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भारतीय इतिहास में बप्पा रावल एक ऐसा नाम है, जिन्होंने जो पाया, अपने बाहुबल के दम पर पाया, अनेक संकटो ओर बाधाओं को पछाड़ते हुए इन्होंने अपना लक्ष्य प्राप्त किया ! पूर्वजो का यश तो इनके पास था, इन्ही के पूर्वजो ने हूणों को भी भारत से खदेड़ा था, लेकिन बप्पा रावल तक आते आते स्तिथि बिल्कुल बदल चुकी थी ! बप्पा जब मात्र 3 साल के थे , तभी इनके पिता को भीलों ने जंगल मे घेरकर मार डाला था !
जिस समय बप्पा रावल का जन्म हुआ था, उसी समय सिंध पर कासिम का हमला भी हुआ था ! चितोड़ की गद्दी पर उस समय मानसिंह नाम का राजा बैठा था! भारत की सीमाओं पर अरबी मल्लेछ लगातार लूट खसोट कर रहे थे, एक भी ऐसा शाशन नही था, जो मल्लेछो को उन्ही की भाषा मे जवाब दे सके !!
मध्ययुग का वह समय , इस समय धर्म के नाम पर ऐसा कलंक अरब की ओर से उठकर आया, जिसकी कलिमा शैतान को भी मात करती है ! यह आवारा, अनपढ़, ओर नैतिकता से हीन लोग एक हाथ मे तलवार और एक हाथ में मशाल लेकर प्रत्येक हिन्दू घर मे घुसे !! यह लोग व्यक्तियों को काटते थे, चीखती चिल्लाती स्त्रियों को व्यभिचार की अग्नि ओर रोते बिलखते बच्चो को गुलामी के व्यापार में घसीटते थे ।ईरान, तुर्किस्तान, अफगानिस्तान और उज्बेकिस्तान के बलपूर्वक बनाये गए इन नए नवेले मुसलमानो ने अरबो की इस लूट में उनका पूरा साथ दे रहे थे ।
भारत मे इससे पहले भी बहुत आक्रमण हुए थे ! पहला झप्पटा इस मल्लेछ गिरोह ने बम्बई के थाने पर मारा था, उस समय भारत की रक्षा पंक्ति मजबूत थी ! एक भी मल्लेछ , जिंदा वापस नही जा पाया !
भारतीयों की यह पुरानी बीमारी रही है , इस गलती को प्रत्येक हिन्दू राजा ने बार बार दोहराया है । इन आतंकवादियों , नरभक्षियों, बलात्कारियों ओर हिंसक पशुओं को उनकी मांद तक खदेड़कर नही मारा , इसी गलती का परिणाम यह था कि 18 - 19 साल का एक लड़का सिंधु नदी के इस पार आ पहुंचा, जिसने सिंध में प्रलय की वर्षा कर दी थी ! इस मल्लेछ ने सिंध में अत्याचार की ऐसी आंधी चलाई की एक लाख स्त्रियों को इसने अपहरण कर अरब वेश्यावर्ती के लिए सप्लाई कर दिया !! सिंध के 90 उपशाशको ( राणाओं ) का पतन हो गया ! खुद राजा दाहिर भी मारा गया ! हिन्दू भवनों ओर मंदिरो को मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया । भारत के गले मे इस्लाम का फंदा इसी मल्लेछ ने डाला था, जो कि अब धीरे धीरे कसता ही जा रहा है । दुर्भाग्य यह है कि भारत अभी भी धर्मनिरपेक्षता की काल्पनिकता की ठंडी छाव में बड़े आराम से सो रहा है । इन्ही हिन्दुओ के सिंध के सूर्यमन्दिर को लूटा गया था, जो धन हिन्दुओ ने ना जाने कितनी पीढ़ियों के श्रम से कमाया था, पलक झपकते ही वह सब लूटकर अरब ले जाया गया ! 40 बड़े घड़े सोने से भरे सूर्यमन्दिर से लुटे गए, यही हर एक मंदिरो का हाल था , किसी मे कुछ ज़्यादा, तो किसी मे कम !! 3 साल तक कासिम सिंध में उत्पात मचाता रहा ! आधी से ज़्यादा सिंध की जनता को इसने मुसलमान बना दिया !
इस मुस्लिम आबादी ओर भारत के बाहर के मुसलमान लगातार भारत की सीमा पर लूट खसोट कर रहे थे !!
