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प्रतिहारो का इतिहास आज के समय में ऐसा गौरवशाली इतिहास है , जिसके कारण हर कोई प्रतिहारो के इतिहास को अपनी जाति का इतिहास कहकर प्रचारित कर रहा है , इसके पक्ष में मै यह बात पूर्व में भी लिख चुका हूँ " गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य " शुद्ध राजपूत साम्राज्य है , भारत की शूद्र , ब्राह्मण और वैश्य जाति से प्रतिहारो का प्रजा - और पिता समान राजा का रिश्ता था , ना की रक्त का सम्बन्ध है।
#क्या है पूरा मतलब #गुर्जर_प्रतिहार का
आजकल तो प्रतिहार शाशको के इतिहास पर कब्ज़ा करने की होड़ सी मची हुई है। गुर्जरा एक स्थान का नाम था , जो गुजरात और राजस्थान के क्षेत्र को मिलाकर बना था और प्रतिहार उस स्थान के शाशक हुए थे , इसी कारण यह वंश गुर्जर प्रतिहार वंश कहलाया। गुर्जर प्रतिहारो के राज्य का नाम है , ना की वंश का। प्रतिहार वंश के राजपूत भगवान् राम के छोटे भाई लक्ष्मण का वंश है , यह बात प्रतिहार राजपूत अपने शिलालेखों , ग्रंथो में भी चीख चीख कर लिख चुके है। जब लक्ष्मण जी के बड़े भाई श्रीराम को राजपूत उर्फ़ ठाकुर जी कहा जाता है , तो फिर लक्ष्मण जी के वंसज गैर-राजपूत या अन्य किसी जाति के कैसे हुए ??
कैलाशशैलवस्र्तेगिरिशोपरोधात
द्वारप्रवेशविनिषेधक्लाशायितेन
शप्तोशिम कण्वमुनिनायमः पितुस्ते
श्रीहर्षदेवःनृपते प्रतिहारपालः
भारत के इतिहास में प्रतिहार राजपूतो की देशभक्ति अद्भुत है। तुर्को के आक्रमणकाल में ऐसे सीमारक्षको की जरूरत थी , जो शत्रु का गला क्षण भर में उड़ा सके। प्रतिहार ऐसे ही वीर राजपूत थे। मिहिरभोज की ग्वालियर प्रसस्ति में प्रतिहारो के इन्ही गुणों का वर्णन किया गया है।
तीव्रदण्डप्रतिहारविधेर्य प्रतिहार आसित :
अर्थात पापियों , विधर्मियो को तुरंत दण्डित करने के लिए ही प्रतिहार राजपूतो का जन्म हुआ था। इतिहासकार प्रतिहारो को विदेशी हूणों से भी जोड़ते है , तो वह इतिहासकार यह बताएं , की किस दिन हूणों ने , या किसी भी विदेशी जाति ने इस देश की स्वतंत्रता में हिस्सा लिया था। इसके उल्ट ऐसा कौनसा समय आया , की प्रतिहार देश के लिए नहीं लड़े ? भोज के लेखो में लिखा गया है।
" यही इन वीरो की जन्मभूमि थी , जिसे वे अपने प्राणो से भी अधिक प्रिय मानते थे , प्रतिहार ऐसे ही वीर क्षत्रिय थे , जिसका परमकर्तव्य राष्ट्र के द्वार की रक्षा करना तथा मल्लेछों के आक्रमण को रोकना था।
और जिस वंश की चर्चा हम अभी तक करते आ रहे थे , की प्रतिहार राजपूत लक्षमण वंशज है , तो उसके प्रमाण में प्रतिहारो का सबसे पुराना लेख , जिसमे प्रतिहार वंश के बारे में लिखा है
स्वभ्रातारामभद्रस्य प्रतिहारः कृतं यतः ।
श्री प्रतिहारवंशोयामतषयमत सहचाननतिमापन्यूयात ।।
अर्थात अपने खुद के भाई रामभद्र का द्वारपाल बन उनकी सेवा करने के कारण लक्षमण का अन्य नाम प्रतिहार हुआ। और प्रतिहारवंशी राजपूत ठाकुर जी श्री राम के छोटे भाई लक्ष्मण के वंशज है। भागवत पुराण के अनुसार उन्ही लक्ष्मण के वंश में किसी राजा का नाम , लक्ष्मण के नाम पर ही , प्रतिहार रखा गया उन्ही के बाद से यह वंश प्रतिहार वंश के नाम से विश्वविख्यात हो गया।
