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महाराणा प्रताप


#महाराणा #प्रताप

प्रसिद्ध वीर महाराणा प्रताप की वीरता की ख्याति आज पुरे विश्व में अमर है। महाराणा प्रताप वह ऐतिहासिक पात्र है , जिसने असंभव कार्य को भी संभव कर दिखाया। महाराणा प्रताप का जीवन अद्भुत शौर्य , त्याग , बलिदान , निस्वार्थ सेवा तथा सभी देवीय गुणों से परिपूर्ण थे |

जब महाराणा प्रताप गद्दी पर बैठे ही थे , तो उनके पास निरंतर अभाव के अलावा और कुछ नहीं था। चारो और शत्रु थे , और स्वम् के पास भी न तो व्यवस्थित सेना और शाशन। लेकिन इस सब परिस्थितियों से ऊपर उठते हुए महाराणा प्रताप ने हर मैदानों पर विजय ही प्राप्त की। 

९ मई सन १५४० को जयवंता बाई की कोख से उदयसिंह जी महल में एक प्रतापी पुत्र ने जन्म लिया। , इस बालक का नाम उसके मुँह के तेज के अनुसार ही प्रताप ही रखा गया। इसी प्रताप ने विदेशी आक्रांताओ के दांत खट्टे कर दिए थे। उदयसिंह की बड़ी रानी जयवंताबाई एक धर्मपरायण और वीरांगना नारी थी।   
उन्होंने बचपन से ही महाराणा प्रताप को श्री राम और श्री कृष्ण जैसे अलौकिक कार्य करने की शिक्षा दी। अपनी माता द्वारा दी गयी , स्वाभिमान तथा संघर्ष करने की सीख मान महाराणा उसी पथ पर कार्य करने को निकल पड़े, जो पथ स्वम् ईश्वर ने उनके लिए चुना था। 

कुम्भलगढ़ग मे रहकर प्रताप मेवाड़ का राज करने लगे। महाराणा प्रताप को केवल शाशन नहीं करना था , आर्यवर्त के लोग हिन्दू धर्म की रक्षा करने के लिए चितौड़ से बाट देख रहे थे। , सामंतो का विश्वास उनपर लगा था। जगमाल को गद्दी से उतारकर महाराणा प्रताप को महाराणा सामंतो ने ही बनाया था। 

चितोड़ का किला कभी ना झुकने के लिए विख्यात था , और महाराणा प्रताप के शुरुवाती लक्षणों ने बता भी दिया था की अब मेवाड़ का भविष्य क्या है , अकबर के लिए जरुरी था की वह कम से कम एक बार तो महाराणा प्रताप को अपनी शक्ति की धमक दिखा दे। जयपुर के मानसिंह कछवाहा और कई अपने सरदारों से कहा - की यह खबर पुरे भारत में फैला दो , जो मेरी अधीनता स्वीकार करें, उसकी खिदमत करो , और जो मेरे खिलाफ हो , उसे सजा दो। डूंगरपुर का रावल आसकरण एक स्वाभिमान राजपूत शाशक था , उसने मुगलो से डटकर युद्ध लड़ा , दोनों तरफ से खूब सैनिक मरे. इसी फौज के साथ अकबर महाराणा को भी समझाना चाहता था की जब भी अकबर उनके सामने संधि का प्रस्ताव लेकर आएं , महाराणा प्रताप बिना किसी विरोध के उनकी अधीनता स्वीकार कर ले। 

मानसिंह से लेकर उस समय के सभी हिन्दू राजाओ द्वारा प्रताप को समझाया गया की बादशाह की अधीनता स्वीकार कर लेना उचित है। लेकिन महाराणा ने किसी की एक ना मानी।

 महाराणा प्रताप कम जिद तथा जूनून के नेता नहीं थे। हल्दीघाटी की लड़ाई के पहले सारे परिवार के साथ वे इधर उधर भटक रहे थे। एक रात्रि जंगल में किसी कुटिया में राणा प्रताप अपने पुरे परिवार के साथ आराम कर रहे थे , इतने में ही बारिश हो आयी। 

उस समय अमरसिंह के मुँह से निकल गया। . पिताजी यह कष्ट हमे और कब तक भोगने होंगे ?

