(Babu Veer Kunwar Singh) का किला (Jagdishpur Kila)| यह किला जगदीशपुर (Jagdishpur Kila) की अनोठी दास्तान बयां करता है|
भोजपुर (आरा) (Aara, Bihar) जिले के जगदीशपुर में एक मात्र ऐतिहासिक बिहार की धरोहर है बाबू वीर कुंवर सिंह (Babu Veer Kunwar Singh) का किला (Jagdishpur Kila)| यह किला जगदीशपुर (Jagdishpur Kila) की अनोठी दास्तान बयां करता है| जो पुरातत्व विभाग के अधीन हैं| इस किले में ना जाने कितने तोपों, गोलों की मार खाकर आज भी सीना ताने हुए खड़ी है| इस किला पर कई बार अंग्रेज़ सेनानियों ने हमला किया| इस किला ने अपने काल से लेकर अबतक बहुत से बलिदान, जीत, हार देखे होंगे| यह किला भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही और महानायक बाबू वीर कुंवर सिंह का था| वीर कुंवर सिंह (Babu Veer Kunwar Singh) का जन्म 1777 में बिहार के भोजपुर (Aara, Bihar) जिले के जगदीशपुर गांव में हुआ था।
राज्य सरकार ने जगदीशपुर किला को बिहार का धरोहर घोषित किया
बिहार और राज्य सरकार ने बाबू कुंवर सिंह (Babu Veer Kunwar Singh) के संरक्षित धरोहर (Jagdishpur Kila) को अब पर्यटन स्थल और कला संस्कृति विभाग के रूप में विकसित की योजना पर काम शुरू की। अगले माह अप्रैल में इसकी स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी हुए थी।पार्क को 1857 के संग्राम की थीम पर विकसित किया , वहीं किला में बन रहे संग्रहालय में 19वीं सदी के अस्त्र-शस्त्र की प्रदर्शनी लगाई गयी। बाबू कुंवर सिंह (Babu Veer Kunwar Singh) की आदमकद प्रतिमा भी लगी। साथ ही आजादी से जुड़ी उनकी स्मृति शिवपुर गंगा घाट पर उनकी आदम कद प्रतिमा भी स्थापित। राज्य सरकार के कला, संस्कृति एवं युवा विभाग इसे लेकर पहल तेज कर दिया है।
बिहार सरकार पहली बार बाबू कुंवर सिंह (Babu Veer Kunwar Singh) की स्मृति में तीन दिवसीय समारोह 23, 24 और 25 अप्रैल को यह समारोह एक साथ राजधानी पटना और जगदीशपुर में किया गया था। इस दौरान जगदीशपुर में जहां दंगल, कबड्डी समेत खेल के कई आयोजन हुए थे वहीं पटना में बड़े कलाकारों का जमावड़ा लगा । पटना के ज्ञान भवन में व्याख्यान भी हुए था।
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वीर कुंवर सिंह की 80 साल की उम्र में अंग्रेजों के खिलाफ कर दी थी बगावत
अंग्रेजों के खिलाफ 1857 में बगावत कर बिहार के भोजपुर और आरा पर कब्जा करने वाले वीर कुंवर सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायकों में से एक हैं। 80 वर्ष की उम्र में अंग्रजों के खिलाफ तलवार उठाकर उन्हें देश से भगाने के लिए कुंवर सिंर को आज भी याद किया जाता है।
सन 1777 में जन्में कुंवर सिंह जगदीशपुर में जमींदार थे। 80 साल की उम्र में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर दिया था। कुंवर सिंह ने लोगों को जोड़कर बिहार के दानापुर और भोजपुर में हमला कर उन जगहों को अपने कब्जे में ले लिया था। इसके दो दो दिन बाद ही उन्होंने जिले के मुख्यालय आरा पर भी अपना कब्जा जमा लिया। कुवंर सिंह की बहादुरी का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिंदगी के 80वें पड़ाव पर भी उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी मिट्टी को अंग्रेजों से आजाद कराने के लिए अंत तक लड़ते रहे।
अंग्रेजों से लड़ने के लिए कुवंर सिंह के सिपाहियों को गंगा नदीं पार कर के जाना होता था। जब अंग्रेजों को इस बात का पता चला तो उन्होंने नदी में नावों पर हमला करना शुरू कर दिया जिसमें कुंवर सिंह बुरी तरह से घायल हो गए। तब कुंवर सिंह ने घायल हाथ का संक्रमण पूरे शरीर में न फैले, इसके लिए अपनी तलवार से दायां हाथ काट डाला था। कुवंर सिंह ने अपनी अंतिम लड़ाई जगदीशपुर के पास 23 अप्रैल, 1858 में लड़ी। इस लड़ाई में ईस्ट इंडिया कंपनी को हराते हुए कुंवर सिंह ने जगदीशपुर फोर्ट से यूनियन जैक का झंडा उतारकर ही दम लिया।
लड़ाई में बुरी तरह से घायल होने के बाद वो 23 अप्रैल को अपने किले वापस लौट आए और 26 अप्रैल, 1858 को उन्होंने अपनी अंतिम सांसें लीं। कुंवर सिंह की युद्ध नीति ऐसी थी कि अंग्रेज भी चकरा जाते थे। उन्हें छापामार युद्ध नीति में महारत हासिल थी और अंग्रेज भी उनकी नीति को भांप नहीं पाते थे।
उनकी बहादुरी को सलाम करते हुए भारत सरकार ने उनके नाम पर स्टैंप निकाला था। साल 1992 में बिहार सरकार ने आरा में उनके नाम पर विश्वविद्यालय खोला था।

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