#जरूर__पढ़ें___वीरों_की_दास्तान
#सुमेल-गिरी युद्ध :
मारवाड़के 6 हजार योद्धाओं ने पीछे हटने को मजबूर कर दिया था शेरशाह की 80 हजार से ज्यादा मुगल सेना को
बोल्यो सूरी बेन यू, गिरी घाट घमसाण ।
मुट्ठी खातर बाजरो , खो देतो हिंदवाण।।
शेरशाहसूरी को “एक मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिंदुस्तान की सल्तनत खो देता’ कहने के लिए मजबूर करने वाले मारवाड़ के रण बांकुरों के शौर्य की साक्षी रही सुमेल गिरी रणभूमि इतिहास के पन्नों में अपने गौरव के लिए जानी जाती है। पहाड़ी दर्रों के बीच हुए हल्दी घाटी युद्ध से भी 32 साल पूर्व मारवाड़ के पहाड़ी मैदान में लड़ी गई इस लड़ाई के जांबाज राव जैता, राव कूंपा, राव खींवकरण, राव पंचायण, राव अखैराज सोनगरा, राव अखैराज देवड़ा, राव सूजा, मान चारण, लुंबा भाट अलदाद कायमखानी सहित 36 कौम के लगभग 6 हजार (कुछ किताबों में 12 हजार) सैनिकों ने शेरशाह की 80 हजार सैनिकों की भारी भरकम सेना का डटकर मुकाबला किया। शासक मालदेव के प्रति विश्वास और जन भावना से उपजे जोश के बूते इन जांबाजों ने सीमित संसाधनों के बावजूद अपना रण कौशल दिखाया। इससे शेरशाह के सैनिकों में भगदड़ मच गई। छोटी सेना के बड़े पराक्रम को भांप कर शेरशाह के सैनिकों ने उनको गिरी-सुमेल छोड़ने की सलाह दे दी। हालांकि बौखलाए शेरशाह को तब यह कहना पड़ा कि “एक मुट्ठी बाजरे के लिए वह दिल्ली की सल्तनत खो देता।’ इस रण में मारवाड़ के पराक्रमी जांबाज शहीद हो गए, लेकिन इनका युद्ध कौशल साक्षी रहा युद्ध स्थल इतिहास का अध्याय बन गया। इस धरोहर को पुरातत्व पर्यटन ऐतिहासिक पेनोरमा के तौर विकसित होने का आज भी इंतजार है।
युद्धके दौरान यह कूटनीति रही थी शेरशाह की
मालदेवके नाम पर जाली पत्र लिखवाकर उनके पड़ाव के बाहर तक पहुंचाए। इनमें अग्रणी सैनिकों की ओर से मालदेव के साथ विश्वासघात की बात लिखी गई थी। बताते हैं कि इन पत्रों की जानकारी भी कूटनीतिक अंदाज में मालदेव तक पहुंचाई गई। इतिहासकारों के अनुसार तब वे आशंका में चले गए। तब राव जैता, राव कूंपा, राव खींवकरण, राव पंचायण, राव अखैराज सोनगरा, राव अखैराज देवड़ा, राव सूजा, मान चारण, लुंबा भाट अलदाद कायमखानी सहित अग्रणी सैनिकों ने शेरशाह की सेना का मुकाबला करने का संकल्प लिया।
रण स्थली के विकास के लिए हो रहे प्रयास
गिरीबलिदान दिवस समारोह समिति के संयोजक कानसिंह राठौड़ उदेशी कुआं मारवाड़ महिला शिक्षण संस्थान खिमेल के अध्यक्ष नारायणसिंह आकड़ावास ने बताया कि इस युद्ध स्थली के साथ-साथ पराक्रमियों को इतिहास में उचित स्थान दिलाने के लिए 5 जनवरी 18 को यहां बलिदान दिवस मनाया जा रहा है। साथ ही इस रण स्थली के विकास के लिए भी प्रयास किया जा रहे हैं। इसको लेकर भगवतीसिंह निंबाज, रामसिंह राठौड़ हाजीवास, अमरजीतसिंह राठौड़ निमाज, भगवतसिंह मोहरा, मानवजीतसिंह, हनुमानसिंह भैसाणा, नारायणसिंह चौकडिया, चैनसिंह बलाड़ा, रसाल कंवर, शोभा चौहान, गिरिजा राठौड़, रश्मि सिंह, सुमेरसिंह कुंपावत राजेंद्रसिंह देवड़ा सहित कई लोग जुटे हैं।
