राजा #इच्छवाकु कुल #सूर्यवंशी प्रतिहार क्षत्रिय #राजपूत वंश की क्रमागत #वंशावली जरुर पढ कर #शेयर_करे ।।
राजा #इच्छवाकु कुल #सूर्यवंशी प्रतिहार क्षत्रिय #राजपूत वंश की क्रमागत #वंशावली जरुर पढ कर #शेयर_करे ।।।।
किसी जाति समाज और देश देश को सनातन आबाद रखना है तो उसकी ऐतिहासिकता पृष्ठभूमि को सहेजकर रखना अतिआवश्यक है। अतः लिपिबद्ध इतिहास की जाति के गौरव को जिंदा रखता है। तथा भावी पीढी के लिए प्रेरणा स्रोत बनकर सतपथ पर चलने की प्रेरणा देता है। जब तक इतिहास का सृजन होता रहेगा तब तक कोई भी जाति मर नही सकती।
मलेच्छों, अरबों, हूणो, कुषाणों ने जब भी भारत पर आक्रमण किया तो सर्व प्रथम प्रेरणा स्रोत धार्मिक एवं इतिहास की धरोहर को नेसतानबूत करने का कुत्सित प्रयास किया है। यह भावना इतिहास व धार्मिक ग्रंथों को स्वाह करने व मंदिर महलो को तोड देने के रुप में क्रियानवित हुई ताकि आगे की पीढी प्रेरणाहीन पंगु बन जाये। कुछ ऐसा ही प्रयास अंग्रेजो ने भी किया। अतः इतिहास की महत्वपूर्ण सामग्री हमारे बालक - बालिकाओं को बचपन में ही उपलब्ध करा देनी चाहिए जिससे कोमल बाल ह्रदय पर स्वदेश व स्वजाति की अमिट छाप पड जाये।
भारत का लगभग कोई हिस्सा ऐसा नहीं रहा जहाँ प्रतिहार राजपूत शासकों ने अपनी तलवार का जौहर नहीं दिखाया हो प्रतिहारों में चक्रवर्ती सम्राट तक हुए है। अधोलिखित पध आज भी जनमास की जवान पर है।
** बडो बैन प्रतिहार चकबे, कर काहू पै नाहि लियो।
दूजो बल राजा राठौड़ चकवै विश्वा बावन को दियो।।
धन्ध पाल मान्धाता भयो, रघुवंश नरिंदा।
अजय पाल चौहान लंक कीनी सुभरिंदा।।
पुरुर वा महि चक्कवै, चंद्रवंश पैदा हुए।
आन मान चारो दिशा, पांच जाति छः चक्कवे **।।
भारतीय इतिहास में प्रतिहार राजपूत वंश साम्राज्य बहुत ही विस्तृत क्षेत्रों में रहा है। जब 8 वीं , 9 वीं शताब्दी के इनके शिलालेखों का अध्ययन करते है तो मण्डौर, जालौर, ग्वालियर, नागौद के प्रतिहारों के शिलालेख तथा कन्नौज के प्रतिहार सम्राटों के शिलालेखों में यह सपष्ट तौर पर बताया गया है। कि प्रतिहार अयोध्या के राजा रामचंद्र के लघु भ्राता लक्ष्मण के वंशज है। प्रतिहार/परिहार वंश किसी व्यक्ति विशेष के नाम पर न होकर अयोध्या के नरोत्तम सम्राट राम द्वारा अपने लघु भ्राता लक्ष्मण को प्रदत्त " प्रतिहार " उपाधि से प्रचलित हुआ।
8 वीं 9 वीं शताब्दी में पश्चिम के अरब खलीफाओं की महान आंधी को भारत प्रवेश से रोकने के लिए जो कार्य प्रतिहार राजपूत वंश एवं उनके महान शासक सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार ने किया उसके लिए भारत व भारत की संस्कृति इनकी बहुत बडी रिणी है अन्यथा आज भारतीय संस्कृति व धर्म समूल नष्ट होकर केवल ऐतिहासिक शोध का विषय बन गये होते।
सदियों तक भारतवर्ष के इतिहास पर छाई रहने वाली यह राजपूत जाति वि. सं. 1300 के आते आते इतिहास के हाशिये पर चली गई। प्रतिहारों के सत्ताहीन होने के बाद सत्तासीन राठौड़ों पर इतिहासकारों ने कलम की जितनी स्याही खर्च की उसकी दो बूंद भी अगर प्रतिहार वंश को लिखने मे लगा देते तो इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका होने से यह वंश इतिहास के हाशिये पर नहीं जाता। हालांकि राठौड़ राज्य की हर विपदा और युद्ध में प्रतिहार राजपूत हमेशा हरावल मे रहे है।
