भारत की महान् वीरांगना #रानी__दुर्गावती
- डॉ. जितेन्द्रकुमार सिंह 'संजय'
भारतीय नारियों ने अपने त्याग-बलिदान एवं चरित्र-बल से प्रत्येक कालखण्ड में विलक्षण इतिहास रचे हैं। यमराज के चंगुल से अपने पति सत्यवान को छुड़ा लानेवाली सती सावित्री, अपने वैदुष्य का कीर्तिध्वज स्थापित करनेवाली गार्गी-अपाला-घो
रानी दुर्गावती कालिंजर के चन्देल शासक राजा कीरतपाल की पुत्री थीं। कालिंजर दुर्ग में 5 अक्टूबर, 1524 ई. को दुर्गाष्टमी के शुभ मुहुर्त में जन्म लेने के कारण इनका नाम दुर्गावती रखा गया। दुर्गावती को तीर तथा बन्दूक चलाने का अच्छा अभ्यास था। चीते के शिकार में इनकी विशेष अभिरुचि थी। राजकुमारी दुर्गावती में नामानुरूप तेज, साहस, शौर्य एवं सौन्दर्य विद्यमान था। दुर्गावती का विवाह गोंड़वाना के राजा संग्राम शाह के सुयोग्य, वीर एवं नीति-निष्णात पुत्र राजा दलपत शाह के साथ हुआ। दुर्भाग्यवश विवाह के चार वर्ष बाद ही राजा दलपत शाह का निधन हो गया। उस समय रानी दुर्गावती की गोद में तीन वर्षीय पुत्र राजकुमार वीरनारायण थे। अतः रानी दुर्गावती ने स्वयं ही गढ़मण्डला का शासन-सूत्र सँभाल लिया। सिंहासनारूढ़ होते ही रानी दुर्गावती ने अपने पितृकुल चन्देल राजवंश की लोकमंगलकारी परम्पराओं को अपने राज्य में चरितार्थ करने का संकल्प लिया। चन्देल राजवंश के महान् शासक यशोवर्मन, धंग, गण्ड, विद्याधर एवं कीर्तिवर्मन के स्फीत रक्त का अहर्निश संचरण रानी दुर्गावती की शिराओं में हो रहा था। पितृकुल के अभिजात्य संस्कार रानी दुर्गावती में कूट कूटकर भरे थे। शासकीय गुण कुल-परम्परा से प्राप्त थे। प्रजा का पुत्रवत् पालक करना चन्देल राजवंश में धर्म समझा जाता था। इसलिए रानी दुर्गावती ने लोकमंगल को ध्यान में रखते हुए अनेक मठ-मन्दिर, कुएँ, बावड़ी और धर्मशालाओं का निर्माण करवाया। वर्तमान जबलपुर उनके राज्य का केन्द्र था। उन्होंने अपने नाम पर 'रानीताल', अपनी दासी के नाम पर 'चेरीताल' एवं अपने विश्वस्त दीवान आधार सिंह के नाम पर 'आधारताल' का निर्माण करवाया।
रानी दुर्गावती की वीरता का आख्यान उनके प्रथम युद्ध से ही सम्पूर्ण भारतवर्ष में प्रसिद्ध हो गया था। शेरशाह की मृत्यु के बाद सुरत ख़ान ने उसका कार्यभार सँभाला जो उस समय मालवा गणराज्य पर शासन कर रहा था। सुरत ख़ान के बाद उसका पुत्र बाजबहादुर मालवा की गद्दी पर बैठा, जो रानी रूपमती से प्रेम करने के लिए प्रसिद्ध हुआ था। सिंहासन पर बैठते ही बाजबहादुर की दृष्टि रानी दुर्गावती के समृद्ध राज्य पर टिक गयी। उसे एक महिला शासक को परास्त बहुत आसान लग रहा था इसलिए उसने रानी दुर्गावती के राज्य पर आक्रमण कर दिया। सुल्तान बाजबहादुर की सेना समरांगण में रानी दुर्गावती के समक्ष नहीं टिक सकी। बाजबहादुर के विरुद्ध इस युद्ध में विजयी होने के कारण मध्यभारत में रानी दुर्गावती के शौर्य का डंका बजने लगा था। अब हर कोई रानी दुर्गावती के राज्य को प्राप्त की कामना करने लगा था, जिसमें एक मुग़ल सूबेदार अब्दुल माजिद ख़ान भी था। ख़्वाजा अब्दुल मजिद आसफ़ ख़ान काड़े मणिकपुर का शासक और रानी दुर्गावती का पड़ोसी था। जब उसने रानी दुर्गावती के खजाने के बारे में सुना तो उसने गढ़मण्डला पर आक्रमण करने का विचार बनाया।