अपने बेटे की यह बात महाराणा प्रताप को पसंद नहीं आयी , सामंतो को बुलाया और उनसे कहा , इसका सर धड़ से अलग कर दो , आज यह इतनी सी कम उम्र में सुख के लिए इतना लालायित है , तो आगे चलकर यह इन्ही सुखो के लिए मुगलो की गुलामी भी कर सकता था , उनकी दी हुई पाघ लपेट सकता है ,उनके दिए हुए वस्त्र पहन सकता है। यह मामूली से सुख के लिए हमारे कुल को दाग लगा देगा। इस तरह के दृढ़ निश्चय के साथ महाराणा प्रताप अपना जीवन जी रहे है। महाराणा प्रताप का नाम हिन्दू मुस्लिम एकता के गाने बाजे के साथ लेने की आवयश्कता ही नहीं है, महाराणा प्रताप अपने धर्म को लेकर शत प्रतिशत कट्टर थे , यहाँ तक की उन्होंने अपने आसपास के क्षेत्रों में सभी जमीदारो और साहूकारों को साफ़ सन्देश दे रखा था , मुसलमानो को जोतने के लिए खेत नहीं दिया जाए , और उनकी किसी भी प्रकार की सहायता ना की जाए। 

एकबार किसी किसान ने अपना ऊंट मुस्लमान को दे दिया था , खेत जोतने के लिए , महाराणा प्रताप ने रात में ही पहुंचकर उस किसान का सर धड़ से अलग के दिया था। 

महाराणा प्रताप जब कुम्भलगढ़ के राजा बने ही थे , की अकबर ने उनपर पहला हमला करवा दिया था। यह आक्रमण करवाने के दो कारण ही थे , एक तो भारत का इस्लामीकरण , महाराणा प्रताप के मस्तिक को झुकाना। महाराणा प्रताप पर हमला भी किया गया , लेकिन मुगलो को उसके तक़डी मार ही मिली। इसी पराजय के बाद ही अकबर सम्भवतः कुम्भलगढ़ आया था , जहाँ महाराणा प्रताप से उसकी तक़रार इतनी बढ़ गयी की , उस तक़रीर ने फिर हल्दीघाटी युद्ध की शक्ल ही लेली। 

इस विवाद की कथा कुछ इस तरह पेश की जाती है। की मानसिंह महाराणा प्रताप से संधि पत्र पर हस्ताक्षर करवाने , या संधि का प्रस्ताव लेकर कुम्भलगढ़ आया था। यहाँ मानसिंह का खूब आवभगत हुआ , लेकिन रात्रि में भोजन करते समय बात बिगड़ गयी। महाराणा प्रताप ने बहाना बनाकर मानसिंह के साथ भोजन करने से मना कर दिया , उसके बाद महाराणा प्रताप के पुत्र अमरसिंह ने भी मुगलो को कन्या ब्याहने को लेकर मानसिंह को ताना दे दिया , और उसके बाद बात बढ़ गयी। उसके बाद घटना में लिखा आता है , जहाँ मानसिंह खड़ा हुआ था , गंगाजल छिड़ककर वह स्थान पवित्र किया गया , और जिन सोने चांदी के बर्तनो में मानसिंह को भोजन करवाया गया , वह बर्तन भी फेंक दिए गए। 

व्यवहारिक होकर अगर हम ज़रा सा सोचे , तो हमे ज्ञात हो जाएगा , की यह इतिहास ही झूठ है , इस इतिहास में व्यक्ति का नाम बदल दिया गया है। सबसे पहली बार , मान , मर्यादा के लिए विख्यात राजपूत ,, क्या कभी किसी भी मेहमान का अपमान कर सकते थे ? और जब राजपूत कन्या मुगलो को ब्याही ही नहीं गयी थी , तो अमरसिंह भला ऐसे ताने क्यों देते ? लेकिन अगर हम यह मानकर चले की यह घटना अकबर के साथ किसी और स्थान पर गठित हुई है , तो यह घटना ज़्यादा सत्य प्रतीत होती है। महाराणा प्रताप ने सिरदर्द का बहाना निकालकर अकबर के साथ भोजन करने से मना कर दिया था , और यही उसके बाद अमरसिंह ने किया , एक गोभक्षी के साथ भोजन भला कौन सकता है ? ना तो महाराणा प्रताप ने अकबर के साथ भोजन किया , और ना महाराणा अमरसिंह ने। और तो ओर मानसिंह के खाये हुए बर्तन फिंकवा दिए , और उस स्थान को गंगाजल से पवित्र करवाया गया , तो स्पष्ट हो जाता है , यहाँ मानसिंह के स्थान पर अकबर नाम होना चाहिए। यहाँ अंग्रेजो के काल में , या इन्ही ७० सालो में , अकबर के स्थान पर मानसिंह लिखकर पूरा इतिहास ही बदल दिया है। जिस समय महाराणा प्रताप के पास मानसिंह संधि का प्रस्तावपत्र लेकर आये थे , उस्समय उनकी आयु बहुत कम थी , यह व्यवहार और यह अपमान अकबर का हुआ था। मानसिंह का नहीं , और उसी अपमान के कारण अकबर ने एक विशाल सेना मेवाड़ की और भेज दी थी। 

