Bagore ki Haveli, Udaipur
बागोर की हवेली, उदयपुर
अमर चन्द बड़वा कि मेवाड़ राज्य का एक मंत्री था जिन्होंने १७५१ से १७७८ ईस्वी तक मेवाड़ के मंत्री रहे थे जिसमें महाराणा प्रताप द्वितीय ,अरीसिंह ,राज सिंह द्वितीय और हमीर सिंह राज किया था।
हर मौसम के लिए अलग−अलग रंग में रंगे कक्षों की साफ सफाई एवं मरम्मत से उदयपुर की ढाई सौ साल पुरानी बागोर की हवेली पर्यटकों को खूब लुभाती है। इस हवेली में ऐसे अनेक कक्ष अलग−अलग रंगों में रंगे हैं जिनका उपयोग मौसम के अनुकूल हुआ करता था। इन कक्षों में सुसज्जित वस्त्रों का इस्तेमाल भी उसी के अनुरूप होता था जैसे फागुन माह में फगुनियां एवं श्रावण में लहरियां इत्यादि। इस हवेली में राजा रजवाडे के जमाने के शतरंज, चौपड़, सांप सीढ़ी और गंजीफे आज भी मौजूद हैं जिसका उपयोग राजपरिवार की महिलाएं खेल, व्यायाम तथा मनोरंजन के लिए किया करती थीं। इस हवेली में स्वर्ण तथा अन्य बेशकीमती अलंकारों को रखने के लिए अलग तहखाना बना हुआ था।
ऐतिहासिक बागोर की हवेली में वास्तुकला एवं भित्तिचित्रों को इस तरह से संजोया गया है कि यहां आने वाले देशी, विदेशी पर्यटक इसे देखना नहीं भूलते। खासकर इस ऐतिहासिक हवेली को पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र का मुख्यालय बनाए जाने से यहां की रौनक नए सिरे से बढ़ गई है। इस हवेली का निर्माण वर्ष 1751 से 1781 के बीच मेवाड शासक के तत्कालीन प्रधानमंत्री अमर चन्द्र बडवा की देखरेख में हुआ था। ऐतिहासिक पिछौला झील के किनारे निर्मित इस हवेली में 138 कक्ष, बरामदे एवं झरोखे हैं। इस हवेली के द्वारों पर कांच एवं प्राकृतिक रंगों से चित्रों का संकलन आज भी मनोहारी है। इस हवेली में स्नानघरों की व्यवस्था थी जहां मिट्टी, पीतल, तांबा और कांस्य की कुंडियों में दुग्ध, चंदन और मिश्री का पानी रखा होता था और राज परिवार के लोग पीढ़ी पर बैठकर स्नान किया करते थे।
मेवाड के इतिहास के अनुसार महाराणा शक्ति सिंह ने बागोर की इस हवेली में निवास के दौरान ही त्रिपौलिया पर महल का निर्माण कराया था, जिसका 1878 में विधिवत मुर्हूत हुआ था लेकिन इसके बाद से ही बागोर की हवेली की रौनक कम होने लगी। इतिहास के अनुसार वर्ष 1880 में महाराणा सज्जन सिंह ने बागोर की हवेली का वास्तविक स्वामी अपने पिता महाराणा शक्ति सिंह को घोषित कर दिया, लेकिन ऐसा क्यों किया गया और इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी इसका उल्लेख नहीं किया गया है। बाद में वर्षों तक उत्तराधिकारी के अभाव में यह उपेक्षित रहा। इतिहास के अनुसार वर्ष 1930 से 1955 के बीच महाराणा भूपाल सिंह ने इस हवेली का नए सिरे से जीर्णोद्धार कराकर इसे राज्य की तीसरी श्रेणी का विश्राम गृह घोषित कर दिया। मेवाड रियासत के राजस्थान में विलय के बाद यह हवेली लोक निर्माण विभाग के अधिकार में चली गई।
वर्ष 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सांस्कृतिक विकास के लिए देश में सांस्कृतिक विकास केन्द्रों की स्थापना की और इसी क्रम में पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र का मुख्यालय इस हवेली में बनाया गया। इसके बाद केन्द्र के सौजन्य से इस ऐतिहासिक हवेली की साफ−सफाई एवं नए सिरे से रंग रोगन किया गया। केन्द्र के अधिकारियों ने बताया कि साफ−सफाई के दौरान हवेली के जनाना महल में दो सौ वर्ष पुराने मेवाड शैली के भित्तिचित्र मिले हैं। जो यहां के राजा रजवाड़े के जमाने के रहन सहन एवं ठाट बाट को प्रदर्शित करता है। उन्होंने बताया कि इस हवेली को व्यवस्थित करने में करीब पांच वर्ष लगे। इसके बाद से यहां पर्यटकों की भीड़ जुटने लगी है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक