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Showing posts from August, 2018

मेहरानगढ़_फोर्ट

# मेहरानगढ़_फोर्ट # किला_राठौड़ जोधपुर का मेहरानगढ़ फोर्ट भारत के सबसे विशाल आकार के किलो में से एक है, पहाड़ो की ऊंचाई पर बना यह विशालकाय किला रजपूतो की उन्नति और कला प्रेम का जीता जागता उदाहरण है । यह शानदार किला राव जोधा राठौड़ द्वारा 1459 ईस्वी में बनाया गया था, मेहरानगढ़ किला पहाड़ो की एकदम चोटी पर होने के कारण भारत के सबसे खूबसूरत किलो में से एक है । इस किले में प्रवेश के लिए शानदार गोल घुमावदार रास्ता आज भी पर्यटकों को अचंभित कर देता है मुगल काल मे हुए तोपों से आक्रमण के निशान आज भी इस किले में देखे जा सकते है। इस किले के बायीं तरफ कीरत सिंह सोढ़ा की छतरी है, जो कि एक वीर राजपूत सेनानी थे, इस किले की रक्षा हेतु उन्होंने लड़ते हुए प्राण दे दिए थे । इस किले में कुल सात दरवाजे है, मेहरानगढ़ किले का म्यूजियम भी भारत के सबसे प्रसिद्ध म्यूजियम में से एक है, किले में पुराने शस्त्र, पालकिया वस्त्र आज भी है । इस म्यूजियम में हमे राठौड़ सेना, उनकी पोशाक इन सभी के बारे में भली भांति जानकारी मिल जाती है । इस किले का पूरा श्रेय राठौड़ वंश के राव जोधा को दिया जाता है, 1459 में उन्होंने जोधपुर...

महाराजा_गँगा_सिंह_जी

🚩 महाराजा_गँगा_सिंह_जी 🚩 ✍️ आज श्रीगगांनगर जिले मे जो लोग जीवन जी रहे है बेशक चाहे किसी भी धर्म, मजहब या पंथ के हो वह इन्ही महाराजा_गगां_सिंह_जी कि देन है कितनी सरकारे आएंगी और जाएगीं श्रीगंगानगर (राजस्थान का पंजाब) क्षेत्र के लिए जो काम महाराजा गगांसिह जी कर चूके है उनके नाखून के बराबर काम भी ये सरकारे हमारे लिए नही कर सकती जिस जीवनदायिनी गगंनहर पर वहाँ के सभी लोगो का सारा जीवन निर्भर करता है इन्होंने पंजाब से ऐसे समय मे खरीद कर वहाँ के लोगों के लिए छोड़ दी थी जब कहा जाता था बीकानेर रियासत बंजर है इस बंजर कही जाने वाली रियासत के महाराजा परमपूज्य गगांसिह जी ने 5 नदीयों वाले प्रदेश (पंजाब) से मांग कर पानी नही लिया बल्कि वहाँ के सम्मान के लिए अपनी रजपूती ठाठ से पंजाब को मुँह मांगी कीमत हीरे- जवाहरात, सोना-चांदी, माणिक-पन्ने से पंजाब को लाद-लाद कर भेजे तथा वहाँ के लोगो के लिए जीवनदायिनी गगंनहर उस बंजर धरती पर ला दी ऐसे देवता के उपकार को पूरे भारत की सरकार क्या, वहाँ का सारा इलाका 10 बार जन्म लेकर भी नही उतार सकते है। ✍️ परंतु दुर्भाग्य से अब जब महाराज नहीं रहे, क्षत्रियराज नही ...