अकबर और महाराणा प्रताप के बिच उसी अपमान के कारण शुरू हुआ हल्दीघाटी युद्ध , और दरअसल अपमान भी एक बहाना था , अकबर का असली उदेश्य भारत का इस्लामीकरण कर देना था। हल्दीघाटी की लड़ाई राजपूतो का अस्तित्व खत्म कर देने की लड़ाई ही थी , ना तो महाराणा प्रताप सर झुकाने को तैयार थे , और ना अकबर अपनी जिद पूरी करने से पहले रुकने वाला था। इस लड़ाई में जान सस्ती और इज्जत महंगी थी। महाराणा प्रताप का लश्कर अकबर के लश्कर पर टूट पड़ा। बादशाह के सैनिक महाराणा के आगे पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए महाराणा प्रताप का एक तीर तो अकबर के भागते हुए सेनापति शेख मंसूर के कूल्हे पर लगा था। काजी खान नाम का एक दूसरा अफसर कुछ देर महाराणा प्रताप के आगे आकर खड़ा हुआ , उसकी भी पांचो अंगुलिया महाराणा ने काट डाली। महाराणा प्रताप की हरावल सेना ने अकबर की हरावल सेना को कुचल कर रख दिया था। फौजे तो फौजे , दोनों सेनाओ इ हाथी तक आपस में लड़ मरे। महाराणा की सेना का हाथी रामप्रसाद अंतिम समय तक लड़ता रहा , जब तक गोलियां मार मार कर उसे धराशाही नहीं कर दिया था। 

महाराणा प्रताप की हरावल सेना ने अकबर की सेना को पिट कर रख दिया था। अकबर इस युद्ध में पूरी शक्ति के साथ नहीं आ पाया था , क्यों की उसी समय बंगाल और पंजाब का विद्रोह हुआ , इस युद्ध में बहलोल खान नाम का अकबर का एक मुख्य सरदार था , उसे महाराणा प्रताप ने एक ही वार में घोड़े समेत मार डाला था , इस घटना का जिक्र वीर विनोद भी करती है। महाराणा प्रताप के हांथी रामप्रसाद को गोली लग गयी थी , इस कारण उन्हें घोड़े पर आ जाना पड़ा , अकबर की सेना का एक बड़ा सेनापति था कांजी खान। इसने महाराणा प्रताप के विरुद्ध तलवार उठाने की सोची ही थी , की इसकी कलाई हाथ से अलग थी , अब हाथ कभी तलवार चलाने के काबिल नहीं रहा। 

मौलवी अब्दुल कादिर जो इस लड़ाई का प्रत्यक्ष दर्शी था , वह मुसलमान होते हुए भी एक बात तो सच लिख ही देता है " अकबर की शाही सेना , महाराणा प्रताप की हरावल सेना ने ५-६ कोस पीछे हो गयी। महाराणा प्रताप ने घोड़े से बैठकर ही मुग़ल अधिकारी / अकबर पर ऐसा प्रहार किया था , की महावत के प्राण निकल गए , और महाराणा वापस लौट गए। वीर राजपूतो की सेना ने मल्लेछ सेना को खदेड़ खदेड़ कर मारना शुरू किया , सौभाग्य से हल्दीघाटी के युद्ध तक महाराणा प्रताप के दूसरे भाई शक्तिसिंह की महाराणा प्रताप की तरफ ही आ गए थे। मेवाड़ की परमवीर सेना " शक्तावत " शक्तिसिंह की ही वंशज है।

मेवाड़ के वीर राजपूतो में मुगलो को सेना को गाजर मूली की तरह काट काट कर फेंकना शुरू किया। अकबर खुद कहता है , उसके बाद हम पहाड़ के रास्ते अजमेर की और निकले। अब भला यह सोचने की , और व्यवहारिक सी बात है , भला विजयी सेना पहाड़ो से छुपते हुए क्यों निकलेगी ?

हल्दीघाटी के इस महासमर में अकबर के पास कुल ४५००० सैनिक थे, और महाराणा प्रताप के पास लगभग २०००० सैनिक। हल्दीघाटी के युद्ध में , महाराणा प्रताप के लगभग ७००० जवान काम आये थे. अकबर से खुद के समेत गिनती के सैनिक ज़िंदा रहे। अकबर का चापलूस इतिहस्कार अबुल फजल लिखता है , ज़्यादा गर्मी होने की वजह से शाही सेना ने महाराणा प्रताप की सेना का पीछा नहीं किया , भला अकबर ने युद्ध से पूर्व ही गर्मी - सर्दी का ख्याल क्यों नहीं क्र लिया था ? इतिहास में यह साफ़ क्यों नहीं लिखता की यहाँ राजपूतो से उसे भयंकर मार पड़ी थी। 

हल्दीघाटी के युद्ध के बाद अकबर कुछ समय के लिए लाहौर भाग गया था , यह लाहिर भागने का कारण यही था , की महाराणा प्रताप की बढ़ती शक्ति उसे सताने लगी थी। 