आजादी से पूर्व राजा महाराजाओं के जमाने में यह हवेली अति सुरक्षित क्षेत्र में आती थी और इस इलाके में आम लोगों का प्रवेश पूर्णतः वर्जित था। स्थानीय निवासियों के मुताबिक उनके पूर्वज ऐसा कहा करते थे कि बागोर की हवेली पर्याप्त जल क्षेत्र एवं सुरक्षा की दृष्टि से बनाई गई थी। इसलिए पिछौला झील के किनारे हवेली बनाई गई थी। इस हवेली में राज परिवार को छोड़कर किसी को प्रवेश करने की इजाजत नहीं थी। वैसे अनुमानों के मुताबिक पिछले इस हवेली के प्रति देशी−विदेशी पर्यटकों का आकर्षण बढ़ा है।
संपत्ति 1 9 47 तक मेवार राज्य के कब्जे में रही। स्वतंत्रता के बाद, राजस्थान सरकार ने भवनों का उपयोग किया हाउसिंग सरकारी कर्मचारी, लेकिन, अन्य राष्ट्रीयकृत गुणों के साथ, जहां रखरखाव, क्षति और उपेक्षा के मानकों में निहित रुचि के साथ कोई भी नहीं था, और लगभग चालीस वर्षों तक, हवेली की स्थिति एक अपमानजनक सीमा तक बिगड़ गई। अंततः सरकार को हवेली पर और 1 9 86 में अपने कब्जे को छोड़ने के लिए राजी किया गया; इसे वेस्ट जोन सांस्कृतिक केंद्र में सौंप दिया गया था।
वेस्ट जोन सांस्कृतिक केंद्र ने हवेली को एक संग्रहालय में पुनर्निर्मित करने की योजना बनाई। मूल रूप से, प्रस्तावित संग्रहालय में महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात और राजस्थान, पश्चिम क्षेत्र राज्यों की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करना था। हालांकि, यह देखते हुए कि हवेली विशिष्ट वास्तुकला शैली के कारण स्वयं एक वास्तुशिल्प संग्रहालय था, यह निर्णय लिया गया था कि इसे मेवार की कुलीन संस्कृति के संग्रहालय के रूप में संरक्षित किया जाएगा।
138 कमरे हैं, साथ ही कई गलियारे और बालकनी, आंगन और छतों हैं। हवेली के अंदरूनी भाग जटिल और बढ़िया दर्पण के काम से सजाए गए हैं। हवेली में घूमते समय, आप शाही महिलाओं, उनके स्नान कक्ष, ड्रेसिंग रूम, बिस्तर के कमरे, रहने वाले कमरे, पूजा कक्ष और मनोरंजन कक्ष के निजी क्वार्टर भी देख सकते हैं।
रॉयल लेडीज़ के चैंबर अभी भी मेवाड़ी शैली के अच्छे भित्तिचित्रों को सहन करते हैं और कुछ कमरों में शानदार रंगीन ग्लास खिड़कियां हैं और साथ ही रंगीन ग्लास मोज़ेक के साथ बने दो मोर हैं जो बेहतरीन शिल्प कौशल के शानदार कौशल प्रदर्शित करते हैं।
राजपूत कबीले के अद्वितीय प्रतीकों, जैसे कि आभूषण के बक्से, पासा-खेल, हुक्का, पैन बक्से, अखरोट पटाखे, हाथ प्रशंसकों, गुलाब के पानी के छिड़कने वाले, तांबे के पात्र और अन्य सामान भी यहां प्रदर्शित होते हैं।
शाम को, हवेली हल्के और चरण राजस्थान के पारंपरिक नृत्य और संगीत के सुखद प्रदर्शन। हवेली रात में चमकती रोशनी के साथ अद्भुत लगती है। बागोर की हवेली शाही परिवार की प्राचीन वास्तुकला और जीवन शैली का पता लगाने के लिए एक आदर्श स्थान है।
#कृपया ध्यान दे#
उदयपुर . यह तथ्य गलत है कि पिछोला के पूर्वी किनारे पर बागोर की हवेली मेवाड़ रियासत के प्रधानमंत्री ठाकुर अमरचंद बड़वा ने बनवाई थी।
उदयपुर . यह तथ्य गलत है कि पिछोला के पूर्वी किनारे पर बागोर की हवेली मेवाड़ रियासत के प्रधानमंत्री ठाकुर अमरचंद बड़वा ने बनवाई थी। इसका निर्माण महाराणा संग्राम सिंह ने अपने पुत्र नाथसिंह (1710-1734) के लिए कराया था। पश्चिम सांस्कृतिक केंद्र की वेबसाइट पर और हवेली पर निर्माण के संदर्भ में गलत जानकारी दर्शाई जा रही है।
