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जय हो ठाकुर जी की महाराज की शेयर जरूर करे यदुवंशी क्षत्रिय राजपूत(THE REAL YADUVANSHI )


जय हो ठाकुर जी की महाराज की शेयर जरूर करे
यदुवंशी क्षत्रिय राजपूत(THE REAL YADUVANSHI )---------
कृपया इस पोस्ट को पूरा पढ़े और अधिक से अधिक शेयर करें,अगर कोई असहमति अथवा नवीन जानकारी हो तो कमेंट के माध्यम से सभ्य शब्दों में जरुर अवगत कराएं,आपका स्वागत है......
आज हम आपको सच्चे यदुवंशी क्षत्रिय राजपूतो और आजकल छदम यादव उपनाम लिखने वालो के बारे में सटीक जानकारी देंगे।
जब जब धर्म की हानि होती है अधर्म का जोर बढ़ता है तो भगवान नारायण क्षत्रिय वर्ण में अवतार लेकर आतताइयों का संहार करते हैं.क्षत्रियों में सुर्यवंश की रघुवंश शाखा में भगवान श्री राम के रूप में और चन्द्रवंश की यदुवंशी शाखा में योगिराज श्री कृष्ण के रूप में नारायण ने अवतार लिया..........
श्रीकृष्ण अवतार पूर्ण अवतार माना जाता है.श्री कृष्ण ने कंस जैसे अत्याचारी का वध किया और महाभारत के युद्ध में पांड्वो का पक्ष लेकर धर्मयुद्ध में सहायक बने.
श्री कृष्ण के जीवनकाल में ही गांधारी के श्राप से यदुवंश में गृह युद्ध हुआ जिससे यदुवंश का विनाश हो गया.....
श्रीकृष्ण का बाल्यकाल में लालन पालन नन्दबाबा के यहाँ हुआ था,नन्दबाबा गोकुल में अहीरो से कर वसूलने का कार्य करते थे,जबकि श्री कृष्ण यदुवंशी क्षत्रिय थे.....
पर पिछले सौ सालो से सभी अहीरों ने भगवान् श्री कृष्ण से जोड़कर खुद को यादव लिखना शुरू कर दिया है.....पर ये एक ऐसा झूठ है जिसने सच का रूप धारण कर लिया है,
जबकि महाभारत के मुसल पर्व में साफ़ लिखा है कि जब अर्जुन बचे हुए यदुवंशी स्त्री बच्चो को द्वारिका से वापस लेकर आ रहे थे तो मार्ग में उन्हें अभिरो अहीरों ने लूट लिया था।
तभी कहा गया कि
" समय होत बलवान,अभीरन लूटी गोपिका वही अर्जुन ,वही बाण!"।
जिन्होंने यदुवंशी स्त्रियों बच्चो को असहाय स्थिति में लूट लिया था विडम्बना देखिये आज वही अहीर यादव उपनाम लिखने लगे और असली यदुवंशी राजपूतो ने भाटी ,जादौन,जडेजा आदि नये उपनाम धारण कर लिए।
19 वी सदी तक भी अहीर खुद को यादव नही मानते थे।रेवाड़ी के यदुवंशी अहीर खुद को राजपूत ही मानते थे जो पितृ पक्ष की और से यदुवंशी राजपूत थे। पर लगभग सन1920 में अहिरो की सभा हुई जिसके बाद ग्वाल ,गोप,अहर,घोसी,कमरिया अहिरो ने अचानक से यादव उपनाम लिखना शुरू कर दिया।
जबकि गुजरात,महाराष्ट्र के अहीर आज भी खुद को यादव नही लिखते हैं।

शुद्ध रक्त के यदुवंशी क्षत्रिय सिर्फ राजपूतो और मराठो में जादौन, भाटी,जडेजा, चुडासमा,जाधव,छोकर,सलारिया
हैहय,कलचुरी,सरवैया, सैनी असली ,आदि वंशो में मिलते हैं,
इन सब यदुवंशी क्षत्रिय शाखाओ और उनकी रियासतों की पूरी डिटेल हम अलग से दंगे।