महाराणा प्रताप बहुत ही ज़्यादा आधुनिक विचारो वाले नेता थे। वे खास रूप से यह बात समझ चुके थे , मेवाड़ में , दुर्गो मैं निवास कर मेवाड़ की जनता को , और मातृभूमि को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता , अगर मल्लेछों का पूर्ण नाश करना है , तो किलो का मोह त्याग कर जंगलो , पहाड़ो में ही भटकना होगा। शुरुवात की कुछ विजय मिलने के बाद भी वे अपनी सुरक्षा को लेकर आस्वस्त नहीं थे , वे जानते थे , शत्रु किसी भी समय प्रहार कर सकता है। यही हुआ , अकबर फिर से मेवाड़ पर चढ़ आया था , महाराणा प्रताप ने अपनी सेना की एक टुकड़ी ईडर की और अकबर की सेना को रोकने के लिए भेजी ,

इसके बाद क्या हुआ ?? उसके नामपर यही पढ़ने को मिलता है , की अकबर लाहौर चला गया। इतिहासकार यह सच्चाई नहीं लिखते , की अकबर बड़ी बुरी मार खाकर लाहौर गया था। उसके बाद भी अकबर जितने दिन जीते रहा , वह राजपूतो पर हमले करवाते ही रहा। 

हल्दीघाटी का युद्ध महाराणा ने ही जीता था , अगर न जीते होते , तो आज राजस्थान पाकिस्तान में होता , सत्य यही है। महाराणा प्रताप ने प्रत्येक युद्ध में अकबर को परास्त किया था , मुग़ल साम्राज्य की कब्र , महाराणा प्रताप ने ही खोदनी शुरू की थी , और आगे चलकर वीर राजपूतो ने इन्हे केवल पुरानी दिल्ली तक समेट कर रख दिया। पूर्व के राजपूतो ने जो गलतिया की थी , की जीत के बाद वे जरूरत से ज़्यादा निश्चिंत हो गए , और अपना नाश करवा बैठे, महाराणा प्रताप ने वैसा नहीं किया था। 

हल्दीघाटी के युद्ध के बाद अकबर कुछ समय के लिए लाहौर भाग गया था , यह लाहिर भागने का कारण यही था , की महाराणा प्रताप की बढ़ती शक्ति उसे सताने लगी थी। 

महाराणा प्रताप बहुत ही ज़्यादा आधुनिक विचारो वाले नेता थे। वे खास रूप से यह बात समझ चुके थे , मेवाड़ में , दुर्गो मैं निवास कर मेवाड़ की जनता को , और मातृभूमि को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता , अगर मल्लेछों का पूर्ण नाश करना है , तो किलो का मोह त्याग कर जंगलो , पहाड़ो में ही भटकना होगा। शुरुवात की कुछ विजय मिलने के बाद भी वे अपनी सुरक्षा को लेकर आस्वस्त नहीं थे , वे जानते थे , शत्रु किसी भी समय प्रहार कर सकता है। यही हुआ , अकबर फिर से मेवाड़ पर चढ़ आया था , महाराणा प्रताप ने अपनी सेना की एक टुकड़ी ईडर की और अकबर की सेना को रोकने के लिए भेजी ,

इसके बाद क्या हुआ ?? उसके नामपर यही पढ़ने को मिलता है , की अकबर लाहौर चला गया। इतिहासकार यह सच्चाई नहीं लिखते , की अकबर बड़ी बुरी मार खाकर लाहौर गया था। उसके बाद भी अकबर जितने दिन जीते रहा , वह राजपूतो पर हमले करवाते ही रहा। 

हल्दीघाटी का युद्ध महाराणा ने ही जीता था , अगर न जीते होते , तो आज राजस्थान पाकिस्तान में होता , सत्य यही है। महाराणा प्रताप ने प्रत्येक युद्ध में अकबर को परास्त किया था , मुग़ल साम्राज्य की कब्र , महाराणा प्रताप ने ही खोदनी शुरू की थी , और आगे चलकर वीर राजपूतो ने इन्हे केवल पुरानी दिल्ली तक समेट कर रख दिया। पूर्व के राजपूतो ने जो गलतिया की थी , की जीत के बाद वे जरूरत से ज़्यादा निश्चिंत हो गए , और अपना नाश करवा बैठे, महाराणा प्रताप ने वैसा नहीं किया था। 

