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हाड़ी_रानी_हद_कर_दी...................


हाड़ी_रानी_हद_कर_दी...................

🚩🚩 ये बात उस दौर की है जब फैसले संसद में नहीं युद्ध के मैदानों में हुआ करते थे। ये बात उस दौर की है जब कानून कलम नहीं तलवारें लिखा करती थी। ये बात उस दौर की है जब इतिहास स्याही से नहीं रक्त से लिखा जाता था - - और - - - यह बात उस दौर की है जब आज की तरह जनतंत्र या लोकतंत्र नहीं हुआ करते थे - - - तब होता था - - - राजाओं का राज और चलता था - - - "राजतंत्र" ।🚩🚩
#राजस्थान की इस धरती पर वीरता और बलिदान के ऐसे-ऐसे किस्से है जो आपको सोचने पर मजबूर कर देते है, "क्या ऐसा भी हो सकता है"।
आज के राजस्थान से कहीं पहले इस जमीन को अपनी रक्षा के लिए हजारों-हजार युद्ध लड़ने पड़े थे। राजस्थान की इस धरती के वीरों ने अपने रक्त और बलिदान से वो इतिहास लिखा जिसकी गाथा आज की दुनिया को बताती है कि यहां के वीर राजपूत योद्धाओं को सर कटाना मंजूर था लेकिन सर झुकाना नहीं। राजस्थान की इस मिट्टी में खून से लिखे किस्सों और स्वर्णिम इतिहास की बेमिसाल दास्तान है।
🚩🚩 आज बात करेंगे अपने बलिदान के लिए अमर और राजस्थान के गौरव का प्रतीक #सलूंबर_की_हाड़ी_रानी_की - - - - - - - - - 🚩🚩
🚩 "चुण्डावत मांगी सैनाणी,
सिर काट दे दियो क्षत्राणी🚩
🚩 मेवाड़ के सलूंबर की वो अमर कहानी 🚩
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🚩🚩 राजस्थान के शौर्य और पराक्रम के अनगिनत किस्से आपने सुने होंगे। हजारों पराक्रमी वीरों की कहानियां आपने सुनी होगी, लेकिन राजस्थान राजपूताना में जब महिलाओं के बलिदान को याद किया जाता है तो पद्मावती, कर्णावती, किरण देवी और पन्ना धाय जैसे किस्से सामने आते हैं, लेकिन इस बीच अगर आपने हाड़ी रानी के बारे में नहीं पढा है तो आज पढ लिजिये।
🚩🚩 ना हाथों की मेहंदी छूटी और ना ही पैरों का आल्ता। 🚩🚩 महल में उत्साह का माहौल था। शहनाइयों की गूंज अभी बंद नहीं पड़ी थी। रनवासे में खुशियां चारों तरफ नजर आ रही थी - - - लेकिन शायद किसी को पता नहीं था कि सलूंबर के इस महल में जल्द ही कुछ दिनों में एक सुनहरा इतिहास खून से लिखा जाना है।
🚩🚩 ये दास्तान है उस हाड़ी रानी की जो बूंदी के हाडा सरदार के घर जन्मी थी। हाडा सरदार खेंगार की इस फूल सी दुलारी का नाम #अंदरकंवर रखा गया था। राजपूताना के इतिहास की इस महानायिका की बात उस बलिदान से शुरू करते हैं जिसने मेवाड़ के एक छोटे से गांव सलूंबर को हमेशा-हमेशा के लिए इतिहास में अमर कर दिया। वो सलूंबर जिसकी पहचान उन #चूण्डावत वीरों से होती थी जो मेवाड़ का #हरावल दस्ता कहलाता था।
बात साल 1660 ईस्वी की है जब मेवाड़ पर #महाराणा_राजसिंह का शासन था। सलूंबर के रावत रतनसिंह चूण्डावत के महल में खुशियां आई थी। रावत रतनसिंह की शादी बूंदी के सरदार खंगारसिंह की बेटी अंदर कंवर के साथ हुई थी। पूरे महल को किसी दुल्हन की भांति सजाया गया था। रावत रतनसिंह भी अपनी नई रानी के प्रेमपाश में भविष्य के ताने-बाने बुनने की कोशिश कर रहे थे - - - - - तभी महाराणा राजसिंह का हरकारा महल में पहुंचा। ये हरकारा अपने साथ फरमान लाया था जो रावत रतनसिंह के लिए था। इस फरमान में महाराणा राजसिंह ने रावत रतनसिंह को जानकारी दी थी कि अजमेर के पास रूपवास (रूपनगर) की #राजकुमारी_चारूमति से मुगल बादशाह औरंगजेब बलात विवाह करना चाहता है जबकि चारूमति महाराणा राजसिंह को अपना पति मान चुकी है। महाराणा ने खुद रूपनगर कूच करने की बात लिखते हुए रावत रतनसिंह को आदेश दिया कि वो अपने वीर सैनिकों के साथ युद्ध के लिए कूच करें और फौरन औरंगजेब की सेना को रूपनगर पहुंचने से रोकें ताकि राजकुमारी चारूमति के सतीत्व की रक्षा की जा सके। कहा जाता है कि जब महाराणा का फरमान रावत रतनसिंह चूण्डावत को मिला तो उस समय उनके घर में विवाह का उत्सव मनाया जा रहा था। विवाह के पश्चात की जो तमाम रस्में होती है उनको अदा किया जा रहा था।