श्री कृष्ण जी का छत्र जो आज भी जैसलमेर मे श्री कृष्ण जी वंशज भाटी वंश के राजपूत परिवार पर सुरक्षित रखा हुआ है जो इस बात का सबसे पुख्ता सबूत है कि श्री कृष्ण जी के असली वंशज भाटी है ना कि वो लोग जो तथ्यहीन बाते और लोगो को बरगलाने के स्वघोषित श्री कृष्ण जी के वंशज खुद को बताकर राग अलाप रहे है --!!
हाल ही में गुजरात में न्यायालय द्वारा जाडेजा राजपूतों को श्रीकृष्ण का वंशज होने की मान्यता दी गयी है।

अन्य समाज में यदुवंश या तो राजपूत पुरुषों के उन वर्गों की महिलाओ से अंतरजातीय विवाह से उत्पन्न हुआ है अथवा उन्होंने छदम यदुवंशी का रूप धारण कर लिया है......
कुछ यदुवंशी अंतरजातीय विवाह के कारण जाटों में भी मिल गये हैं,जैसे

भरतपुर का राजवंश--
करौली के जादौन राजपूत बालचंद्र नेे सोरोत गोत्र की जाट कन्या का डोला लूटकर उससे विवाह कर लिया।उसकी संतान जाटों में मिल गयी और उससे उनमे सिनसिनवार वंश चला और भरतपुर की गद्दी की स्थापना की।
पटियाला,नाभा,जीन्द फरीदकोट की जट्ट सिख रियासते----
जैसलमेर के भाटी राजपूत पंजाब 12 वी सदी में पंजाब आये। इनमे से फूल सिंह ने जाट लडकी से शादी की जिनकी सन्तान आज सिद्धू,बराड आदि जट्ट सिख हैं इन्होने वहां पटियाला,नाभा,जीन्द,फरीदकोट आदि रियासत स्थापित की जो आज फूल्किया कहलाती हैं।जो शुद्ध रहे उन्होंने हिमाचल की सिरमौर रियासत स्थापित की।
एनसीआर के भाटी गुज्जर----
जैसलमेर के रावल कासव और रावल मारव बुलंदशहर आये इन्होने यहाँ धूम मानिकपुर रियासत की स्थापना की जिसमे 360 गाँव थे। पर बाद में यहाँ के बहुत से भाटी राजपूत समीपवर्ती गूजरो से शादी विवाह करके गूजरो में शामिल हो गये और आज भाटी गूजर कहलाते हैं।इस इलाके में और समीपवर्ती पलवल में आज भी भाटी राजपूत पाए जाते हैं।

शेरे पंजाब महाराजा रणजीत सिंह----
स्वयं पंजाब के महाराजा रंजीत सिंह जिनके पूर्वज सांसी जाति के थे और बाद में शक्तिशाली होने के कारण इस वंश के साथ दुसरे सिख जाट मिसलदारो ने शादी विवाह किये जिससे यह सांसी जाति से निकलकर जाटों में शामिल हो गये,यह सांसी जाति अपनी उत्पत्ति सांसमल नाम के भाटी राजपूत से मानती है,इनका वंश सांसी जाति से निकलकर जाटों में संधावालिया कहलाया.
इसी तरह पंजाब और हरियाणा का सैनी(शुद्ध सैनी न कि माली) समुदाय भी मूल रूप से मथुरा का यदुवंशी है

इसी प्रकार मुस्लिम मेव जाति में भी यदुवंश पाया जाता है।
भारत में शुद्ध क्षत्रिय राजपूत यदुवंशियों की प्रमुख रियासते करौली,जैसलमेर,कच्छ,भुज राजकोट, जामनगर,सिरमौर,मैसूर आदि हैं.
दक्षिण का विजयनगर साम्राज्य, होयसल,देवगिरी आदि भी यदुवंशियो के बड़े राज्य थे।
पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में भी बड़े बड़े भाटी मुस्लिम राजपूत जमीदार हैं,सिंध में सम्मा,भुट्टो,भुट्टा भी यदुवंशी राजपूत हैं।...
उत्तर पश्चिम भारत के अतिरिक्त महाराष्ट्र में भी मराठा क्षत्रियो में जाधव वंश(यदुवंशी) पाया जाता है.छत्रपति शिवाजी की माता जीजाबाई भी यदुवंशी क्षत्राणी थी,दक्षिण की अर्यासु जाति और राजू जाति में भी यदुवंश मिलता है।