हमारी टीम ने काफी शोध के बाद प्रतिहार वंश की क्रमागत वंशावली तैयार की है जो इच्छवाकु राजा से अब तक की है। इच्छवाकु क्षत्रिय राजा को ही ब्रह्मा जी ने पृथ्वी दी थी। फिर बाद में इसी वंश मे प्रतापी राजा रघु हुए जो श्री राम जी के पूर्वज थे। तभी से सूर्यवंशी लोग रघुवंशी भी कहलाने लगे।
कश्यप
आदित्य - (पत्नी संज्ञा जो विश्वकर्मा की पुत्री थी)
मनु - ( सूर्य से श्रेष्ठ एवं ओज पूर्ण) मनु की ज्येष्ठ पुत्री इला ने सोम पुत्र बुद्ध के साथ संगति करके पुत्र पुरुरवा को प्राप्त किया तथा यहीं से चंद्र (सोम) वंश शुरु हुआ।
इच्छवाकु
विकुक्षि
कक्कुस्थ
सुयोधन
पृथु
विश्वक
आद्रकॆ
युवनाश्व
श्रावस्ती
बृहदश्व
कुवलयाश्वक
दृढाश्व
प्रमोद
हयॆश्व
निकुम्भ
संहताश्वक - दो पुत्र कृशाश्व व रणाश्व
कृशाश्व
युवनाश्व - यह रणाश्व का पुत्र था।
मान्धाता - परम विष्णु भक्त बुद्धिमान शस्त्र धारियों में सर्वश्रेष्ठ वीर्यवान अम्बरीष एवं पुण्यात्मा मुचुकुंद भी इनका पुत्र था। जो युद्ध में इन्द्र के समान था इसी मुचुकुंद ने द्वापर युग मे कालनेमी राक्षस को मारा था।
पुरकुत्स
त्रसदद्स्यु
स्मभूति
अनरण्य
बृहदश्व
हर्यश्व
वसुमना
त्रिधनवा
त्रययारुण
सत्यव्रत
हरिश्चन्द्र - सत्यवादी व वचन के पक्के थे उनहोने अपने स्वपन मे विश्वामित्र रिषी को राज्य दान दे दिया था सो जागृत होने पर वास्तव में ही संकल्प लेकर रिषी को राज्य दान कर दिया परंतु अपना सत्य नही तोडा।
रोहित
हरित
धुधु
विजय
कारुक
वृक
बाहु
सगर - ( दो पत्नियां थी प्रभा तथा भानुमति वर के फलस्वरूप प्रभा के साठ हजार पुत्र व भानुमति के एक पुत्र असमंचस हुआ, कपिल मुनि के शाप से प्रभा के साठ हजार पुत्र भस्म हो गये थे।
राजा सगर जी एक दोहा जो आज भी प्रचलित है प्रतिहार राजपूतों को सूर्यवंशी प्रमाणित करने का।
" सगर खिणाया सागरी, कुआ करोड हजार।
गंग पधारे बारणे, धन धन है प्रतिहार" ।।
असमंचस
अंशुमान
दिलीप
भागीरथ - महादेव की घोर तपस्या करके स्वर्ग से गंगा को पृथ्वी पर अवतरित किया एवं राजा सगर के साठ हजार पुत्रो का गंगा के जल से तर्पण करा के उनहें मोक्ष प्रदान किया।
श्रुतु
नाभागा
सिन्धुदीप
अयूतायु
रितुपर्ण
सुदास
सौदास
अश्मक
नकुल
सतरथ
बिली बिलि
वृद्धशर्मा
विश्वसह
सटवांड
दीर्घबाहु
रघु - सूर्य वंश के महान तेजस्वी पुरुष राजा रघु यही से सूर्यवंशी क्षत्रिय लोग रघुवंशी भी कहलाने लगे।
अज
दशरथ - चार पुत्र थे राम , लक्ष्मण, भरत , शत्रुघ्न ये सभी इंद्र के समान और विष्णु की शक्ति से संपन्न थे।
लक्ष्मण - लक्ष्मण जी हमेशा राम जी के प्रतिहारी रुप मे कार्य करते थे उसी वजह से इनहे प्रतिहार की उपाधि दी गई थी यही से प्रतिहार वंश के आदि पुरुष लक्ष्मण जी से सूर्यवंशी प्रतिहारों का उदभव हुआ है। जिसका उल्लेख प्रतिहार वंश के राजा बाउक, नागभट्ट प्रथम, वत्सराज, मिहिरभोज, महेन्द्रपाल, नागभट्ट द्वितीय, के कई शिलालेखों एवं ताम्रपत्रो मे साफ साफ बताया गया है।
लक्ष्मण के वंशज ही प्रतिहार कहलाये। करापथ ( हिमालय का तराई प्रदेश ) विजय करके धीरे धीरे संपूर्ण भारत में फैलकर जगह जगह राज्य स्थापित किये जैसे - उत्तर प्रदेश, बिहार, कन्नौज, मण्डौर, जालौर, ग्वालियर, उचेहरा, नागौद, हमीरपुर, खनेती, कुमहारसेन, चंदेरी, मियागम, उमेटा, उन्नाव, इटावा, अलीपुरा, पाली, पुष्कर, बाडमेर, उत्तराखंड जुझौती, बुंदेलखंड के प्रतिहार आदि आदि।
