यह चितौड़गढ़ है, यहां गौरा ओर बादल की गुमटियां भी है, यहां मस्तानो की होली रंग लाया करती थी, यहां परवानो की शमां अपना ह्रदय खाकर जला करती थी , यहां दीवानों की जिंदगी, दीवानी बना करती थी, यहां मतवालों की कहानियां सुनने को मिल जाएगी । मिलकर जीने ओर मिलकर मरने के अरमान यहां बाहें डाल कर साथ चला करते थे । यहां सौभाग्य ओर दुर्भाग्य की आंख मिचौली में, साम्राज्यो के भविष्य डूबते ओर उतराते थे, यहां पराजयों की छाती रौंद विजय उत्सव बनाये जाते थे, भाग्य उपेक्षित होकर ठोकर खाया करता था, यहां देश धर्म और कर्तव्य की बेली पर बलिदानियो के सिर चढ़ा करते थे । ऐसे ही मेलो के दो बांके सपूत गौरा ओर बादल आज भी इतिहास में अमर है । उनकी यादें आज भी पत्थरो से टकराती है, ओर उस बीते हुए काल मे लेजाकर खड़ा कर देती है । आज चारोओर का शांत वातावरण भगवान की इस लीला पर हतप्रभ सा हो गया है, उसे विश्वास ही नही होता, क्षत्रिय अपने अधिकार के लिए लड़ना छोड़ चुके है । कहाँ वो दिन थे, जब युद्ध के नगाड़े बजते ही क्षत्रियः अपने जीवन की की मर्यादा के सारे समंदर पार कर रणखेतो में प्रलय मचा देते थे । ह्रदय की धड़कनों से वैभव और विलास के अरमान आत्महत्या कर लेते थे , ओर मयानो में पदयी तलवारे नए इतिहास का निर्माण करने खींच जाने के लिए तड़प उठती थी, ओर कहाँ आज का यह दिन ?
आज हम समय के पुकार की चीख ही नही सुन पा रहे, आज सूर्य का प्रकाश हमारे जीवन से बुझ सा गया है । आज तो हमारे आंखों में आंसू भी नही बचे, जो इनकी याद में बहाए जा सकें



























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