इसी काल मे बप्पा रावल का जन्म हुआ था ! आपके बचपन का नाम कालभोज था ! उनके पिता की भीलों द्वारा हत्या हुई थी ! ब्राह्मणो ने 3 साल के बालक कालभोज की रक्षा की , उन्हें भीलों से बचाकर मंडेर के किले में रखा गया, जहां स्वम् कुछ अन्य भीलों ने बप्पा रावल की रक्षा का भार उठाया , लेकिन यहां भी ब्राह्मणो ने कालभोज के जीवन को असुरक्षित महसूस कर उन्हें नागदा भेज दिया गया !!
नागदा में ही कालभोज का बचपन बीता ! भील बालको में खेलकर ही कालभोज बड़े हो रहे थे ! कालभोज हरित नाम के एक ऋषि की गाय चराते , उनकी सेवा करते ! ऋषि हरित का कालभोज के जीवन मे वही महत्व था, जो चंद्रगुप्त के जीवन मे चाणक्य का महत्व था ! इन सब की सम्पूर्ण घटनाओ का विवरण हमे नही मिलता, क्यो की भवनों की जड़ तक खोद कर इतिहास बदलने वाले मल्लेछ पुस्तको में लिखे इतिहास को कहां सुरक्षित रहने देते ! पुस्तको को जलाने में समय ही कितना लगता है, जबकि चितोड़ का किला तो लंबे समय तक यवनों के कब्जे में रहा था, जिसे वीर राजपूतो ने लगातार प्रयास कर इसे दुबारा मुक्त करवाया, ना जाने उस मल्लेछ काल मे इतिहास ओर धर्म की कितनी पुस्तको की आहुति दे दी गयी होगी !!
हमें यही मानकर चलना चाहिए, ऋषि हरित से ही कालभोज को राजपाठ ओर शास्त्रो का ज्ञान प्राप्त हुआ था ! जिसके कारण कालभोज अन्य सभी बालको के समान साधारण नही रह गए थे । कालभोज की धमनियों में पूर्वजो के बहते वीर रक्त को ऋषि हरित ने ही पुनर्जीवित किया ! नेतृत्व , वीरता और धर्म का ज्ञान कालभोज को दिया गया !!
कालभोज अपने वर्ग के सभी लोगो के नेता थे, अपने विचारों से उन्होंने अपने मित्रों में भी अलग स्थान बना लिया था, उनकी बात सुनी जाती ! यहां तक कि लोग उन्हें एक राजा की भांति ही सम्मान देने लगे !! ओर उस छोटे से गांव के राजा थे कालभोज !!
राजस्थान में वसंत ऋतु में फूलो का त्योहार आता है, जिसमे राजकन्याये ओर सभी नागरिक झूले झूलते है । यह कालभोज के बचपन के समय की बात है, फूलो का मेला देखने कालभोज की आये थे, वहां सोलंकी राजा की राजकुमारी भी अपनी सहेलियों के साथ झूला झूलने आयी थी ! राजकुमारी ओर उनकी सहेलियों के पास झूला डालने की रस्सी नही थी, उन सबकी द्रष्टि कालभोज पर पड़ी, ओर कालभोज से रस्सी लाने के लिए निवेदन किया गया !! कालभोज ने शर्त रख दी, की झूला में तभी डालूंगा, जब राजकुमारी मुझसे विवाह करेगी ! बचपन तो बचपन होता है, राजकुमारी ने बालपन की नासमझी में शर्त स्वीकार कर ली, कालभोज ने झूला डाल दिया, ओर उसी पेड़ के चारो ओर सात बार घूम राजकुमारी ने विवाह की शर्त भी पूरी कर दी ! बहुत समय बीत गया, यह घटना भी सभी भूल चुके थे । लेकिन जब राजकुमारी के विवाह के लिए राजा ने पंडित को बुलाकर राजकुमारी की जन्मपत्री आदि देखने को कहा तो पंडित ने कहा, इस कन्या का विवाह तो हो चुका है ! राजा ने जब पता लगाया तो उन्हें ज्ञात हुआ, की कालभोज से ही राजकुमारी ने विवाह किया है । एक ग्वाले के साथ एक राजकन्या का विवाह , यह कैसे संभव था, सोलंकी राजा ने कालभोज के पीछे सेना लगा दी !!
इस बात की भनक कालभोज को भी लग चुकी थी ! उसने अपने सभी साथियों को एकत्रित किया, ओर शपथ दिलवाई की आप बुरी से बुरी परिस्थिति में मेरा साथ देंगे !! सभी मित्रों ने कालभोज का साथ देने का संकल्प किया ओर शपथ ली !!
कालभोज की मित्रसंख्या इतनी भी ज़्यादा नही थी कि वह सोलंकी राजा से सीधे टकरा पाते, अतः बुद्धि का प्रयोग कर कालभोज मौर्यवंश के राजा मानसिंहः के यहां नोकरी करने चले गए ! उनकी कद काठी ओर बुद्धि देखकर मानसिंहः ने अपने यहां कालभोज को नोकरी दी !!