जय देव

# MUST_READ_AND_SHARE जय देव !  # धर्मवीर_बाबा_हासिल_देव_जी_की_जय_हो  !  # आज_बाबा_हासिल_देव_जी_की_जयंती_है  , बाबाजी को कोटि कोटि नमन ! जिस तरह जय सिंह खिंची चौहान जी , सिक्ख गुरु जी , बाबा बन्दा बहादुर जी और सम्भाजी महाराज के साथ बर्बरता करके शहीद किया गया था उसी तरह इस वीर राजपूत को शहीद किया गया था ! ये वो  # राजपूत_वीर  थे जिन्होंने शहादत देदी लेकिन सर नहीं झुकाया ! दिल्ली के बादशाह ने उन्हें तसीहें देकर शहीद कर दिया लेकिन बाबाजी बादशाह के आगे झुके नहीं ! राजा हमीर देव जम्वाल का बिक्रमी 1456 से लेकर 1483 तक जम्मू पर राज था ! उनके दो बेटे थे - अजैब देव और हासिल देव ! राजा हमीर के देहांत के बाद उनका बड़ा बेटा अजैब देव राजा बना और कुछ समय बाद राजा अजैब देव के छोटे भाई बाबा हासिल देव जी को जम्मू की रियासत का वज़ीर बना दिया गया ! राजा अजैब देव जी की बिक्रम सम्वत 1514 में मृत्यु हो गई ! राजा का बेटा कुंवर बीरम देव उस समय बोहत छोटे थे ! वज़ीर हासिल देव जी ने अपने भतीजे को पाला और साम्राज्य को चलाने में पूर्ण मदद की , और साफ सुथरे ढंग से राज्ये चलाना सिखाय...

ओ सुनाता हूँ तुम्हे एक गौरव भरी कहानी

आओ सुनाता हूँ तुम्हे एक गौरव भरी कहानी, जिनके कारण मिट्टी भी चंदन है राजस्थानी । यह लगभग 1133 की बात है, कासिम ओर गजनवी उस समय तक भारत को लूट चुके थे, ओर इस्लाम का फंदा भारत के गले मे लटका चुके है । इस बार भारतीयों के सामने चुनोती ऐसी थी, जिससे पार पाना इतना आसान नही था, इस बार शैतान धर्म का चोला ओढ़कर प्रकट हुआ था । सिंध से लेकर आसाम तक कि प्रजा त्राहिमाम त्राहिमाम कर रही थी, यहां तक कि वीरो की भूमि राजस्थान के पुष्कर क्षेत्र तक मातंग यानी मुसलमान बड़ी आबादी में फैल चुके थे, दूसरी ओर बाहरी आक्रमणों का खतरा भी लगातार बना रहता था । स्थिति बड़ी दयनीय थी । लेकिन उस समय अजयराज चौहान और सोम्म्लदेवी के राजमहल में भगवान शिव के रुद्रावतार की तरह एक महापराक्रमी योद्धा ने जन्म लिया, जिसका नाम था अर्णोराज चौहान !! पृथ्वीराज विजय में अर्णोराज चौहान को लेकर कहा गया है - अर्णोराजोथ सादाशिवमनिश मनुध्यायरूपप्रसन्ना दसमात्रेवजन्मयतुलबलमिव प्राप्तपंचाननत्वम् सर्वोवीपुण्डरीप्रकटविद्यटनोन्मत् मातङ्गराज त्रासायाकारअवतार व्यवसितमकरोत पुष्करक्षेत्रम !! जिस समय मानव जीवन और संकट आ खड़ा हुआ था, उस...

राष्ट्रकूट_से_राठौड़

# राष्ट्रकूट_से_राठौड़ राष्ट्रकूट वंश का आरम्भ 'दन्तिदुर्ग' से लगभग 736 ई. में हुआ था। उसने नासिक को अपनी राजधानी बनाया। इसके उपरान्त इन शासकों ने मान्यखेत, (आधुनिक मालखंड) को अपनी राजधानी बनाया। राष्ट्रकूटों ने 736 ई. से 973 ई. तक राज्य किया। राष्ट्रकूट वंशीय शासक शासकों के नाम शासन काल दन्तिदुर्ग (736-756 ई.) कृष्ण प्रथम (756-772 ई.) गोविन्द द्वितीय (773-780 ई.) ध्रुव धारावर्ष (780-793 ई.) गोविन्द तृतीय (793-814 ई.) अमोघवर्ष प्रथम (814-878 ई.) कृष्ण द्वितीय (978-915 ई.) इन्द्र तृतीय (915-917 ई.) अमोघवर्ष द्वितीय (917-918 ई.) गोविन्द चतुर्थ (918-934 ई.) अमोघवर्ष तृतीय (934-939 ई.) कृष्ण तृतीय (939-967 ई.) खोट्टिग अमोघवर्ष (967-972 ई.) कर्क द्वितीय (972-973 ई.) शासन तन्त्र राष्ट्रकूटों ने एक सुव्यवस्थित शासन प्रणाली को जन्म दिया था। प्रशासन राजतन्त्रात्मक था। राजा सर्वोच्च शक्तिमान था। राजपद आनुवंशिक होता था। शासन संचालन के लिए सम्पूर्ण राज्य को राष्ट्रों, विषयों, भूक्तियों तथा ग्रामों में विभाजित किया गया था। राष्ट्र, जिसे 'मण्डल' कहा जाता था, प्रशासन की स...