टिप्पणी - ये सभी सूर्यवंशी क्षत्रिय है एवं इच्छवाकु के वंशज है। यह वंशावली गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा मुद्रित 'कल्याण' के 71 वें वर्ष सन 1997 का विषेशांक कूर्मपुराणाडंक से ली गई है। आंगे की वंशावली देवी सिंह मंडावा की किताब प्रतिहार एवं उनके साम्राज्य से ली गई है। रामायण काल के बाद कुछ समय का अंतराल है। पर हमे महाभारत काल के धन्य देश के प्रतिहार राजवंश का इतिहास मिलता है। जिसकी जानकारी आंगे प्रस्तुत है।
अंगद
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अंतराल
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यज्ञ प्रतिहार - धन्य देश के प्रतिहार राजा
जोधदेव
सिंह देव
पहाड देव
पृथ्वीदेव
जय द्रुमदेव
समाधीदेव
कुशंगराज
भर्वराज
गुरुपाल
देवानीक
बैनदेव ( चकवैबेन)
योगबल
श्रीपतः
संतकृत
मालकृत
मुखिनकृत
रंजनकृत
प्रहाद
मिहिब
ध्वजमहि
त्रशंकुमहि
अक्षयमहि
वनमहि
भीममहि
मल्लमहि
सवर्णमहि
यशमहि
संगमहि
राममहि
विश्वमहि
संग्राममहि
रंचमहि
ध्वजकृत
मदनकृत
मक्काकृत
यौवनाश
भगदत
सत्यश्रवा
मोरवीन
कमलसेन
सवयंकृत
चम्पकराज
महाबाहु
हरिंद्रराज
पुलिंदराज
कलिंगराज ( कश्मीर विजेता)
शावल्य राज
हरदंत राज
नैनपाल
पदमद्वीप
लहूरमहिप
अचलमहि
दलमहि
भगवंतमहि
सख्तमहि
विक्रममहि
सोहनमहि
हंसमहि
मल्लमहि
गौतममहि
शुक्रपाल
बलराज
उतिमराज
मधुराज
शक्तिमान
गिरिवर धर
बेणीराज
अतिराज
हंसदेव
बछदेव
सामंत देव
कर्ण देव
हरिहर देव
संयमराज
अमर राज
धर्म पाल
चंद्रपाल
कृष्ण पाल
वेणीराज
अनुपम पाल
हरिश्चन्द्र
रज्जिल
नीलभट्ट
सुनीलभट्ट
नरभट
नागभट्ट प्रथम
देवराज
वत्सराज
नागभट्ट द्वितीय
रामभद्र
मिहिरभोज
महेन्द्रपाल
भोज द्वितीय
महीपाल
महेन्द्रपाल द्वितीय
देवपाल
विनायकपाल
महीपाल द्वितीय
विजयपाल
राज्यपाल
त्रिलोचनपाल
यशपाल
बृजपाल
रामपाल
देवराज द्वितीय
मूर्तीपाल
भोजदेव
परिमलदेव
विशालदेव
वीरराजदेव(नागौद राज्य के संस्थापक)
जुगराजदेव सिंह
धार सिंह
किशनदास सिंह
विक्रमादित्य सिंह
भरतचंद सिंह
गुरपाल सिंह
सूरजपाल सिंह
भोजराज सिंह
कर्ण सिंह
प्रतापरुद्र सिंह
नारेंद्र सिंह
भरत सिंह
पृथ्वीराज सिंह
फकीर सिंह
चैन सिंह
अहलाद सिंह
शिवराज सिंह
बलभद्र सिंह
राघवेंद्र सिंह
यादवेंद्र सिंह
नरहरेंद्र सिंह
महेन्द्र सिंह
रुद्रेन्द्र प्रताप सिंह
युवराज शिवेन्द्र प्रताप सिंह ( वर्तमान बरमै गद्दीदार नागौद)
यह क्रमागत वंशावली इच्छवाकु सूर्यवंशी राजा से लेकर नागौद राज्य के प्रतिहार राजपूतों तक की है।
नोट - मित्रो प्रतिहार राजपूतों का इतिहास सैकडो हजारो वर्षो का है। प्राचीन काल मे कोई भी व्यक्ति अपने देश को छोडकर जाता था तो उनके समकालीन लोग उन्हें उनके देश के नाम से पुकारते थे। जिस समय प्रतिहारों का स्वर्णिम युग था तब वे गुर्जारादेश (आधुनिक गुजरात) के राजा थे जिसकी राजधानी भीनमाल थी ।
परिहार/पडिहार/पढियार/पडियार/इंदा/देवल/लूलावत/बडगुजर/मडाढ/खडाढ/कलहंस/जेठवा आदि शाखाएं का इतिहास
जय मिहिरभोज ।। जय नागभट्ट ।।
जय वीरराजदेव ।। जय लक्ष्मणवंशी ।।
प्रतिहार राजपूत ।। सूर्यवंशी क्षत्रिय ।।
जय क्षात्र धर्म ।। जय चामुण्डा देवी ।।

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