रावत रतनसिंह के लिए महाराणा का ये फरमान बड़ी उलझन पैदा कर देता है। जिस वीर चूण्डावत की तलवार दुश्मनों के रक्त की प्यासी थी और वो प्यास कभी खत्म नहीं होती थी उसी चूण्डावत रतनसिंह के चेहरे पर युद्ध के नाम से चिन्ता की लकीरें पहली बार दिखाई देने लगी थी। रतनसिंह के जहन में यकायक अंदर कंवर का चेहरा घूम गया। पत्नि का मोह कर्तव्य पर भारी पड़ने लगा। सलूंबर का वो महल इस बात का गवाह भी बना जब रतनसिंह चूण्डावत ने अपनी नवविवाहिता हाड़ी रानी से अपने मन की इस दुविधा के बारे में कहा हो। इतिहासकार जब दस्तानों को शब्दों में पिरोकर लिखने की कोशिश करता है तो लिखते है कि शौर्य के संस्कारों में जन्मी हाड़ी रानी अंदर कंवर ने रतनसिंह की वीरता को झकझोरने की भी कोशिश की। रानी ने चूण्डावतों के शौर्य और बलिदान के इतिहास की दुहाई भी दी और महाराणा के प्रति स्वामिभक्ति की भी याद दिलाई। मेवाड़ की मिट्टी के कर्ज को भी हाड़ा रानी ने उलाहना में शामिल किया। युद्ध के लिए कूच करने से पहले रावत रतनसिंह ने केसरिया बाना धारण करते हुए अपनी नवेली रानी को शिकायती लहजे में कहा होगा--- "मेरी वीरता पर सवाल खड़ा ना करो। ये वो हाथ है जिसमें थामी तलवार दुश्मनों का सर काटकर ही अपनी प्यास बुझाती है। इस बात की गवाही तुमने उस वक्त भी देखी होगी जब शादी में हथलेवा की रस्म में मेरे हाथ में तलवार थामने से पड़े ऐंठन को तुमने महसूस किया होगा। लेकिन सवाल आज तुम्हारे भविष्य का है। एक नारी की रक्षा के लिए मेरा बलिदान हो जाए तो मुझे खुशी होगी लेकिन तुम्हारा क्या होगा यही सोच मुझे परेशान कर रही है।"
🚩एक नारी की रक्षा खातिर,
शीश का भेंट चढा़ दिया ।
धन्य धन्य हाड़ी रानी,
धरती का कर्ज चुका दिया ।। 🚩
🚩🚩 हाड़ी रानी की उलाहना रतनसिंह को युद्ध से विमुख नहीं होने दे रहे थे। रावत रतनसिंह का मन अभी भी हाड़ी रानी अंदर कंवर के मोहपाश में ही उलझा हुआ था। सलूंबर के महल में चूण्डावत सरदार की सेना तैयार थी। युद्ध का डंका बज चुका था। सेना की अगुवाई करते हुए रावत रतनसिंह ने घोड़े पर जीन कसकर रवाना होने की तैयारी कर ली थी। रतनसिंह की नजरें अचानक महल के झरोखे में खड़ी हाड़ी रानी अंदर कंवर का चेहरा देखकर रतनसिंह फिर से उलझन में आ जाते हैं और अपने सेवक को रानी के पास भेजकर एक ऐसी निशानी की मांग करते हैं जिसे वो युद्ध में अपने पास रख सके। लेकिन शायद यही वो पल था जिसे भगवान एकलिंग जी ने इतिहास लिखने के लिए सुरक्षित रखा होगा।
सेवक जब हाड़ी रानी के पास पहुंचता है तो रानी एक ऐसा फैसला ले चुकी होती है जिस पर आम आदमी का यकीन कर पाना असंभव है।
ये फैसला मेवाड़ की वीरता के सम्मान के लिए था। यह फैसला एक नारी की रक्षा और स्वाभिमान के लिए था। यह फैसला उस हाड़ा कुल के सम्मान के लिए था जिसमें अंदर कंवर ने जन्म लिया था। यह फैसला चूण्डावत कुल को कायरता के दाग से बचाने के लिए था। रानी ने सेवक से तलवार लेकर कहा - - - "जो निशानी मैं तुम्हें दे रही हूं उसे अपने राजा को लेजाकर दे देना और कहना अब वो मेरी चिंता ना करें और अपने कुल के गौरव को बढाने को युद्ध क्षेत्र में जाएं।"
इस अंतिम संदेश के साथ ही हाड़ा रानी ने अपना सर काटकर थाल में सजाकर सेवक को दे दिया। 🚩🚩
कहा जाता है कि रावत रतनसिंह चूण्डावत ने इस निशानी को अपनी गर्दन में धारण किया और औरंगजेब की सेना पर टूट पड़े। इस युद्ध में औरंगजेब की सेना की हार हुई और मेवाड़ का मान हमेशा-हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में अमर हो गया। साथ ही साथ अमर हो गया हाड़ी रानी का वो बलिदान जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। इतिहास के इस अद्भुत और अद्वितीय बलिदान पर कवि कन्हैयालाल सेठिया लिखते हैं - - - -

🚩 "चुण्डावत मांगी सैनाणी,
सिर काट दे दियो क्षत्राणी🚩


🚩🚩इस विजय का श्रेय आज भी राजस्थान के अंचलो में हाड़ी रानी को उनके अमर बलिदान की यशोगाथाओ में दिया जाता है। जिसके चलते इसी वीरांगना के नाम पर राजस्थान सरकार द्वारा राजस्थान पुलिस में एक महिला बटालियन का गठन किया गया। गठन के बाद इस महिला बटालियन का नामकरण इसी वीरांगना के नाम पर हाड़ी रानी महिला बटालियन रखा गया है।

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