जहाँ भी यह मुस्लमान घुसे , उसके बाद वह देश और १५ साल नहीं टिक पाया , लेकिन भारत इन बर्बर जंगली पशुओ के आक्रमण लगातार १००० वर्ष झेलता रहा, और इन्हे पीटता भी रहा। इसी मध्यकाल में वह हुआ था , जो भगवान् राम , श्री कृष्ण के समय भी नहीं हुआ था , सिर कट गए , और धड़ लड़ते रहे। भारत की रक्षा पंक्ति जैसे ही कमजोर हुई , प्रतिहारो ने देश को अपने हाथों में ले लिया , और उसके बाद लगभग ३०० वर्षो तक देश पर कोई नजर नहीं उठा पाया।
अफगानिस्तान, बलूचिस्तान हाथ से जाने के बाद भी भारतीय राजाओ को अक़्ल ठिकाने नहीं आयी थी , उसका दंड भी उन्हें मिलना ही था , लेकिन प्रतिहारो ने उसके बाद मुल्तान से देश की सीमा को बाँध दिया , ओर मुसलमानो को उसके बाद लगभग ३०० साल सिंध के आगे बढ़ने ही नहीं दिया। लेकिन जैसे ही प्रतिहारो का पतन हुआ , बाढ़ की तरह एक बार यह मुसलमान फिर भारत की भूमि में घुस आये।
बाउक के जोधपुर लेख के अनुसदार #नागभट_प्रथम ने प्रतिहार साम्राज्य की दुबारा स्थापना की थी। नागभट प्रथम का कार्यकाल ७२० - ७५६ का माना जा सकता है। सिसोदिया सीरध्वज बप्पा रावल और नागभट एक ही समय के थे , इन्ही दोनों ने मिलकर अरबो को सिंध के पार धकेल दिया था। प्रतिहार वंश की प्रतिस्ठा इस वंश की कर्तव्यपरायणता पर आधारित थी , और इस वंश ने अपने कर्तव्य को पूर्ण किया भी। इस वंश को सत्ता के शिखर पर पहुँचने से पहले खूब उतार चढाव देखने पड़े। प्रतिहार राजपूत ऐसे ही वीर थे , जिन्होंने अपने तलवार के पानी से चारो और की अशांत अग्नि को बुझा दिया।
प्रतिहारो की प्रथम राजधानी वर्तमान मंडोर यानि जोधपुर थी। सन ५५० में महाराज हर्षवर्धन ने यहाँ शाशन किया था। उसके बाद प्रतिहार राजपूत देश की रक्षा के लिए अंत में काल के मुँह तक जा बैठे थे। प्रतिहारो को उनके पराक्रम के कारण सदैव उन्हें मुसलमानो का विनाशक ही कहा जाता था , लगभग ७२० से आसपास से प्रतिहार शक्ति बनकर उभरे थे , उस समय इस्लाम की शक्ति भी अपने चरम पर थी , उन्होंने तुर्को , मंगोलो , सबको परास्त किया था। नरभट से ही नागभट का जन्म हुआ , जिन्होंने मेड़ता को अपनी राजधानी बनाया था। नागभट के २ पराक्रमी पुत्र हुए , उनके बाद यशोवर्मन नाम से एक प्रतिहार राजा हुए , जिन्होंने अपने भुजाओ के बल से चारो और शत्रुओ को परास्त किया। यशोवर्मन प्रतिहार ने अपने देश की सीमाएं अरब तक लगा दी थी।
प्रतिहारो ने जिस समय देश की सत्ता संभाली थी , उस समय देश की अवस्था बहुत ही खराब थी , इस्लाम के प्रचार के बहाने अंधविश्वासी , लोलुप तथा इस्लाम के प्रचारक पूरी धरती को रोंदते घूम रहे थे। सिंध पर आक्रमण करके इन्होने भारत देश को भी बड़ी बुरी तरह से जला झुलसा दिया था। यह लोग व्यक्तियों को काटते थे , चीखते चिलाते , स्त्रियों तथा बच्चो को व्यभिचार और गुलामी के लिए घसीटते थे। इस्लाम नाम का कलंक धर्म की चादर ओढ़कर समाज में आया था , जिसकी कलिमा शैतान को भी मात दे रही थी।