वीर_बाल_पृथ्वीसिंह🙏

#___वीर_बाल_पृथ्वीसिंह 🙏 औरंगजेब के दरबार में एक शिकारी जंगल से पकड़कर एक बड़ा भारी शेर लाया शेर लोहे के पिंजड़े में बंद था और बार बार दहाड़ रहा था बादशाह कहता था इससे बड़ा भयानक शेर दूसरा नहीं मिल सकता दरबारियों ने हाँ में हाँ मिलायी, लेकिन यसवंत सिंह जी ने कहा-इससे भी अधिक शक्तिशाली शेर मेरे पास है बादशाह को बड़ा क्रोध हुआ उसने कहा तुम अपने शेर को इससे लड़ने को छोडो यदि तुम्हारा शेर हार गया तो तुम्हारा सर काट लिया जायेगा दुसरे दिन किले के मैदान में दो शेरों का मुकाबला देखने बहुत बड़ी भीड़ इकठ्ठा हो गयी औरंगजेब बादशाह भी ठीक समय पर आकर अपने सिंहासन पर बैठ गया राजा जसवन्त सिंह अपने दस वर्ष के पुत्र पृथ्वी सिंह के साथ आये उन्हें देखकर बादशाह ने पूछा आपका शेर कहाँ है यशवंत सिंह बोले मैं अपना शेर अपने साथ लाया हूँ आप लडाई की आज्ञा दीजिये बादशाह की आज्ञा से जंगली शेर को लोहे के बड़े पिंजड़े में छोड़ दिया गया यशवंत सिंह ने अपने पुत्र को उस पिंजड़े में घुस जाने को कहा. बादशाह एवं वहां के लोग हक्के बक्के रह गए किन्तु दस वर्ष का बालक पृथ्वी सिंह पिता को प्रणाम करके हँसते-हँसते शेर के ...

राजा दसरथ

राजा दसरथ ... उनके समय मे उनके जोड़ का योद्धा 3 लोक में नही था । दसरथ साधरण मानव थे, जो राजपूत कुल में पैदा हुए । उन्ही के समय देवताओ तथा असुरो में संघर्ष छिड़ा था, उस युद्ध में देवराज इंद्र जैसे योद्धाओं ने भाग लिया था । लेकिन् देवताओ के बीच भी एक नाम ऐसा उभर कर आया, जिसने अपनी वीरता तथा पराक्रम से देवताओे को भी यह दिखा दिया कि क्षत्रिय धर्म क्या होता । दसरथ के रुद्रावतार के आगे इंद्र के वज्र क ी शक्ति भी फीकी पड़ गयी । असुरो पर विजय में दसरथ का बड़ा हाथ था । दसरथ ने अपनी तलवार से इतिहास नही , बल्कि पहाड़ो को काटकर भूगोल भी बदल लिया । कैकयी से विवाह उसी वीरता की निशानी है । कैकयी श्वेत ऋषिय प्रदेश ( सोवियत रूस ) की थी । भरत शत्रुधन जब ननिहाल जाते है, तो कुत्ते ओर हिरण की बर्फ पर सवारी का बर्णन आता है । यह बर्फ पर कुत्ते हिरण की सवारी केवल रूस में होती है, ओर आज भी होती है ओर यही दसरथ !! अपने पुत्र के प्रेम में क्या से क्या हो गए थे ?? यह होता है पिता का प्रेम  😊

राठौड़__वंश की कुलदेवी : श्री नागणेचियां माता

# राठौड़__वंश  की कुलदेवी : श्री नागणेचियां माता देश के मध्यकालीन इतिहाश में राजपूतो की बड़ी भूमिका रही है। राजपूतो के विभिन कुलो द्वारा विभिन देवियाँ कुलदेविया के रूप में पूजित है। राजपूतो में राठौड़ को न्यारा ही गौरव प्राप्त है शूरवीरता के उन्होंने जो आयाम प्रस्तुत किये, वे देश में ही नहीं दुनिया भर में मिसाल बने। इसीलिए उनका स्थायी विशेक्षण "रणबंका " बना। इन रणबंका राठौड़ो की कुलदेवी " नागणेची " है। देवी का ये " नागणेची " स्वरुप लौकिक है। 'नागाणा ' शब्द के साथ ' ची ' प्रत्यय लगकर ' नागणेची ' शब्द बनता है , किन्तु बोलने की सुविधा के कारण ' नागणेची ' हो गया। ' ची ' प्रत्यय ' का ' का अर्थ देता है। अत : ' नागणेची ' शब्द का अर्थ हुआ - ' नागाणा की ' . इस प्रकार राठोड़ो की इस कुलदेवी का नाम स्थान के साथ जुडा हुआ है। इसीलिए ' नागणेची ' को ' नागाणा री राय ' ( नागाणा की अधिष्ठात्री देवी ) भी कहते है। वैसे राठौड़ो की कुलदेवी होने के कारण ' नागणेची ' 'राटेश्वरी ' भी कहल...