मालदेव के साम्राज्य विस्तार को रोकना चाहता था शेरशाह, इसीलिए हुआ था गिरी सुमेल युद्ध
दरअसल,शेरशाह किसी भी तरह मालदेव के साम्राज्य विस्तार को रोकना चाहता था। नागौर, मेड़ता, अजमेर, जालोर, सिवाना, भाद्राजून बीकानेर आदि पर मालदेव के अधिकार को देखते हुए शेरशाह मारवाड़ विजय के लिए 80 हजार सैनिकों के साथ निकल पड़ा। इसकी सूचना मिलने पर मालदेव भी अपने लगभग 40 हजार सैनिकों की सेना के साथ निकल पड़े। रणनीतिक कारणों से शेरशाह ने जोधपुर कूच के लिए जैतारण रियासत की सुमेल की पहाडिय़ों के बीच पड़ाव डाला। यहीं से कुछ दूरी पर गिरी के पास मालदेव अपनी सेना के साथ गए। एक दो माह तक यहां दोनों सेनाओं का पड़ाव रहा। आखिर शेरशाह के सैनिकों उनके घोड़ों के लिए राशन की समस्या खड़ी हो गई। ऐसे में शेरशाह ने युद्ध की पहल की बजाय कूटनीति से काम लिया।
... तब शेरशाह बौखला गया
जोशभरे पराक्रम के साथ लगभग 12 हजार सैनिकों की टुकड़ी रात में ही शेरशाह को तलाशने निकल पड़ी। अंधेरी रात में रास्ता भटकने से लगभग 6 हजार सैनिक ही शेरशाह की सेना तक पहुंच पाए, लेकिन पराक्रम ने शेरशाह के सैनिकों में खौफ पैदा कर दिया। तब शेरशाह को उनके सैनिकों ने मैदान छोड़ने की सलाह दी। शेरशाह निर्णय करता तब तक जलाल खां एक अतिरिक्त सैन्य बल के साथ वहां पहुंचा। इस युद्ध में मारवाड़ के पराक्रमी वीरगति को प्राप्त हुए। कहा जाता है कि इस युद्ध में शेरशाह के हजारों सैनिक मारे गए। इसके बाद शेरशाह आगे निकल गया।
^शासक के प्रति विश्वास भाव बरकरार रखने के लिए कर्तव्य दायित्व कुछ दिखाने का जोश यह युद्ध दर्शाता है। इस प्रेरणा स्थल को इतिहास पटल पर पुरातत्व सर्वे, इतिहास पर्यटन पेनोरमा के रूप में महत्व मिलना चाहिए। -समंदरसिंह बांता, संयोजक, अखिल भारतीय क्षत्रिय श्रीसंघ, पाली
^ सुमेल गिरी के युद्ध में चारों ओर से घेर कर भोज्य सामग्री रोकने की नीति का उपयोग किया गया। इस युद्ध में कुटनीति पराक्रम का जूनुन देखने को मिलता है। इतिहास के इन स्वर्णिम पृष्ठों को उचित महत्व मिलना चाहिए। -जसवंतसिंह, व्याख्याता बांगड़ कॉलेज, पाली
गिरी. झीर्ण शीर्ण हालत में सुमेल स्थित शहीदों की छतरियां।
474वाँ बलिदान दिवस,सुमेल (रायपुर तहसील,पाली)। 5 जनवरी 2018
श्री राजपाल सिंह जी, उद्योग मंत्री, राजस्थान सरकार। संत शिरोमणि समतारामजी महाराज। पूर्व सांसद (राजसमंद क्षेत्र) श्री गोपाल सिंह जी ईडवा। पूर्व ज़िला प्रमुख श्री ख़ुशवीर सिंह जी जोजावर। पशु पालन बोर्ड अध्यक्ष श्री गोर्धन रायक जी। एवं 36 क़ौम के गणमान्य व्यक्ति श्रधांजलि अर्पित करने पधारे।
जय राजपूताना
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