उस समय इन असुरो को दण्डित करने के लिए ऐसे योद्धाओ की जरूरत थी , जो पल भर ही , पलक झपकते ही शत्रु का शीश धड़ से अलग कर सके , प्रतिहार ऐसे ही वीर थे। लगभग इसी काल में, जब प्रतिहारो का उदय हुआ था, भारत से दूर एक लड़ाकू जाति तुर्क , इस्लाम के समक्ष अपनमा समर्पण कर थी , इस्लाम धर्म के अनुयायी बाढ़ से ज़्यादा तेज गति से अपने राज्य की सीमा बढ़ा रहे थे। भारत में भी क्षत्रियो की शक्ति उस समय कमजोर पड़ चुकी थी , अब ऐसी ही शक्ति की आवश्कयता थी , जो इन मल्लेछों पर तुरंत प्रहार करते। प्रतिहार ऐसे ही वीर क्षत्रिय थे। उस समय मल्लेछ इतने ज़्यादा शक्तिशाली हो गए थे , की वे भारतीय प्रदेश पर लगातार आक्रमण कर रहे थे , मल्लेछ तुरुष्क उज्जैन तक घुसना चाहते थे , और इसके आगे भी। ऐसा करने में वे सफल भी रहे , ऐसे ही घोर संकट काल से समय में भारत की रक्षा की जिम्मेदारी प्रतिहारो ने अपने कंधे पर ली।
उस समय राजपूतो की एक आपातकालीन बैठक बुलाई गयी। संभवतः नागभट्ट प्रतिहार उस बैठक के अध्यक्ष बने थे , इस समय मल्लेछ आक्रमण से पूरा भारत ही भयभीत तथा चिंता में था। मुहम्मद बिन कासिम द्वारा फैलाया हुआ आतंक अब भी सिंध में पसरा था , उस समय सिंध का शाशक जुनैद हुआ करता था , वह बहुत बड़ा क्रूर था , उसके पास एक बड़ी विशाल सेना थी। उसने अरब , अफगानिस्तान , तुर्किस्तान इस प्रदेशो से भी सेना इक्क्ठी की , और भारत में कच्छ की और चढ़ आया। उसने सिंध से लेकर कच्छ तक के क्षेत्र को कुचल कर रख दिया। उसके बाद उसने मालवा और गुजरात पर भी हमला बोलै , लेकिन जुनेद की यह सब डकैती ही थी , कोई बड़ी विजय नहीं , लेकिन जो भी हो , था तो चिंता की विषय ही।
यह लगभग ७१४ से ७२० तक का समय था। उस समय अरबो ने पूरी शक्ति के साथ भारत पर हमला किया था। उस समय जयभट चतुर्थ गद्दी पर विराजमान थे , अरबो के साथ हुए इस युद्ध में प्रतिहारो को पूर्ण विजय मिली , बड़ी बुरी तरह जुनैद और उसकी मल्लेछ सेना को राजद कर मारा गया। अरबो ने उसके बाद भी हिम्मत नहीं हारी और टिड्डी दल की भांति उज्जैन मालवा तक घुस गए , यहाँ भी जयभट ने अरबो को बुरी तरह रगेद कर मारा , और देश की रक्षा की।
प्रतिहारो की मार खाकर अरबी मल्लेछ एक लम्बे समय तक शांत हो गए। उसके बाद वे राजपूतो को आपस में लड़वाने के षड्यंत्र के काम के लग गए। हिन्दुओ में आपसी फुट डाल उन्हें अलग , थलग करने के काम में मुस्लिम आक्रमणकारी लग गए , जिसमे में बहुत हद तक सफल भी हुआ , मुसलमानों की भड़कायी आग से राजमहल तक भी सुरक्षित नहीं रह सके थे। ७३० ईस्वी का समय आते आते अरबी मल्लेछ बहुत शक्तिशाली हो गए थे। और इसी समय भारत की रक्षा का भार उठाया था नागभट प्रतिहार ने।
मुसलमानो की यह नई नवेली सेना , भारत की अपनी उग्रता से मिटाकर नष्ट कर देना चाहती थी। वेदो के स्थान पर यह लोग हिन्दुओ के हाथ में कुरआन देना चाहते थे , भारत की सम्पूर्ण संस्कृति पर ही संकट आ गया।
७३० ईस्वी के आसपास भारत पर अरब की और से एक और बड़ा आक्रमण हुआ। उज्जैन के आसपास के क्षेत्रों को जलाकर राख कर दिया गया। अरबो ने गुर्जर प्रदेशो , यानि राजस्थान और गुजरात के बहुत से प्रदेशो को कुचल कर रख दिया था , यह गुंडों की फौज उसके बाद उज्जैन की और बढ़ी, जहाँ नागभट प्रतिहार ने उन्हें वहीँ घेरकर मार डाला।
नागभट के बाद देवशक्ति देवराज गद्दी पर विराजमान हुए , इनके समय में मुसलमानो में इतना साहस नहीं बचा था , की देवशक्ति देवराज पर वे आक्रमण कर पाते , इन्हे इनके बल और बुद्धि के कारण इंद्र के समक्ष बलवान और योग्य राजा की उपाधि मिली थी।