महाराणा प्रताप के राजतिलक के समय मेवाड़ के हालत यह थे , की अकबर ने जहाँ तहाँ मुग़ल थाने बैठा रखे थे। और प्रत्येक थानों में पांच से दस हजार सैनिक हुआ करते थे। मुगलो से निपटना तो बाद की बात थी , पहले इन थानों को ठिकाने लगाना ज़्यादा जरुरी था , और महाराणा प्रताप ने वहीँ काम किया , एक एक कर सभी मुग़ल थानों को बर्बाद करवाया। महाराणा प्रताप की निरंतर सफलता देख बांसवाड़ा और डूंगरपुर जैसी कई रियासते उनके साथ आ खड़ी हुई थी, तथा बाकी सारे राजघराने भी लगभग प्रत्यक्ष , या अप्रत्यक्ष रूप से महाराणा प्रताप के साथ ही थे। महाराणा प्रताप ने अकबर के मांड़वगढ , मोहि , मदारिया आदि किलो को भी पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। 

महाराणा प्रताप को जिस तरह आज हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक लोग मानते है , ऐसा बिलकुल नहीं है , महाराणा प्रताप ने इन मुसलमानो को सदैव विदेशी ही कहा। महाराणा प्रताप ने सभी राजाओ , जमींदारों , खेत किसानो और आम लोगो तक यह खबर पहुंचा दी गयी की कोई भी मुसलमानो का खेत ना जोते , और ना अपना खेत या अपनी भूमि उन्हें खेती करने के लिए दे , अगर कोई ऐसा करता है , तो उसका शीश में खूद धड़ से अलग कर दूंगा। इतनी कड़ी चेतावनी के बाद भी किसी चरवाहे ने अपने ऊंट से मल्लेछ का खेत जोत दिया था , महाराणा प्रताप ने रात्रि में जाकर ही उसका वध कर दिया। 

महाराणा प्रताप का निश्च्य चमत्कारी रूप से दृढ था , अपने [परिवार के साथ महलो से दूर भटक रहे थे , एक रात जंगल में विश्राम के समय आँख लगी ही थी बारिश आ गयी , उस समय नन्हे से बालक अमर सिंह बोल पड़े , पिताश्री हम कब तक इसी प्रकार कष्ट झेलते रहेंगे ?

महाराणा प्रताप ने अपने सामंत से कहा, इसे मेरी नजरो से दूर ले जाओ, और इसका सर अलग कर दो। आज इतनी सी उम्र में यह सुखो के लिए इतना लालियत है , तो कल यह सुखो के लिए मुगलो की पाघ लपेटेगा। अपने मामूली सुखो के लिए , यह हमारे धर्म पर कलंक लगावेगा। 
 अपने पिता के मुख से यह वचन सुनकर अमरसिंह बहुत शर्मिंदा हुआ थे। अपने पिता को उसी क्षण वचन दिया था। की वे कभी मुसलमानो के आगे अपना शीश नहीं झुकायेंगे। अजमेर को छोड़ सारे मुग़लथाने महाराणा प्रताप ने राजस्थानसे हटवा दिए। 

महाराणा प्रताप की इन सभी विजयो में भामशाह का भी बड़ा योगदान था , महाराणा प्रताप के पूर्वज अपना धन भामाशाह इन्ही के यहाँ संग्रहित करते थे अपना धन महाराणा प्रताप के पूर्वज , और जरूरत पड़ने पर महाराणा प्रताप को वह धन सुरक्षित मिल गया था। 
हल्दीघाटी युद्ध के बाद २० साल तक महाराणा प्रताप स्वतंत्र शाशन करते रहें। 

महाराणा प्रताप जितने दिन जीवित थे , मेवाड़ की रक्षा ईश्वर के हाथों में थी , महाराणा प्रताप की मृत्यु के बाद उनके पुत्र अमरसिंह मेवाड़ की गद्दी पर विराजमान हुए। हिन्दू धर्म की रक्षा तथा कुल की मान मर्यादा बचने का दायत्व अब महाराणा अमरसिंह जी का था

महाराणा अमरसिंह का राज्याभिषेक २९ जनवरी १५९७ को हुआ , मेवाड़ की गद्दी पर बैठते ही उन्हें अपना वह वचन याद आया , जो उन्होंने अपने पिता की दिया था। वचन था " किसी भी विदेशी के आगे , कभी अपना शीश ना झुकाने का वचन। 

महाराणा प्रताप की मृत्यु हुई , तो दरबारियों में इनाम पाने के लालच में होड़ मच गयी की , पहले महाराणा के मौत की खबर अकबर को कौन सुनाये , लेकिन जब अकबर के पास खबर पहुंची की , महाराणा प्रताप अब नहीं रहे , तो अकबर ज़रा सा भी खुश नहीं हुआ। अकबर को महाराणा की मृत्यु का दुःख नहीं था , अकबर को बस इस बात की टिस हमेशा हमेश के लिए रह गयी , की वह महाराणा प्रताप को कभी परास्त नहीं कर पाया। महाराणा की मृत्यु पर अकबर के मुँह से अवाक ही निकला। 