वासना की प्रतिमूर्ति और तथाकथित महान् शासक अकबर ने भी रानी दुर्गावती के रूप-सौन्दर्य के विषय में सुन रखा था। वह गढ़मण्डला को जीतकर रानी दुर्गावती को अपने 'हरम' में डालना चाहता था। उसने विवाद प्रारम्भ करने के लिए रानी दुर्गावती के प्रिय सफ़ेद हाथी 'सरमन' और उनके विश्वस्त दीवान आधार सिंह को भेंट के रूप में भेजने को कहा। रानी दुर्गावती को को बादशाह अकबर की यह माँग असह्य थी। इसलिए उन्होंने अकबर की माँग को ठुकरा दिया। सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. सच्चिदानन्द भट्टाचार्य ने अपने 'भारतीय इतिहास कोश' में लिखा है- '1564 ई. में मुग़ल सम्राट् अकबर ने रानी के राज्य पर हमला करने के लिए अपने सेनापति आसफ़ ख़ां को भेजा। पुत्र को साथ लेकर रानी ने मुग़लों की 50 हज़ार सेना का सामना किया। दोनों के बीच राजधानी के पास नरही में घोर युद्ध हुआ। युद्ध के दूसरे दिन उसका पुत्र घायल हो गया, जिसे रानी के सैनिकों की देखरेख में सुरक्षित स्थान पर भेज दिया गया। इन सैनिकों के जाने से रानी का पक्ष कमज़ोर हो गया और वह पराजित हो गयी। उसके दो तीर लगे और वह घायल हो गयी। शत्रुओं के हाथ में अपने को पड़ने से बचाने के लिए रानी ने कटार मारकर अपनी जान दे दी। इसके बाद मुग़ल सेना राजधानी चौरागढ़ की ओर बढ़ी। वहाँ उसके घायल अल्पवयस्क पुत्र ने पुनः जबर्दस्त प्रतिरोध किया, लेकिन बेचारा पराजित हुआ और मारा गया। गोंड़वाना अकबर के साम्राज्य में मिला लिया गया। सेनापति आसफ़ ख़ां अपने साथ बेसुमार सोना, चाँदी, हीरे, जवाहरात, सिक्के और एक हज़ार हाथी लेकर दिल्ली लौटा। यह इस बात का प्रमाण है कि रानी के राज्यकाल में गोंड़वाना अत्यन्त समृद्धशाली था।' (भारतीय इतिहास कोश, पृ. 208)।
डॉ. सच्चिदानन्द भट्टाचार्य ने रानी दुर्गावती के सम्बन्ध में सूचना देते हुए लिखा है कि रानी का पुत्र बाद में मरा, किन्तु यह सत्य नहीं है। आसफ़ ख़ां से युद्ध भी दो बार हुआ है। जब प्रथम बार सेनापति आसफ़ ख़ां ने आक्रमण किया था, तब रानी दुर्गावती ने अपने मन्त्री को सम्बोधित करते हुए कहा- 'कलंकित जीवन जीने की अपेक्षा शान से मर जाना अच्छा है। आसफ़ ख़ां जैसे सूबेदार के सामने झुकना लज्जा की बात है।' इसके बाद रानी दुर्गावती सैनिक वेश में अश्वारूढ़ हो निकल पड़ीं। रानी दुर्गावती को सैनिक वेश में देखकर आसफ़ ख़ां के होश उड़ गये। रणक्षेत्र में रानी दुर्गावती के सैनिक उत्साहित होकर शत्रुओं को गाजर-मूली की तरह काटने लगे। रानी भी शत्रुओं पर टूट पड़ीं। देखते ही देखते दुश्मनों की सेना मैदान छोड़कर भाग निकली। आसफ़ ख़ां बड़ी कठिनाई से अपने प्राण बचाने में सफल हुआ। सुकवि डॉ. शिवमंगल सिंह 'मंगल' ने 'रानी दुर्गावती' नामक प्रलम्ब कविता में बड़े रोचक ढंग से इन सन्दर्भों को रेखांकित किया है-