राजदरबार में कालभोज का कद लगातार बढ़ता जा रहा था ! कालभोज ने अपनी बुद्धि और राजनीतिक सोच- समझ से मानसिंहः को बहुत प्रभावित किया था ! लेकिन कालभोज के बढ़ते कद से मानसिंहः के सारे सामन्त मानसिंहः से दूर होने लगे !
728 में उसी समय चितोड़ पर मल्लेछो के चढ़ाई की सूचना चितोड़ राजदरबार को मिली ! सारे सामन्तो ने इस संकट की स्तिथि में राजा मानसिंहः का साथ देने से मना कर दिया ! तब कालभोज ने सेना की कमान अपने हाथ मे लेते हुए कहा .... " जब तक मैं हूँ, राजा, प्रजा ओर अन्य किसी को भी चिंता करने की कोई आवश्यकता नही , कालभोज स्वम् इन मल्लेछो का नाशः करने में सक्षम है ! "
यह आक्रमण किसी ओर का नही, उमय्यद खलीफा का था , इसी साम्राज्य ने कासिम को सेना के साथ भेजकर सिंध कर आक्रमण करवाया था ! गुंडो का यह समूह बहुत विशाल और शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में परिवर्तित हो गया था ! इसी साम्राज्य ने सीरिया से लेकर अरब के क्षेत्र , यूरोप और भारत मे सिंध तक अपना अधिकार स्थापित किया था ! इनकी क्रूरता के विषय मे जानना हो, तो कासिम का सिंध पर आक्रमण सबसे बढ़िया उदारहण है ।
कालभोज ने सेना की कमान अपने हाथों में ली ! जैसलमेर के राजा और कुछ अन्य राजाओ के साथ मिलकर इतना जोरदार धावा मल्लेछो पर बोला गया, की उनकी हिम्मत नही हुई, अगले 300 सालो तक भारत की ओर मुख भी करें, अरबो ने इसी के बाद अपना सारा ध्यान यूरोप और अफ्रीका के क्षेत्रों पर लगाया ! राजपूतो के प्रहारों से मल्लेछ यवन भाग खड़े हुए ! 5 -6 हजार की फौज लेकर बप्पा रावल ने उनका पीछा किया और आक्रमणकारी अमीर जुनैद को मार डाला !
यहां से भी कालभोज वापस चितोड़ नही लौटे ! अभी तो भारत माँ के शरीर पर लगे घावों पर मरहम लगाने का समय आया था ! कालभोज गजनी की तरफ बढ़े, जो उनके पूर्वजो की राजधानी हुआ करती थी ! वहां उनका सामना सलीम से हुआ ! कालभोज के पराक्रम के आगे सलीम को पांव सिर पर रखकर गजनी छोड़ भागना पड़ा ! सिंध से सभी मल्लेछो को खदेड़ दिया गया ! अब मुस्लिम भारत पर आक्रमण करने का साहस नही कर रहे थे, बल्कि उनके घर मे घुसकर कालभोज ने हिन्दू वीरता का परचम लहरा दिया , क्या ईरान और क्या तुर्किस्तान , ओर क्या अरब , ऐसा एक प्रदेश नही छोड़ा, जिसे कालभोज ने अपनी तलवार के तेवर ना दिखाए हो !!
इसी काल मे " रावलपिंडी " नगर भी बप्पा रावल ने बसाया ! पूरे भारत मे से मल्लेछो को खदेड़ खदेड़ कर मारा !
चारो ओर विजयअभियान चलाने के बाद कालभोज चितोड़ लौट आये ! जहां अब सारे सामन्त कालभोज के आगे पीछे घूम रहे थे ! इतिहास में एक नए सूरज का उदय हो चुका था ! जिसका नाम था कालभोज !! चितोड़ के राजसिंहासन पर कालभोज का राजतिलक किया गया !
अरबो को परास्त करने की खुशी कालभोज में भले ही थोड़ी कम हो, लेकिन हिन्दू प्रजा के लिए कालभोज वीरता का दूसरा नाम बन गए थे ! मल्लेछो को बहुत समय बाद किसी ने इस तरह उनके घर मे घुसकर रंगेद कर मारा था ! राजा बनने के साथ ही जनता ने उन्हें " हिन्दुसूर्य " की उपमा देकर उन्हें सम्मानित किया
सिंध से लेकर गजनी तक पहुंचकर कालभोज ने हिन्दुओ की रक्षा की ! कालभोज मुसलमानो से घृणा करते थे ! युद्ध के दौरान कोई दयाभाव इन्होंने मल्लेछो के प्रति नही दिखाया था । रावलपिंडी को मेवाड़ के मुख्यकेन्द्र बनाकर यहीं से कालभोज ईरान, इराक, अरब , खुरासान पर लगातार हमले करते रहे ! इन्ही युद्धों में 35 मुस्लिम कन्याओं से भी इन्होंने विवाह किया, विवाह नाम वामपंथियों ने दिया होगा, एक राजपूत कभी मल्लेछ को पत्नी नही बनाता, सत्य यही है, की मुस्लिम राजकन्याओं को कालभोज ने बांदी बनाकर अपने महल में रखा !
