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#आज_के_समाज_की_दशा
, भ्रमित समाज लक्ष्यहीन हो जाता है। लक्ष्यहीन समाज में मनमाने तरीके से परम्परा का जन्म और विकास होता है, जो कि होता आया है। मनमाने मंदिर बनते हैं, मनमाने देवता जन्म लेते हैं और पूजे जाते हैं। मनमानी पूजा पद्धति, चालीसाएँ, प्रार्थनाएँ विकसित होती हैं। व्यक्ति पूजा का प्रचलन जोरों से पनपता है। भगवान को छोड़कर संत, कथावाचक या पोंगा पंडितों और नेताओ को पूजा जाता है।
#आज_के_समाज_की_दशा
, भ्रमित समाज लक्ष्यहीन हो जाता है। लक्ष्यहीन समाज में मनमाने तरीके से परम्परा का जन्म और विकास होता है, जो कि होता आया है। मनमाने मंदिर बनते हैं, मनमाने देवता जन्म लेते हैं और पूजे जाते हैं। मनमानी पूजा पद्धति, चालीसाएँ, प्रार्थनाएँ विकसित होती हैं। व्यक्ति पूजा का प्रचलन जोरों से पनपता है। भगवान को छोड़कर संत, कथावाचक या पोंगा पंडितों और नेताओ को पूजा जाता है।
क्षत्रियों के साथ तो इससे भी बुरा हूआ!!
कभी क्षत्रिय एक धर्म था। धर्म की सबसे सुविधाजनक और सर्वजन के समझने लायक परिभाषा “जो धारण करने योग्य है वही धर्म है” और धारण करने योग्य केवल कर्तव्य ही हो सकता हैं।
समय और भौतिक संसाधनों के विकास के साथ साथ बदलाव भी प्रकृति के समानांतर मानव द्वारा बनाई योजनाओं,चेष्टाओं और आशाओं के फलस्वरूप आते ही रहते हैं। समय ने क्षत्रियों के राजप्रासादों मे अश्वमेध यज्ञों को भी देखा है तो कभी दुर्गम गढ़ो मे जौहर की ज्वालाएँ भी देखी हैं। तो कभी कैलाशपुरी मे ब्रितानिया हुकूमत से समझौतों पर दस्तखत करते कृपाणो के अमिट,अविस्मृणीय संचालकों को भी देखा। दिल्लीदरबार की ख़ाली कुर्सीयों को भी काल ने देखा है।
सो बदलाव होगा पर जो गरिमा के अनुरूप नही उसे स्वीकार करना भी महान पराभव की सीढ़ीयों पर क़दम बढ़ाना ही हैं॥
कभी क्षत्रिय एक धर्म था। धर्म की सबसे सुविधाजनक और सर्वजन के समझने लायक परिभाषा “जो धारण करने योग्य है वही धर्म है” और धारण करने योग्य केवल कर्तव्य ही हो सकता हैं।
समय और भौतिक संसाधनों के विकास के साथ साथ बदलाव भी प्रकृति के समानांतर मानव द्वारा बनाई योजनाओं,चेष्टाओं और आशाओं के फलस्वरूप आते ही रहते हैं। समय ने क्षत्रियों के राजप्रासादों मे अश्वमेध यज्ञों को भी देखा है तो कभी दुर्गम गढ़ो मे जौहर की ज्वालाएँ भी देखी हैं। तो कभी कैलाशपुरी मे ब्रितानिया हुकूमत से समझौतों पर दस्तखत करते कृपाणो के अमिट,अविस्मृणीय संचालकों को भी देखा। दिल्लीदरबार की ख़ाली कुर्सीयों को भी काल ने देखा है।
सो बदलाव होगा पर जो गरिमा के अनुरूप नही उसे स्वीकार करना भी महान पराभव की सीढ़ीयों पर क़दम बढ़ाना ही हैं॥

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