उसने कभी अपने घोड़े पर मुहर नहीं लगवाई , उसने कभी हमारी पाघ नहीं पहनी , वह नो रोज के जलसे में कभी नहीं गया। वह कभी झरोखे के निचे नहीं आया , वह जितने जिया , उसने हमेशा मुगलो का मानमर्दन किया। उसके बाद अकबर ने लम्बी साँसे ली। महाराणा प्रताप को पराजित कर पाने का उसका स्वपन , स्वपन बनकर ही रह गया था। लेकिन अकबर की शत्रुता भाव में कोई कमी नहीं आयी , महाराणा प्रताप को ना सही ,अमरसिंह को झुकाकर ही अकबर अपने कलेजे को कुछ तो ठंडक देना चाहता था। अमर सिंह के राजयभिषेक होते ही , अकबर की मुग़ल देना , राजपूतो के दरवाजे पर आ खड़ी हुई। उस दिन विजयादशमी का दिन था। 
त्योहार के दिन जब एक विशाल सेना राजपूताने की दहलीज पर आकर खड़ी हो गयी, तो अमरसिंह घबरा गए, उनकी घबराहट देखकर सामन्तो ओर सरदारों को बड़ा असंतोष हुआ ।

अमरसिंहः के मुख का भय देखकर सम्बुक का एक सरदार क्रोध से तिलमिला गया, उसने अमरसिंहः से कहा -

" आप जानते भी है आप कौन है ? आप वीरो के वीर सिसोदिया वंशी महाराणा प्रताप के ज्येष्ठ पुत्र है । आपने तो अपने पिता का संघर्ष अपनी आंखों से देखा है । अपने वंश, सनातन ओर अपनी आन-बान - शान के लिए ना जाने कितने राजपूतो ने बलिदान दिए है। मल्लेछ सिर पर आ बेठे है, ओर आप शांत बेठे है।

अमर सिंहः से इस बात का कोई जवाब नही दिया, वे शांत रहे ।

अमरसिंहः की चुप्पी से सम्बुक सरदार का पारा दुगना चढ़ गया, उसने सभी सामन्त सरदारों से कहा, युद्ध की तैयारी करो साथियों .... मेवाड़ के इस कलंक की रक्षा करने हमे रणभूमि पर भी जाना है "

राणा के यह वचन सुनकर अमरसिंहः के आंखों में बिजली चमक उठी ।उन्होंने तुरंत अपनी म्यान से तलवार निकाली और घोषणा कर दी, की एक भी मल्लेछ वापस जीवित ना लौट पाए ।

मुगल सेना देवीर नाम के स्थान पर अपना पड़ाव डाले हुए थी ।

    "विजयादशमी के मौके को,
     राणा ने तलवारें खींची |
     चढ़ दिवेर की घाटी को,
     मुगलों के रक्त से सींची ||"

विजयादशमी का दिन था, राजपूत योद्धाओं ने शस्त्र पूजन कर दिवेर घाटी के पूर्व सिरे पर जहां मुगल सेना पड़ाव डाले पड़ी थी, वहीं हमला कर दिया। दिवेर की सामरिक स्थिति का आंकलन कर प्रताप ने शाहबाज खान द्वारा हस्तगत मेवाड़ की मुक्ति का अभियान यहां से प्रारंभ किया। इस युद्ध में अमरसिंह, भामाशाह, चुंडावत, शक्तावत, सोलंकी, पडिहार, रावत आदि राजपूतों तथा भील सैनिकों से युक्त पराक्रम सेना के साथ दिवेर पर आक्रमण किया। मेवाड़ी सेना के आने की सूचना मिलते ही सुल्तान खान युद्ध के लिए सामने आया तथा उसने आस पास के मुगल थानों में भी खबर भेज दी। वहां 14 मुगल सरदार दिवेर युद्ध में मुगलों की सहायता के लिए पहुंचे। मेवाड़ तथा मुगल सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ। सुल्तान खान हाथी पर बैठा अपनी सेना का संचालन कर रहा था। अमरसिंहः के एक सैनिक सोलंकी भृत्य पडिहार ने तलवार के वार से हाथी के अगले पैर काट डाले तथा प्रताप ने हाथी के मस्तक को भाले से फोड़ दिया। हाथी गिर पड़ा एवं सुल्तान खान को हाथी छोडऩा पड़ा और वह घोड़े पर बैठकर लडऩे लगा। उसका सामना अमरसिंह से हुआ। अमरसिंह ने भाले से इतना जोरदार वार किया कि एक ही वार में सुल्तान खान के, उसके घोड़े के तथा उसके टोप बख्तर को एक साथ भाले में पिरो दिया। इसके बाद सभी थाने व चौकियों से बचे खुचे मुगल पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए. इस पराजय से पूरी दिल्ली हिल गयी