रानी जब उतरे किले द्वार,
आभा ऐसी दिखलायी दी।
साक्षात् दुर्गा ही आकर,
तब मानो विजय बधाई दी।।
जब पुरुष वेश रानी दुर्गा,
रणभूमि दिखायी देती थी।
तलवार चमकती चम चम चम,
तो जीत दिखायी देती थी।।
जब युद्धभूमि में रानी,
थी झड़ी लगायी बाणों से।
तो घबराहट में आसफ़ ख़ां
के सैनिक अटके प्राणों से।।
रणवीरों का वह चीत्कार
जो साफ़ सुनायी देता था।
रानी का घोड़ा जिधर मुड़ा
मैदान दिखायी देता था।।
तीन बार आसफ़ ख़ां भागा,
रानी ने मन में क्या ठानी।
हाँ, बादशाह अकबर से जो,
थी अविजित, हार नहीं मानी।।
सेनापति आसफ़ ख़ां की बुरी तरह हार सुनकर अकबर बहुत लज्जित हुआ। डेढ़ वर्ष बाद उसने पुनः आसफ़ ख़ां को गढ़मण्डला पर आक्रमण करने भेजा। रानी दुर्गावती और आसफ़ ख़ां के मध्य भयंकर युद्ध हुआ। तोपों का बार होने पर भी रानी दुर्गावती हिम्मत नहीं हारीं। उन्होंने मुग़ल-तोपचिंयों
रानी दुर्गावती अपनी राजधानी चौरागढ़ में विजयोत्सव मना रही थीं। उस समय गढ़मण्डला के एक सरदार ने रानी दुर्गावती के साथ विश्वासघात करते हुए गढ़मण्डला का सारा भेद आसफ़ ख़ां को बता दिया। भारतीय संस्कृति एवं इतिहास के अद्वितीय विद्वान् महामहोपाध्याय अरुणकुमार उपाध्याय लिखते हैं- 'भारत के स्वाधीनता संग्राम में महाराणा प्रताप जैसा ही रानी दुर्गावती का भी योगदान है। यदि उनके दो नौकर अकबर के लिए जासूसी नहीं करते तो भारत उसी समय स्वाधीन हो गया रहता। उनको इनाम में अकबर ने पहली बार नमकहरामी जागीर दी थी- काशी और मिथिला का राज तथा बाल ठाकरे के परिवार के इतिहास के अनुसार नासिक की किलेदारी भी। रानी दुर्गावती का विस्तृत वर्णन बाबू वृन्दावनलाल वर्मा के ऐतिहासिक उपन्यास में है तथा नमकहरामी जागीर का आदेश भी।' रानी दुर्गावती के प्रति विश्वासघात करनेवाले सन्दर्भ को रेखांकित करते हुए डॉ. मंगल लिखते हैं-
आसफ़ ख़ां ने कूटनीति से,
फूट सैनिकों में डाली तब।
बाग़ उजड़ते लगी न देरी,
है रूठ गया वह माली अब।।
विश्वासघात होने पर भी,
रानी ने धीरज ना छोड़ा।
शत्रु-सैन्य की ओर तुरत ही,
अपने घोड़े को तब मोड़ा।।
रानी दुर्गावती ने अपने अल्पवयस्क पुत्र वीरनारायण शाह के नेतृत्व में सेना भेजकर स्वयं एक टुकड़ी का नेतृत्व सँभाला। शत्रुओं के छक्के छूटने लगे। उसी बीच रानी दुर्गावती ने देखा कि उनका 15 वर्षीय पुत्र वीरनारायण शाह घायल होकर घोड़े से गिर गया है। फिर भी रानी दुर्गावती विचलित नहीं हुईं। सैनिकों ने वीरनारारण शाह को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाकर रानी दुर्गावती से निवेदन किया कि वे अपने पुत्र का अन्तिम दर्शन कर लें। तब रानी दुर्गावती ने उत्तर दिया- 'यह समय पुत्र से मिलने का नहीं है। मुझे खुशी है कि मेरे वीर पुत्र ने युद्धभूमि में वीरगति का वरण किया है। मैं उससे स्वर्ग में ही मिलूँगी। राष्ट्रवादी मूल्यों के रक्षक कवि डॉ. शिवमंगल सिंह 'मंगल' ने लिखा है-