हमारे पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ क्षत्रिय बन्धु अक्सर यदुवंशी राजपूत शब्द पर भ्रमित हो जाते हैं क्योंकि उस इलाके में यदुवंशी राजपूत न के बराबर हैं
 और वो अक्सर अहीर ग्वालों को ही यदुवंशी समझते हैं,

दरअसल श्रीकृष्ण का जन्म यदुवंशी क्षत्रियों में हुआ था,परिस्थितिवश उनका लालन पालन गोकुल में आभीर ग्वालों के बीच हुआ था,जबकि उन ग्वालो का यदुवंश से कोई सम्बन्ध नही था।

श्रीकृष्ण की पत्नी रुक्मणी से प्रधुम्न हुए,प्रधुम्न के अनिरुद्ध और अनिरुद्ध के वज्रनाभ हुए जिनका पांडवो द्वारा इंद्रप्रस्थ की गद्दी पर राज्याभिषेक किया गया,

आज के जादौन, भाटी, जाड़ेजा, चुडासमा, सरवैया, रायजादा,सलारिया, छोकर, जाधव राजपूत ही श्रीकृष्ण के वास्तविक वंशज हैं ।

जैसे यमुना का नाम अपभ्रंश होकर जमुना हो गया इसी तरह आम बोल चाल की भाषा में बृज के यदुवंशी पहले यादव से जादव फिर जादों और जादौन कहलाए जाने लगे,
जबकि भाटी जाड़ेजा आदि यदुवंशी शाखाएं नए वंशनाम से प्रसिद्ध हो गयी,

इसका लाभ उठाकर सन् 1915 में ब्रिटिश काल में अहीर,गोप, ग्वाला, अहर ,कमरिया, घोसी जैसी अलग अलग जातियों ने मिलकर एक संस्था बनाई और मिलकर खुद को यादव घोषित कर दिया ,जबकि उससे पहले किसी रिकॉर्ड अभिलेख में इन अलग अलग जातियो को कभी यादव नही कहा गया न ही ये खुद को यादव कहते थे,

दरअसल आज जो यादव जाति कहलाई जाती है वो कम से कम एक दस बारह अलग अलग जातियों का एक समूह है जिसने महज सौ वर्ष पहले खुद को यादव घोषित कर दिया और एकता के बल पर राजनैतिक ताकत हासिल करके एक झूठ को सत्य के रूप में प्रचारित कर दिया।।
 आज भी इन नकली यादवो की अलग अलग जातियो में आपस में विवाह सम्बन्ध नही होते,सिर्फ राजनैतिक ताकत के लिए ये एकजुट हैं।

सिर्फ हरियाणा रेवाड़ी के अहीर यदुवंशी कहे जा सकते हैं क्योंकि ये खुद को यदुवंशी राजपूतो से अंतर्जातीय विवाह सम्बन्धो द्वारा अहीरों में जाना बताते थे अब ताकतवर होकर वो भी मुकरने लगे हैं

कुछ और तथ्य----------
1---हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह भी यदुवंशी राजपूत हैं

2---परमवीर चक्र विजेता स्वर्गीय मेजर शैतान सिंह भाटी और परमवीर चक्र विजेता स्वर्गीय गुरुबचन सिंह सलारिया यदुवंशी राजपूत थे।।
 विश्व युद्ध में विक्टोरिया क्रॉस जीतने वाले नामदेव जाधव भी यदुवंशी मराठा राजपूत थे ��

3--पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल राहील शरीफ भी यदुवंशी भाटी राजपूत थे।

4--छत्रपति शिवाजी की माता जीजाबाई भी यदुवंशी मराठा राजपूत थी

5--ओलम्पिक में भारत की ओर से पहला व्यक्तिगत पदक जितने वाले पहलवान केडी जादव भी मराठा राजपूत थे,

6--शेरे पंजाब पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह भी यदुवंशी भाटी राजपूतो के वंशज थे,