यह दावा मेवाड़ क्षत्रिय महासभा का है। महासभा संस्थान के संरक्षक मनोहर सिंह थाणा, अध्यक्ष बालू सिंह कानावत, तेज सिंह बांसी, संमन्वयक डॉ. पुष्पेंद्र सिंह ने हवेली पर लगे निर्माण संबंधी सूचना पट्ट और पश्चिमी क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र की वेबसाइट से की जानकारियों को भ्रामक बताते हुए सुधार की मांग की है। प्रो. राणावत का कहना है कि प्राचीन ऐतिहासिक गं्रथ वीर-विनोद में स्पष्ट उल्लेख है कि महाराणा अरिसिंह ने उज्जैन में मराठा युद्ध के बाद ठाकुर अमरचंद को पुन: प्रधानमंत्री बनाने के साथ यह हवेली उनके निवास के लिए दी था। इसका निर्माण महाराणा संग्राम सिंह के समय में पूरा हो चुका था। प्रो. राणावत का कहना है कि प्रधानमंत्री अमरचंद बड़वा उच्च कुलीन सनाढ्य थे। उनका नाम प्रधान अमरचंद सनाढ्य संदर्भित किया जाना चाहिए। ठाकुर कई थे, लेकिन रियासतकाल में प्रधान सिर्फ एक होता था। बड़वा शब्द यशोगान करने वालों के लिए प्रयुक्त होता है। प्रशंसनीय और उच्च व्यक्तित्व प्रधानमंत्री अमरचंद के लिए यह उपाधि उपयुक्त नहीं है।
यह है दावे का आधार
बागोर की हवेली का निर्माण यदि प्रधानमंत्री अमरचंद ने करवाया होता तो इसका नाम बागोर की हवेली की बजाय अमरचंदजी की हवेली या प्रधानजी की हवेली होता। जैसा कि उदयपुर में दूसरी हवेलियों के नाम हैं, जैसे पुरोहितजी की हवेली, कोठारीजी की हवेली, मेहताजी की हवेली आदि। यहां ज्यादातर प्रमुख स्थानों के नाम उनके निर्माणकर्ता से जुड़े हैं।
प्रधानमंत्री को दी गई थी हवेली
1769 में उज्जैन में मराठा सेना से मेवाड़ सेना की हार हुई। महाराणा अरिसिंह को मालूम था कि मराठा सेना मेवाड़ पर आक्रमण करेगी। महाराणा ने अमरचंद सनाढ्य के घर जाकर उन्हें वापस प्रधान बनने के लिए आमंत्रित किया और निवास के लिए प्रतिष्ठित बागोर की हवेली दी थी। इसका निर्माण इससे पहले महाराणा संग्राम सिंह करा चुके थे। हवेली में निवास करते हुए प्रधानमंत्री अमरचंद ने उदयपुर की रक्षा की कमान संभाली थी।
डॉ. पी.एस. राणावत, भू धरोहर समन्यवक
वीर विनोद की जानकारियां विश्वसनीय
वीर विनोद विश्वसनीय ऐतिहासिक ग्रंथ है। इसकी जानकारियों को बतौर प्रमाण स्वीकार किया जा सकता है। बागोर ही हवेली का निर्माण महाराणा संग्राम सिंह ने ही कराया था। प्रधानमंत्री अमरचंद सनाढ्य ब्राह्मण थे, यह तथ्य सही है। पूर्व में ठाकुर शब्द का प्रयोग ब्राह्मणों के लिए किए जाने का प्रचलन रहा है।
डॉ. चंद्रशेखर शर्मा, इतिहासकार, उदयपुर
प्रधानमंत्री को दी गई थी हवेली
1769 में उज्जैन में मराठा सेना से मेवाड़ सेना की हार हुई। महाराणा अरिसिंह को मालूम था कि मराठा सेना मेवाड़ पर आक्रमण करेगी। महाराणा ने अमरचंद सनाढ्य के घर जाकर उन्हें वापस प्रधान बनने के लिए आमंत्रित किया और निवास के लिए प्रतिष्ठित बागोर की हवेली दी थी। इसका निर्माण इससे पहले महाराणा संग्राम सिंह करा चुके थे। हवेली में निवास करते हुए प्रधानमंत्री अमरचंद ने उदयपुर की रक्षा की कमान संभाली थी।
डॉ. पी.एस. राणावत, भू धरोहर समन्यवक
वीर विनोद की जानकारियां विश्वसनीय
वीर विनोद विश्वसनीय ऐतिहासिक ग्रंथ है। इसकी जानकारियों को बतौर प्रमाण स्वीकार किया जा सकता है। बागोर ही हवेली का निर्माण महाराणा संग्राम सिंह ने ही कराया था। प्रधानमंत्री अमरचंद सनाढ्य ब्राह्मण थे, यह तथ्य सही है। पूर्व में ठाकुर शब्द का प्रयोग ब्राह्मणों के लिए किए जाने का प्रचलन रहा है।
डॉ. चंद्रशेखर शर्मा, इतिहासकार, उदयपुर
इतिहास में होना चाहिए उल्लेख
बागोर की हवेली में प्रधानमंत्री अमरचंद का निवास रहा। वह ब्राह्मण थे। यह तथ्य निर्विवाद है। माना भी यही जाता रहा है कि निर्माण प्रधानमंत्री अमरचंद ने करवाया था, लेकिन इसके सभी तथ्यों पर विचार कर वास्तविक निर्माता का इतिहास में उल्लेख होना चाहिए।
प्रो. के.एस. गुप्ता, इतिहासकार


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