देवशक्ति देवराज के बाद प्रतिहारो में एक बहुत ही प्रतापी राजा हुए , जिन्होंने हिन्दू धर्म की रक्षा की , उन महान राजा का नाम था #वत्सराज_प्रतिहार । वत्सराज प्रतिहार ने अपनी भुजाओ के दम पर अपनी सभी विजय हासिल की थी। भोज के ग्वालियर लेखो में वत्सराज प्रतिहार को अपने कुल का कुलगौरव कहा है। वत्सराज प्रतिहार के समय में भी अरबो ने भारत पर आक्रमण करने का प्रयास किया था , लेकिन उन्हें पूरी तरह कुचल कर रख दिया गया। उसके बाद एक केंद्रीय शक्ति स्थापित करने के प्रयास में वत्सराज प्रतिहार विजय प्राप्त करते करते बंगाल तक घुस गए , तथा वहां के पाल शाशको को परास्त किया। वत्सराज प्रतिहार ने अपनी विजय की पताका चारो और फहरा दी थी। जयभट प्रतिहार , नागभट प्रतिहार और अब उनके बाद वत्सराज प्रतिहार , इन तीनो राजाओ नहीं अरबो को बड़ी बुरी तरह पराजित किया था , और इस वंश को शक्तिशाली बनाया , लेकिन वत्सराज प्रतिहार विजय के नशे में बिलकुल अंधे हो चुके थे। प्रतिहार अपनी शक्ति का विस्तार कन्नौज से लेकर बंगाल तक कर चुके थे , उसी समय उनकी शक्ति को राठौड़ो का आघात पड़ा। वत्सराज प्रतिहार ने शक्ति ने नशे में अंधा हो राष्ट्रकूटों ( राठौड़ो ) पर आक्रमण कर दिया था। इस युद्ध में वत्सराज प्रतिहार को बड़ी पराजय का सामना करना पड़ा प्राणो तक पर संकट आ गए। राठौड़ राजा ध्रुव ने वत्सराज प्रतिहार से उनका छत्र और घोड़े तक छीन लिए , वत्स राज ने मरुभूमि की और भागकर बड़ी मुश्किल से अपने प्राणो की रक्षा की थी।
लेकिन इस समय तक राजपूतो की आपसी लड़ाई जो भी रही हो , मुस्लमान भारत में मजबूत नहीं हो सके। वत्सराज की मृत्यु के बाद लगभग ८०८ ईस्वी के आसपास नागभट द्वितीय गद्दी पर विराजमान हुए। यह समय भी इस्लाम के लिए स्वर्णयुग ही था , केवल भारत को छोड़कर। इस समय ईरान से लेकर अफगानिस्तान पूरा प्रदेश इस्लामिक था , स्पेन तक मुसलमान पहुँचने का प्रयास कर रहे थे , और पहुंचे भी। उस समय भारत के राजा भी आपस मे लड़ रहे थे , लेकिंन इस्लाम का कोई संकट , या इस्लाम के संकट का नामोनिशान भारतीयों के आसपास नहीं था। ८०८ का समय तो वह समय था , जिस समय मंगोल , चीन , तुर्किस्तान , इस्लाम के अनुयायियों के कारनामो से खून से आंसू रो रहे थे। भारत की रक्षा लका भर इस तरह एक बार फिर एक महान राजा ने अपने काँधे पर लिया , जिसका नाम था " नागभट द्वितीय "
नागभट्ट द्वितीय के बारे में हमे विस्तृत जानकारी हमे ग्वालियर प्रशस्ति से प्राप्त होती है। नागभट द्वितीय एक महान राजा था , उन्होंने आंध्रप्रदेश , विदर्भ , कलिंग , मत्स्य और तुर्क मल्लेछों को बड़ी बुरी तरह परास्त किया , उसके बाद शक्तिशाली राष्ट्रकूटों को परास्त कर नागभट प्रतिहार बड़ी शक्ति बन गए , चौहानो को अपना सामंत भी महाराज नागभट्ट प्रतिहार ने ही बनाया था। शाकंबरी के चौहान महाराज गुहक को नागभट ने परास्त किया था , उसके बाद चौहान शाशक की पुत्री से नागभट का विवाह हुआ , और प्रतिहार - चौहान सदा सदा के लिए मित्र बन गए ।
सूर्यवंशी प्रतिहार बन्ना
प्रतिहार/परिहार/पढ़ियार/पड़िहार क्षत्रिय राजपूत वंश !
नागभट द्वितीय की विजयगाथा कल ..
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https://www.rajputland.in/
#ҡรɦαƭ૨เყα_૨αʝρµƭ
















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