ख़बर मिली है पुत्र-मृत्यु की,
तत्क्षण रानी सहम गयी है।
किन्तु हुआ कर्तव्य-बोध तो,
हृदय-ज्वाल भी भड़क गयी है।।
कह दिया सैनिकों से तुरन्त,
मैं स्वर्ग पुत्र से मिल लूँगी।
यों काट हज़ारों शत्रु अभी,
अपना तब ही मैं दम लूँगी।।
पुत्र वीरनारायण की वीरगति ने रानी दुर्गावती को रणचण्डी बना दिया। दुगुने उत्साह से तलवार चलने लगी। तभी दुश्मनों का एक बाण रानी दुर्गावती की आँख में जा लगा और दूसरा तीर रानी की गर्दन में लगा। रानी दुर्गावती समझ गयीं कि अब मृत्यु निश्चित है। यह सोचकर कि जीते जी दुश्मनों की पकड़ में न आऊँ, उन्होंने अपनी ही तलवार से अपनी जीवन-लीला समाप्त कर ली। 24 जून, 1564 ई. को रानी दुर्गावती द्वारा अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए किये गये बलिदान का वर्णन करते हुए डॉ. शिवमंगल सिंह 'मंगल' लिखते हैं-
आँखों में ज्वाला धधक उठी,
उर में अदम्य भर जोश उठा।
लगता ऐसा धर रूप आज,
पंचानन का आक्रोश उठा।।
धरती डोली, गिरिराज डिगे,
कम्पित लहरें फुंकार उठीं।
रुक गयीं वायु की स्वास तभी,
जब क्षत्राणी ललकार उठीं।।
मुँह लाल लाल आँखें रक्तिम,
उन्मादी-सी वह डोल रही।
दुर्गा का देखा रौद्र रूप,
सेना तब जय जय बोल रही।।
जब शत्रुजनों ने घेर लिया,
तो रानी ने तलवार लिया।
कर गढ़मण्डल को नमस्कार,
अपनी गर्दन पर वार किया।।
मुग़ल शत्रु जिसके शरीर को,
जीवित छू भी नहिं पाये थे।
उस बलिदानी रानी दुर्गा,
के यशोगीत सब गाये थे।।
निश्चय ही रानी दुर्गावती भारत की एक ऐसी वीरांगना थीं, जिनके शौर्य और साहस के सम्मुख मुग़ल बादशाह अकबर की चतुरंगिणी को भी लोहे के चने चबाने पड़े। बड़े मुश्किल से दुरभिसन्धि के बाद मुग़ल सेना को सफलता भले ही मिल गयी, किन्तु रानी दुर्गावती अपने त्याग-बलिदान एवं मातृभूमि-रक्षार
आज भारत को ऐसी ही बेटियों की आवश्यकता है, जो राष्ट्ररक्षा हेतु अपना सर्वस्व न्यौछावर कर सकें। आज भारतीय बेटियों को रानी दुर्गावती जैसी महान् वीरांगना को अपना रोलमाॅडल बनाने की आवश्यकता है। इसलिए राष्ट्रकवि डॉ. बृजेश सिंह ने रानी दुर्गावती के कीर्ति-ब्याज से सम्पूर्ण जैजाक्भुक्ति (बुन्देलखण्ड) का स्मरण किया है-
ख़ूनी खेल खेलने में बेटियाँ भी माहिर थीं,
रूपरेखा रचती थीं युद्धवाले खेल की।
बजते जुझारू वाद्य मारू नामवाले रोज़,
टूटती दीवालें थीं फिरंगियों के जेल की।
चूड़ीवाले हाथों में कटारें सज जातीं जब,
गति तब मन्द होती विद्युतीय रेल की।
यशोब्रह्म धंग गण्ड विद्याधर की क़सम,
भूमि है पुकारती जुझौती के चन्देल की।।
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