आज इतिहास से एक गाथा चितोड़गढ से ... उस महावीर का नाम है -- महाराणा कुम्भा ...
महाराणा मोकल की दासीपुत्रो द्वारा हत्या के बाद मेवाड़ की स्तिथि बहुत बिगड़ गयी । महाराणा कुम्भा मारवाड़ के शाशक के भांजे थे, अतः इस विकट परिस्थिति में उन्होंने मारवाड़ से सहायता मांगी, क्यो की मोकल के हत्यारे कभी भी चितौड़ पर भी आक्रमण कर सकते थे ।
मारवाड़ ने भी अपनी सेना की एक टुकड़ी कुंभा जी की सहायता के लिए भेजी, ओर उस सेना ने कुंभा की पूरी सहायता भी की
इस तरह १४३३ में कुम्भा का राजतिलक हुआ था , उसके ३ वर्ष पश्चात ही उन्होंने बूंदी के हाड़ा शाशको पर हमला कर दिया। राव बेरीसाल ने भी आसानी से हार ना मानते हुए जहाजपुर के समीप कुम्भा से बहुत भयंकर युद्ध किया था , जिसमे बूंदी की हार हुई , मांडलगढ़ बिजोलिया , तथा जहाजपुर मेवाड़ राज्य में मिला लिए गए। बूंदी पर अपना अधिकार स्थापित करने के बाद , अब सिरोही की बारी थी। सिरोही के शाशक ने सिरोही को मेवाड़ से मुक्त रखने के लिए गुजरात के सुल्तान की भी सहायता ली थी कुम्भा की शक्ति के आगे कोई कुछ भी करने में नाकाम हुई सिद्ध हुआ।
उसके बाद महाराणा कुम्भा के विजय अभियानो में बागर पर विजय भी है। मेरो के विद्रोह को भी कुम्भा ने ही शांत किया , तथा विद्रोहियों को बहुत कड़ा दंड दिया गया। रणथम्बोर मई चौहानो की पराजय के कारण यह क्षेत्र मुसलमानो का शक्ति केंद्र हुई बनता जा रहा था , लेकिन महराणा कुम्भा ने रणथम्बोर के क्षेत्र पर आक्रमण करके उस प्रदेश पर अपना अधिकार जमा लिया था।
कुम्भा का इसके बाद मालवा से संघर्ष तय था , मालवा से संघर्ष का मुख्य कारण था , मालवा के सुल्तान ने कुम्भा के पिता के हत्यारो को अपने यहाँ शरण दे रखी थी। १४३७ में राणा कुम्भा ने विशाल सेना के साथ मालवा पर आक्रमण किया था , खिलजी भागता हुआ मंदसौर , जावरा और सांगरपुर पहुंचा , महाराणा कुम्भा ने महमूद खिलजी को बंदी बना लिया था , उसके बाद छ माह तक जेल में रखकर दुबारा मुक्त कर दिया था। अपनी इस शर्मनाक पराजय से महमूद खिलजी बहुत दुःखी हुआ , और किसी भी कीमत पर इस पराजय का बदला लेने की ठानी। १४४२ - ४३ में महमूद खिलजी ने बड़ी सेना लेकर कुम्भलगढ़ और चितोड़ पर आक्रमण किया , लेकिन महाराणा कुम्भा ने उसे मारकर मांडू की और भगा दिया। इस युद्ध का सेनापति दीपसिंह मारा गया था , महमूद खिलजी ने बाणमाता के मंदिर को भी नष्ट भर्स्ट किया , किन्तु विजयश्री फिर भी दूर ही रही।
महमूद खिलजी ने कई हिन्दू दुर्गो पर अधिकार रखा था , महाराणा कुम्भा ने उससे एक एक दुर्ग छीनने शुरू किये , १४४३ - ४४ ,इ सबसे पहले महमूद के हाथ से खींची चौहानो का किला गागनोर मुसलमानो के चंगुल से छुड़वाया गया। गागनोर से मुसलमानो को भगा , मांडलगढ पर दूसरा हमला किया गया , विजयश्री सदैव कुम्भा की ही प्रतीक्षा किया करती थी
१४५५ से लेकर १४६० में महाराणा कुम्भा का संघर्ष गुजरात के सुल्तान से हो गया। इस संघर्ष के पीछे कारण था नागौर , गुजरात का शम्स खान चाहता था की नागौर को मुसलमान ही लूट खसोट कर खाते रहे , इसी मंशा के साथ १४५६ में शम्स खान बड़ी विशाल सेना लेकर सिरोही को रोंद्ता हुआ कुम्भलगढ़ चढ़ आया था , नागौर के किले के लिए हुए इस युद्ध में महाराणा कुम्भा की बड़ी विजय हुई। इस कड़ी पराजय के बाद शम्स खान दिल्ली के सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक के पास गया था , गुजरात और दिल्ली की सेना सयुक्त रूप से ३ दिन तक राणा कुम्भा को घेरकर बैठी रही लेकिन विजय राणा कुम्भा की ही हुई।
महाराणा कुम्भा को अकेले जीत पाना , किसी भी राजा के लिए असंभव था , मुस्लमान यह बात बहुत अच्छी तरह से समझ चुके थे। गुजरात और मालवा के सुल्तानों ने एक संधि की , जिसका नाम था : चम्पानेर की संधि " हुई , जिनमे दो हिस्सों में मेवाड़ का बंटवारा कर उसका इस्लामीकरण करना था। कुतुबुद्दीन और मालवा के खिलजी ने बड़ी तैयारी के साथ कुम्भा पर यह आक्रमण किया था। शम्सखां जो गुजरात के साथ मिला हुआ था , उसपर तो महाराणा कुम्भा बहुत ज़्यादा क्रुद्ध थे क्यों की उसने गौ- हत्या बहुत की थी। राणा कुम्भा ने इन सभी शत्रुओ को एक साथ रगेद कर मारा। कई मुसलमानी सुल्तानों को एक साथ परास्त करने की ख़ुशी में कीर्ति स्तम्भ का निर्माण करवाया , यह कीर्ति सतम्भ आज भी राणा कुम्भा के गौरवमयी इतिहास की जीती जागती मिशाल है।
महाराणा कुम्भा ने अपने जीवन में १०० से ज़्यादा युद्ध किये। और एक भी युद्ध नहीं हारे। संगीतमीमांसा , गीतगोविन्द , सुडप्रबंध , कामराज रतिसार , संगीतराज रसिक प्रिया , एकलिंग महात्मय जैसे १०-१२ ग्रंथ तो स्वम् कुम्भा ने लिखे थे। महाराणा कुंभा ने केवल युद्ध की भूमि पर इतिहास नहीं रचे , उन्होंने युद्ध भूमि के अलावा कला , साहित्य , तथा ज्ञान के क्षेत्र मै इतिहास लिखा , जिसे देखकर दुनिया गश खा जाती है। वास्तव में महाराणा कुम्भा इतिहास के उन्ही वीरो में से एक है , जो जितने दिन जीवित रहे , उनके तलवार की तूती पुरे संसार पर बोलती रही थी। और जितनी विजयगाथा इनकी युद्ध की भूमि पर लिखी गयी है , उससे कहीं अधिक विजयें उन्हें कला , संगीत , साहित्य के क्षेत्र में कीर्तिमान रचकर मिली थी।
कुम्भा जब तक जीवित रहे , राजस्थान और गुजरात के एक विशाल प्रदेश तक मल्लेछ कभी शक्तिशाली नहीं हो पाएं।

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