महाराणा अमरसिंह के प्रमुख विजयो में एक विजय उंताले दुर्ग की विजय भी है , पूरी घटना दरअसल यह है , की महाराणा अमरसिंह की सेना में हरावल सेना का भारत चुण्डावत सेनिको को मिला हुआ था। हरावल सेना युद्ध में अग्रिम पंक्ति की सेना को कहते थे , उनके पीछे की सेना में शक्तावत खड़े होते थे। चुण्डावत इसी बात को लेकर शक्तावतों से मज़ाक करते। महाराणा अमरसिंह ने घोषणा कर दी उतावा के दुर्ग के ऊपर पहले जो मेवाड़ का ध्वज फहराएगा , आगे से हरावल सेना का भार उसी के पास रहेगा ,

यह सुनते ही बल्लू जी शक्तावत दुर्ग के मुख्यद्वार की और दौड़े , और जेतसिंह चूंडावत , जो दुर्ग द्वार के दिवार की और दौड़े। बल्लुजी शक्तावत ने अपने महावत से कहा , हाथी के प्रहारों से मुख्य दरवाजा तोड़ दो, किन्तु द्वार पर तीक्षण भाले लगे होने की वजह से हाथी दुर्गद्वार पर वार नहीं कर पा रहा था। बल्लू जी शक्तावत गेट के आगे चिपककर खड़े हो गए , और महावत को आदेश दिया , की अब करवा हाथी से प्रहार।
महावत ने कहा , मैं यह नहीं कर सकता हुकुम।
बल्लू जी शक्तावत ने कहा , ऐसा ही कर , नहीं तो मै तुम्हे मार डालूंगा। 
महावत ने वैसा ही किया , बल्लू जी शक्तावत के शरीर के चीथड़े चीथड़े हो गए। वहीँ दूसरी और जेतसिंह चुण्डावत भी दुर्ग दिवार पर चढ़ चुके थे। लेकिन मुग़ल सेना की एक गोली इनकी छाती पर आकर लगी , और वे धड़ाम नीचे आ गिरे। निचे गिरते ही उन्होंने आदेश दिया ,की मेरा गला काट दुर्ग में अंदर फेंक दिया जाए। राजपूत सरदारों ने वैसा ही किया। शक्तावत दुर्ग का द्वार तोड़कर ध्वज फहराते , चुण्डावत यह पहले ही कर चुके थे , हरावल सेना का ओहदा चुंडावतों के पास ही रहा। 

इन्ही राजपूतो को जहांगीर की कायर सेना हराना चाहती थी । लगातार हारने के बाद भी जहांगीर को अक्ल ना आई, ओर एक आक्रमण अपने पुत्र परवेज के नेतृत्व में मेवाड़ पर करवा दिया । इस युद्ध में फिर राजपूतो की तलवारे चमकी, ओर कुछ ही समय मे मुसलमान सैनिक नामशेष हो गए, परवेज खुद अपनी जान बड़ी मुश्किल से बचा पाया ।

एक बार फिर लुटेरी सेना का गठन हुआ, परवेज के दुस्ट पुत्र महावत खान जो कि डकैती के काम मे पीएचडी था, उसके नेतृत्व में सेना भेजी गई, वह भी बेचारा अपनी सेना के साथ मारा गया ।

जहांगीर ने अंतिम बार खुर्रम को भेजा , इस दुस्ट ने सेना से युद्ध ना करते हुए, निहत्थे ग्रामीणों पर धावा बोल दिया । बहुत पशुधन , सोने चांदी, ओर हिन्दू स्त्रियों को लेकर वह फरार हो गया । स्त्रियों को लेजाकर जहांगीर को पेश की गई, जो कि इन्हें देखते ही बावला हो उठा, सिक्के फेंक के इतिहासकारों से लिखवा किया, की लिखो, हम विजयी हुए ।

इस विजय के झूठ का भंडाफोड़ तब होता है । जब यह पढ़ने को मिले की " कर्णसिंह ( अमरसिंहः का पुत्र ) दिल्ली आया, बादशाह ने उसे बहुत धन दिया

क्या यह लुटेरे मुसलमान अमरसिंहः को धन दे सकते थे ? नही अमरसिंहः के पुत्र कर्ण से दिल्ली पर चढ़ाई कर अपना सारा धन, स्त्रिया वापस छुड़वा ली ।