बुंदेलखंड केशरी ,पन्ना रियासत के संस्थापक,

बुंदेलखंड केशरी ,पन्ना रियासत के संस्थापक,  भारत के मध्ययुग के हिंदुत्व रक्षक प्रतापी योद्धा महाराजा छत्रसाल बुंदेला की 369वीं जयंती(4मई 1649ई0) पर सत -सत नमन एवं समर्पित मेरा ये लेख---- हमारी इस पावन पवित्र वीरों के बलिदान की भारत भूमि का इतिहास किसी एक भू -भाग का ऋणी नही है ।प्राचीनकाल में अयोध्या ,मगध ,काशी ,मथुरा ,शक्ति केंद्र रहे तो बाद के वर्षों में उज्जैन ,पाटिलपुत्र शक्ति केंद्र बने ,इसके बाद मध्यकाल में दिल्ली ,कन्नोज ,पाटन फिर मेवाड़ ,मारवाड़ में शक्तिकेंद्रों का उदय हुआ।इसके बाद बुन्देलखण्ड की ताकत ने पुरे देश में स्थान बनाया और बुन्देलखण्ड को यह गौरव दिलाया महाराजाश्रीमान छत्रसाल बुन्देला ने । वीरशिरोमणि छत्रसाल बुन्देला का 17वीं और 18वीं शताबदी में जितने बड़े भू -भाग पर शासन था ,उतना शायद पृथ्वीराज चौहान से लेकर देश आजाद होने तक किसी महाराजा का नहीं रहा जिसका प्रमाण है --इत जमुना उत् नर्मदा ,इत चंबल उत् टौंस । छत्रसाल सों लडन की ,रही न काहू हौंस ।। छत्रसाल बुन्देलकेशरी सच्चे राष्ट्रभक्त योद्धा थे ।महाराजा छत्रसाल के पिता राजा चंपतराय एक वीर और जुझारू राजा थे।उनक...

चलिए_चितोड़गढ_घूमते_है

# चलिए_चितोड़गढ_घूमते_है यह चितौड़गढ़ है, यहां गौरा ओर बादल की गुमटियां भी है, यहां मस्तानो की होली रंग लाया करती थी, यहां परवानो की शमां अपना ह्रदय खाकर जला करती थी , यहां दीवानों की जिंदगी, दीवानी बना करती थी, यहां मतवालों की कहानियां सुनने को मिल जाएगी । मिलकर जीने ओर मिलकर मरने के अरमान यहां बाहें डाल कर साथ चला करते थे । यहां सौभाग्य ओर दुर्भाग्य की आंख मिचौली में, साम्राज्यो के भविष्य डूबते ओर उतराते थे, यहां पराजयों की छाती रौंद विजय उत्सव बनाये जाते थे, भाग्य उपेक्षित होकर ठोकर खाया करता था, यहां देश धर्म और कर्तव्य की बेली पर बलिदानियो के सिर चढ़ा करते थे । ऐसे ही मेलो के दो बांके सपूत गौरा ओर बादल आज भी इतिहास में अमर है । उनकी यादें आज भी पत्थरो से टकराती है, ओर उस बीते हुए काल मे लेजाकर खड़ा कर देती है । आज चारोओर का शांत वातावरण भगवान की इस लीला पर हतप्रभ सा हो गया है, उसे विश्वास ही नही होता, क्षत्रिय अपने अधिकार के लिए लड़ना छोड़ चुके है । कहाँ वो दिन थे, जब युद्ध के नगाड़े बजते ही क्षत्रियः अपने जीवन की की मर्यादा के सारे समंदर पार कर रणखेतो में प्रलय मचा देते थे । ह्रदय...