7--भरतपुर के जाट राजा और पटियाला नाभा जींद कैथल फरीदकोट के जट्ट सिक्ख राजा भी खुद को आज भी यदुवंशी राजपूतो का वंशज मानते हैं जिनके पूर्वज जाट महिलाओ से शादी करके जाट बन गए थे।।

कितनी विडम्बना है कि आज असली यदुवंशियो को कोई नही जानता और फर्जी यदुवंशी सारे देश में सिर्फ सौ सालो के भीतर छदम पहचान से छा गए हैं।

खेर श्री कृष्ण का #क्षत्र आज भी जैसलमेर यदुवंशी भाटी राजपूत रियासत राजघराने मे सुरक्षित रखा है। जो प्रमाण हे श्री कृष्ण का ।

खैर योगीराज श्री कृष्ण ईश्वर का अवतार हैं,उनकी आराधना का अधिकार समस्त सनातन धर्मावलम्बियों को है.....
पर सच क्या है और झूठ क्या है ये सबके सामने आना चाहिए।
सभी यदुवंशी क्षत्रियों राजपूतो मराठों से विनती है कि अपने नाम के आगे शाखा के साथ साथ यदुवंशी जरुर लिखें।
जय श्रीकृष्ण जय राजपुताना जय क्षात्र धर्म, जय यदुवंश

