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प्रतिहार राजपूत वंश .... इन क्षत्रियो का तो प्रमुख कर्तव्य ही राष्ट्रद्वार की रक्षा करना था । ओर प्रतिहारो की उन्नति और प्रतिष्ठा भी इसी कर्तव्यपरायणता पर आधारित थी । जिन अरब विजेताओं ने अपनी शक्ति की आंधी से , पश्चिमी एशिया, उत्तरी अफ्रीका और दक्षिणी यूरोप को भी ध्वस्त कर दिया था, उनके अत्याचार जब पूरे भारत की प्रजा को भी कष्ठ देने लगे, तब प्रतिहार वंश ने अपने राष्ट्र-द्वारपाल धर्म का पालन करते हुए, अपने रजपूती जोहर दिखाते हुए, अरबो की अग्नि को, अपनी तलवार की धार के पानी से ठंडा कर दिया ।
भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वालों में प्रतिहार वंश अपना अग्रणी स्थान रखता है । जिस समय देश मे तुर्को ओर अरबो के आक्रमण हो रहे थे, ओर उतरी पश्चिमी द्वार पर दुर्गरक्षक निर्बल साबित हो रहे थे, जब मायावी काली शक्ति इस्लाम पूरे देश को भस्म कर देना चाहती थी, उस समय एक ऐसी शक्ति की आवश्कता थी, जो मल्लेछो को देशद्वार पर ही रोक देती । प्रतिहार शाशक ऐसे ही वीर शाशक थे ।
"तीव्र:दंड परिहरणविधर: प्रतिहार आसित:
प्रतिहार वंश ऐसा ही एक सुनियोजित प्राचीन वंश था । इस युग मे ऐसे किसी व्यक्तियो की आवश्यकता थी, जो "प्रतिहरण-विधि " में भी पटु होते । ऐसे अवसर पर वीर प्रतिहार राजपूतो ने इस महान राष्ट्र की रक्षा का भार अपने ऊपर लिया !!
इस वंश में अनेको राजा हुए .... लेकिन आज की पोस्ट केवल #नागभट + पर !!
#नागभट
नागभट इच्छाकु, मनु, ओर ककुस्थ मूल सम्राटों के समान पृथ्वी के रक्षक , ओर प्रजा को सम्पूर्ण सुख देने वाले राजाओ में से एक थे । प्रतिहार केतन ( राजचिन्ह ) धारण करने वाले नागभट उन्ही सौमित्र ( लक्ष्मण ) के वंशज थे । नागभट स्वम् पूरे संसार की रक्षा करनेके लिए पुरातन मुनि श्री विष्णु के मूर्तरूप अवतार थे , जिन्होंने मल्लेछो की सेनाओं को अपनी चारो भुजाओं से मथ डाला था ।
इस्लाम की आंधी ऐसी चल रही थी, की छल बल और क्रूरता की अग्नि में वे सारे भारत को जलाकर भस्म कर देना चाहते थे, यहां तक कि उज्जैन तक हमला हुआ, इसके आसपास के क्षेत्रों को जला दिया गया । लेकिन नागभट के बाद पासा ऐसा पलटा, की जिन क्षेत्रों पर मुसलमानो का अधिकार था, उस प्रदेश को छोड़कर भी यह लोग भागने लगे । अरब शाशको की इस हीनता ओर भय का कारण नागभट ही थे ।
नागभट का समय 730ई से 753ई के आसपास रखा जा सकता है । नागभट मल्लेछो पर विजय के कारण ही वीर माने गए, ओर उनके वंश की प्रतिष्ठा भी बढ़ी ।
नागभट के बाद वत्सराज हुए, जो इतने अधिक योग्य शाशक नही थे, उनके काल मे राज्य अस्थिर हो गया, उसी समय फिर से एक बार राष्ट्र का भार " नागभट " ने उठाया !! वत्सराज की म्रत्यु के बाद संभवतः 808 ई के आसपास उनका पुत्र नागभट ( द्वितीय ) प्रतिहार वंश के महान राजा हुए । उनके समय मे राष्ट्रकूट विजेता द्वारा प्रतिहारो की प्रतिष्ठा को धूमिल कर दिया गया था, किन्तु नागभट(2) ने अपने वंश को इस दीन-हीन स्थिति से उठाकर, यशस्वी बना दिया ।
यह समय ऐसा था, की जैन और बोद्ध देश के अंदर का माहौल खराब रखते थे ।जैसे अभी डोकलाम विवाद के समय कांग्रेस और मुल्ले चीन की तरफ थे , ठीक इसी तरह ये बौद्धिस्ट ओर जैनी लोग ब्राह्मणविरोध में !