महाराणा अमरसिंहः ने लगातार 17 युद्ध लड़े, एक भी नही हारे, लेकिन हमारे इतिहास ने इतना भी प्रयास नही किया, की इन्हें उचित सम्मान दे पाते ।

https://www.rajputland.in/

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सुर्यवंशी गहरवार वंश

#__सुर्यवंशी___गहरवार___वंश 👈🙏🚩 #_गहरवार_क्षत्रीय_वंश सुदूर अतीत में #__सूर्यवंशी राजा मनु से संबन्धित हैं। #_अक्ष्वाकु के बाद #__रामचन्द्र के पुत्र "#_लव' से उनके वंशजो की परंपरा आगे बढ़ाई गई है और इसी में काशी के गहरवार शाखा के कर्त्तृराज को जोड़ा गया है।          लव से कर्त्तृराज तक के उत्तराधिकारियों में गगनसेन, कनकसेन, प्रद्युम्न आदि के नाम महत्वपूर्ण हैं। कर्त्तृराज का गहरवार होना घटना के आधार पर हैं जिसमें काशी मे ऊपर ग्रहों की बुरी दशा के निवारणार्थ उसके प्रयत्नों में "#__ग्रहनिवार' संज्ञा से वह पुकारा जाने लगा था।    कालांतर "ग्रहनिवार' का अपभृंश गहरवार बन गया। बनारस के राजाओं की अनेक समय तक  #__सूर्यवंशी सूर्य-कुलावंतस काशीश्वर पुकारा जाता रहा है। इनकी परंपरा इस प्रकार है - कर्त्तृराज, महिराज, मूर्धराज, उदयराज, गरुड़सेन, समरसेन, आनंदसेन, करनसेन, कुमारसेन, मोहनसेन, राजसेन, काशीराज, श्यामदेव, प्रह्मलाददेव, हम्मीरदेव, आसकरन, अभयकरन, जैतकरन, सोहनपाल और करनपाल। करनपाल के तीन पुत्र थे - वीर, हेमकरण और अरिब्रह्म। करनपाल ने हेम...

क्षत्राणी

# क्षत्राणी मैंने उसको जब-जब देखा, लोहा देखा। लोहे जैसा तपते देखा, गलते देखा, ढलते देखा मैंने उसको गोली जैसा चलते देखा। # यह_ही_है_क्षत्राणी यथार्थ में देखा जाए तो क्षत्राणीयों का इतिहास व उनके क्रियाकलाप उतने प्रकाश में नहीं आए जितने क्षत्रियों के। क्षत्राणीयों के इतिहास पर विहंगम दृष्टि डालने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि क्षत्रिय का महान त्याग व तपस्या का इतिहास वास्तव में क्षत्राणीयों की देन है। राजा हिमवान की पुत्री  # गंगा  ने अपनी तपस्या के बल पर भगवान् श्रीनारायण के चरणों में स्थान पाया और भागीरथ की तपस्या से वे इस सृष्टि का कल्याण करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुई। उन्हीं की छोटी बहन  # पार्वती  ने अपनी तपस्या के बल पर भगवान् सदाशिव को पति के रूप में प्राप्त किया व दुष्टों का दलन करने वाले स्वामी कार्तिकेय और देवताओं में अग्रपूजा के अधिकारी गणेश जैसे पुत्रों की माता बनी। महाराजा गाधि की पुत्री व विश्वामित्र जी की बड़ी बहन  # सरस्वती  अपनी तपस्या के बल पर ही जलरूप में प्रवाहित होकर पवित्र सरस्वती नदी का रूप धारण कर सकीं। इसी प्रकार  # नर्मदा...

जय देव

# MUST_READ_AND_SHARE जय देव !  # धर्मवीर_बाबा_हासिल_देव_जी_की_जय_हो  !  # आज_बाबा_हासिल_देव_जी_की_जयंती_है  , बाबाजी को कोटि कोटि नमन ! जिस तरह जय सिंह खिंची चौहान जी , सिक्ख गुरु जी , बाबा बन्दा बहादुर जी और सम्भाजी महाराज के साथ बर्बरता करके शहीद किया गया था उसी तरह इस वीर राजपूत को शहीद किया गया था ! ये वो  # राजपूत_वीर  थे जिन्होंने शहादत देदी लेकिन सर नहीं झुकाया ! दिल्ली के बादशाह ने उन्हें तसीहें देकर शहीद कर दिया लेकिन बाबाजी बादशाह के आगे झुके नहीं ! राजा हमीर देव जम्वाल का बिक्रमी 1456 से लेकर 1483 तक जम्मू पर राज था ! उनके दो बेटे थे - अजैब देव और हासिल देव ! राजा हमीर के देहांत के बाद उनका बड़ा बेटा अजैब देव राजा बना और कुछ समय बाद राजा अजैब देव के छोटे भाई बाबा हासिल देव जी को जम्मू की रियासत का वज़ीर बना दिया गया ! राजा अजैब देव जी की बिक्रम सम्वत 1514 में मृत्यु हो गई ! राजा का बेटा कुंवर बीरम देव उस समय बोहत छोटे थे ! वज़ीर हासिल देव जी ने अपने भतीजे को पाला और साम्राज्य को चलाने में पूर्ण मदद की , और साफ सुथरे ढंग से राज्ये चलाना सिखाय...