शुरुवात में हार के बाद खलीफा भारत पर , ओर खासकर राजस्थान के राजपूताने पर हमले की योजना लगातार बनाता, लेकिन हर बार कालभोज उन्हें सिंधु के उस पार धकेल देते !
अपने देश को सुरक्षित कर अब बारी थी अपने राष्ट्र के विकाश की ! कालभोज के समय मे आर्थिक उन्नति का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके काल मे भारत मे सोने के सिक्के चलाये गए ! जिनपर अपने बछड़े को दूध पिलाती गाय अंकित थी ! यह कालभोज कि आर्थिक नीति को प्रदर्शित करता है, की गौ-पालन और गौ- रक्षा पर उन्होंने विशेष ध्यान दिया था !
जिस काल मे सोने के सिक्के चल रहे हो, उसकाल की उन्नति के बारे में अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है ! बप्पा रावल द्वारा निर्मित रावलपिंडी के किले को वर्तमान विश्वधरोहर में शामिल किया गया है , हालांकि मुस्लिम चापलूस इतिहासकारों ने चाटुकारिता की स्याही से इस किले के निर्माण का श्रेय मुस्लिम शाशन को दिया है , लेकिन यह सब कौरी बकवास ओर काल्पनिक बातें है, मुसलमानो ने यहां किले तो क्या, एक दीवार तक भारत मे खड़ी नही की होगी !
उत्तम सामाजिक व्यवस्था , न्याय की स्थापना , ओर कालभोज की वीरता के आगे पूरा भारत नतमस्तक हो गया ! लेकिन कालभोज को अहंकार ने कभी नही छुवा, साधारण जनता से भी कालभोज एक पिता की भांति भेंट करते ! प्रजा ओर कालभोज का सम्बन्ध पिता- पुत्र का हो गया ! पूरा भारत उन्हें महाराज कालभोज के स्थान पर प्रेम पूर्वक बप्पा ही कहने लगा, जिसका अर्थ पिता ही होता है । रावल एक राजकीय उपाधि है । हिन्दुसूर्य के अलावा कालभोज की राजनीतिक सूझबूझ कर कारण उन्हें " राजगुरु " की भी उपाधि मिली !
बप्पा रावल के जन्म की तारीखों के बारे में अनेक इतिहासकारों के अलग अलग मत है ! लेकिन इन सब बहस को पीछे छोड़ कर बप्पा रावल के जीवन चरित्र और युद्ध कौशल पर बात की जाए तो बप्पा रावल की विजय भारत की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण थी । उन्ही के आक्रमणों से भयभीत होकर मुसलमानो ने 300 साल भारत की ओर मुंह नही किया ! इन अरब मुस्लिम गुंडो को इस बार सवा शेर मिला था , जिन्होंने मुसलमानो को ना केवल हराया बल्कि अरब तक घसीटकर इनको मारा भी । जो धन अरब के लोग यहां से लूटकर ले गए थे, बप्पा रावल बहुत कुछ हिस्सा अरब से लूटकर वापस भारत ले आये । अरब ईरान के लोग जो जहां से माणक मोती लूटकर ले गए थे, वे फिर से भारत बप्पा रावल की वीरता के कारण आ पाए ! मुसलमानो को हराकर बप्पा रावल ने ही विश्वभर में यह संदेश दे दिया था कि अरब अपराजित नही है , अगर आपमें वीरता और संघर्ष करने की क्षमता हो, तो इन्हें भी पराजित किया जा सकता है । कहाँ हिन्दू राजा सिंध को सुरक्षित नही कर पा रहे थे, ओर कहाँ बप्पा रावल ने ना केवल सिंध को बचाया, बल्कि अरब तक पहुंचकर मुसलमानो के परखच्चे उड़ा दिए !
लगभग 30 वर्ष शाशन करने के बाद बप्पा रावल ने सारे मोह, लोभ का त्याग कर सन्यास धर्म मे प्रवेश किया ! नागदा में उन्होंने अपनी अंतिम स्वास ली ! वहां आज भी समाधि बनी हुई है ।
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