व अंतिम भाग में नराई नाले के युद्ध में वीरगति पाने वाले योद्धाओं व चौरागढ़ के युद्ध के बारे में लिखा जाएगा

Written by - Tanveer Singh Sarangdevot

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