https://www.rajputland.in/

#ҡรɦαƭ૨เყα_૨αʝρµƭ




Comments

  1. यादव योद्धा The Great Yadav Warrior
    कुछ #राजपूत जातियाँ खुद को #यादव वंश से जोड़ने
    का प्रयास कर रही है, परन्तु उनका वैदिक
    क्षत्रियो से कोई सम्बन्ध नहीं है....राजपूत विदेशी है
    जो हुन, कुषाण और कुछ तो फारसी मूल के
    है..जिनका पांचवी शताब्दी के पहले का कोई इतिहास
    नहीं है. कुछ जातिया अपने को यादव कहने पर
    क्यों उतारू है ? समझते है !
    राजस्थान के भाटी, जडेजा और भी दुसरे राजपूत जैसे
    जादौन यादवों में शामिल होने के लिए तड़पते है...ये
    लोग जब भी यादव समाज में बैठते है तो खुद को जी-
    जान से यादव बताते है ..जानते है क्यूँ?
    क्यूँ कि आज भारतवर्ष में एक यादववंश ही ऐसा है
    जिसका प्रमाण कई धार्मिक पुस्तकों में है...गीता और
    विष्णु पुराण तो शुद्ध रूप से यादवो का इतिहास
    है....विष्णु पुराण में तो बाकायदा यादवों को भगवन
    का स्वरुप माना गया है.....अब इतनी इज्ज़त कौन
    नहीं चाहेगा? इसलिए ये लोग हमसे जुड़ने का प्रयास
    करते है.'राजपूत' हून-जाती के है...जिनका 4th-5th
    शताब्दी के पहले का कोई इतिहास और प्रमाण
    ही नहीं है.....यहाँ तक की कुछ बौद्ध धर्म
    की पुस्तकों में इन्हें विदेशी लुटेरा बताया गया है
    जो 5th शताब्दी के आस-पास भारत खंड आये....ये
    किताबे आज भी तिब्बत से चीन तक पढाई जाती है..
    Dr. M.S. Narvane और General V.P. Malik(PVSM,
    AVSM, ADC) ने अपनी किताब ''THE RAJPUTS OF
    RAJPUTANA(A glimpse of medieval
    Rajasthan) में भी इस बात का जिक्र किया है
    की राजपूत विदेशी हून-जाति है है..जो 3rd-4th
    शताब्दी में भारत खंड आये..राजपूत विदेशी हुन, कुषाण
    और कुछ तो फारसी मूल के
    है..जिनका पांचवी शताब्दी के पहले का कोई इतिहास
    नहीं है. सही मायने में देखा जाए तो राजपूतों के वंशज
    तो खून से हिन्दू भी नहीं थे....इसी प्रकार
    अग्निवंशी राजपूतो के बारे में ज्ञात तथ्यों के अनुसार
    ये आदिवासी, जंगली और नीची जाति के थे जिन्हें
    अग्नि द्वारा शुद्ध करके जबरदस्ती क्षत्रिय वर्ण में
    शामिल किया गया..तमाम खोजों और पड़ताल के
    बावजूद आज तक राजपूतों का किसी भी वैदिक जाति से
    कोई सम्बन्ध भी ज्ञात नहीं है....आमेर के राजा ने
    सत्रहवी शताब्दी में झूठी वंशावली तैयार
    करायी..जिसमे एक अँगरेज़ इतिहासकार की मदद
    भी ली गयी...आप समझ ही सकते है की ये
    वंशावलिया कितनी बकवास होंगी..इस बात से
    पीछा छुड़ाने तथा धार्मिक रूप से पुर्ण
    स्वीकारिता के लिए इन राजपूतों को किसी 'वैदिक-
    क्षत्रिय' जाति से जुड़ना होगा....और ये प्रयास कर
    रहे है..यादवो से जुड़ने से सबसे बड़ा फायदा ये है कि ऋग
    वेद से लेकर विष्णु पुराण तक उल्लेख
    हो जायेगा इनका..भाटी, जडेजा और जादौन वंश
    की नीव ही चौथी शताब्दी में पड़ी फिर कैसे ये यादव
    वंश में शामिल करने के लायक है..जबकि हम यादव
    तो सनातन है..युगों से हमारा अस्तित्व है.
    राजपूत शब्द का पुराने ग्रंथो में कहीं भी कोई उल्लेख
    नहीं है , ये शब्द पांचवी शताब्दी के आस -पास
    दिखयी देते है इतिहास में i इनके चारण -
    भाटों की कलम से ये बताया गया है की आबू पर्वत पर
    ब्राह्मणों ने एक यज्ञ किया जिसके फलस्वरूप -
    चोहान , सोंलकी , परमार , चालुक्य आदि चार राजपूत
    हवन कुण्ड से पैदा हुए i अब आप खुद
    ही अंदाज़ा लगा सकते हैं की ब्राह्मणों के
    द्वारा बनाये हुए ये कौन से क्षत्रिय हैं i यहाँ तक
    की द्वापर युग में हुए कुरुक्षेत्र के युद्ध के समय तो इस
    नाम का कोई अस्तित्व ही नहीं था i मुग़ल काल में
    भी अकबर से लेकर अंतिम मुग़ल बादशाह तक , हर मुग़ल
    शासक के हरम में राजपूत कन्याये होती थी और अकबर
    के बाद तक़रीबन सारे बादशाह राजपूत कन्याओ से
    ही पैदा हुए - जहाँगीर , शाहजहाँ , औरंगजेब आदि i
    मुस्लिम काल में हजारों राजपूतो ने इस्लाम स्वीकार
    किया - कायमखानी , खानजादे , मेव ,रांघड , चीता ,
    मेहरात , राजस्थान के रावत जो फिर हिन्दू बन गए
    आदि सब राजपूत मुस्लमान ही तो है
    राजपूतो ने मुगलों को अपनी बेटियाँ-बहने
    ब्याही.....और राजपूत राजाओं ने
    अंग्रेजो को अपना सर्वेसर्वा माना...उनकी गुलामी की और
    अंग्रेजो के फेंके टुकड़ों पर पलते रहे...आप सारे यादवो से
    मेरा सवाल है की क्या ये विदेशी हमारे पवित्र वंश में
    शामिल होने के लायक है..?अगर नहीं तो इस पोस्ट
    को ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिये, जिससे
    पूरी दुनिया इनके षडयंत्र को जान जाए और इन
    विदेशियों की सच्चाई सबके सामने आये.
    (हम अपने इस पेज के माध्यम से सावधान करते है उन
    राजपूतो को जो यदु वंश में शामिल होने की कोशिश
    कर रहे है....जाओ पहले अपना असली इतिहास लाओ
    प्रमाण के साथ फिर यहाँ पर बकैती करो...और हाँ,
    अगर किसी धार्मिक किताब में राजपूत, सिंह, भाटी,
    जडेजा, चौहान, परमार आदि जाति दिख जाए तो तुरंत
    सूचित करो..जरा हम भी तो देखें की हमसे कौन
    सी किताब का कौन सा पन्ना छुट गया

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