दौ- तरफा संघर्ष की बात हर एक राजा ने अपने शिलालेखों में की है, घर के अंदर भी, घर के बाहर भी, वह चाहे नागभट प्रथम हो, द्वित्य हो, या फिर स्वम् मिहिरभोज हो ... इन सभी राजाओ ने दौ- तरफ़ा संघर्ष की बात अपने इतिहास में कहीं है । यहां जैन और बोद्ध राष्ट्र के शत्रु बने हुए थे, आगे चलकर यहीं काम " उन शक-हूण जातियों ने भी किया, जो जैनी करते थे ।जबकि हूण ओर शक हिन्दू बन चुके थे ।
स्कन्दपुराण स्पष्ठ करता है की नागभट नाम का एक राजा हुए, वह श्रीमान राजा धर्म और नीति को जानने वाले थे, वह शांत, संयमी, शुशील ओर सत्यधर्मपरायण थे । कलियुग के दोष के कारण चारो ओर अधर्म फैलने लगा, ब्राह्मण विद्वेष, परस्पर विरोध एवम विष्णुभक्ति की कमी , दुस्ट प्रवर्तियाँ ओर सनातन धर्म को छोड़कर बोद्ध धर्म या जैनधर्म स्वीकार करना था ।
इस प्रकार पाखण्डधर्म ने वैदिक धर्म का, विशेषकर हिंसात्मक यज्ञ विधान का घोर विरोध किया, विवश होकर नागभट ( द्वितीय ) को विवश होकर त्रेयी धर्म का ही विस्तार करना पड़ा । त्रेयी विद्या तथा त्रेयी ब्राह्मणो का महत्व भी बढ़ा, यह नागभट द्वितीय का सबसे महान कार्य था । ग्वालियर की प्रशस्ति में भी यहीं लिखा है । इसी कार्य द्वारा उन्होंने सूर्य की तरफ प्रकट होकर घोर अंधकार को दूर किया, ओर बोद्ध राजा धर्मपाल को पराजित कर तीनो लोकों में प्रसिद्ध हो गया ।
कितना महान चरित्र रहा होगा नागभट का, जो सूर्य के समान सम्पूर्ण देश के विकाश का एकमात्र कारण था । अगर नागभट के पास सबसे बड़ी शक्ति कुछ थी, तो वह था केवल उनका आत्मबल ..
कुछ समय पूर्व ही प्रतिहारों ने सामन्त से " राजा " का भार संभाला ! नागभट प्रथम ने "ठीक-ठाक " राजपाठ सजा कर दिया था, उसे भी वत्सराज ने कमजोर कर लिया ।
लेकिन उसके बाद कहानी सिर्फ नागभट के पराक्रम की बचती है, अपने आत्मबल से ही उन्होंने बोद्ध राजा धर्मपाल को पराजित किया था, अपने आत्मबल से ही उन्होंने, तुर्क, अरबो को भी उनकी मांड तक खदेड़ा !!
आपको यह जानकर हैरानी होगी, इतने प्रतापी, लड़ाकू ओर वीर राजा एक कवि भी थे । नागभट ने बाली ओर बामन कथा को कविता में कितना सुंदर पिरोया , यह में संस्कृत में टाइप कर पाता, तो अवश्य करता !!
नागभट ने ही लगभग पूरा भारत जीत लिया था , उनके सामने वहीं लोग टिक पाएं, जो प्रतिहारों के पुराने मित्र थे, जैसे मेवाड़ वंश !!
नागभट सेक्युलर नही थे, वो अपने धर्म के कट्टर थे, बौद्धों ने उनके काल मे विद्रोह किया, नागभट ने धैर्य दिखाते हुए, बौद्धों को भी काटा, जैनों को काटा, मुल्लो को भी काटा, ओर यहूदी ईसाई लड़ने आये नही थे !!
नागभट प्रथम, द्वित्य का विस्तृत इतिहास "राजपूताना " पुस्तक में है !!
आगे के लेख में पढिए किसी ओर भूले-विसरे वीर की जयगाथा !!

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