क्यो लगाते है राजपूत अपने नाम के आगे सिंह ----
राजपूत अपने नाम के आगे सिंह क्यो लगाते है, इसको लेकर बहुत ही गलत गलत अपवाह उड़ाई जाती है । वास्तव में राजपूत सिंह क्यो लगाते है, इसके लिए आपको प्रकृति को समझना होगा ।
अगर आप नाड़ी, प्रकति समझते, तो जरूर जानते कि राजपुत अपने नाम के आगे सिंह क्यो लगाते है।
इसके लिए हमे प्रकृति को समझना होगा ।
जीवन मे हमारे सबसे महत्वपूर्ण होते है - सूर्य और चन्द्र । अगर आप इंगला पिंगला नाड़ियों के बारे में जानते, तो सिंह का अर्थ भी समझते ।
सूर्य ज्ञान और वैराग्य की निशानी है, लेकिन सूर्य का ताप भी ऐसा है, जो आवेश में आने के बाद सब कुछ जलाकर भस्म कर देता है, उसको बेलेंस बनाने के किये चन्द्र की आवश्यकता है । क्यो की सूर्य पुरुष तत्व है, ओर उसको बेलेंस चन्द्र करता है । चन्द्र स्त्रीतत्व है । जिसमे मातृत्व का भाव है, दया है, करुणा है , सांसारिक सुख दुख को अनुभति है ।
यही कारण था कि सूर्यवंशी राजा राम को अपने नाम के आगे चन्द्र लगाना पड़ता था । ओर यही श्रीरामचन्द्र जब क्रोधित होते थे, तो धरती डोलती थी । और जब प्रेम में होते, तो पत्थर भी तीरा देते, किसी के झूठे बैर भी खा लेते ।
अब आते है मूल पर । अगर सूर्य पुरुष है - ज्ञान का प्रतीक है । तो अकेले सूर्य से हमारा काम नही चल सकता, उस ज्ञान को सुरक्षित रखने के लिए शक्ति तो चाहिए !! शक्ति तो माता का नाम है , अर्थात हमे जितनी भी शक्तियां मिलती है, वह मातृशक्ति से मिलती है। शेर शक्ति का प्रतीक है , इसीलिए माता की सवारी भी है।
नोट - मैं यहां तत्वों की बात कर रहा हूं - ना की लिंग की ।
वास्तव में यह सिंह इसीलिए लगाते है, की सूर्य चन्द्र का बैलेंस बना रहे। ओर यह सब प्रतीक चिन्ह होते है । जैसे राजपूतो का जो पहचान चिन्ह है, सबका अलग अलग है, उसपर तरह तरह के जानवर है, जो किसी न् किसी शक्ति का प्रतिनिधित्व करते है।
जो महत्व राम नाम के आगे " चन्द्र " का है, वहीं महत्व राजपूतो के नाम के आगे " सिंह " का है , क्यो की चन्द्र ओर सिंह दोनो ही ( शक्ति + मातृत्व ) का प्रतीक है।
अब जो लोग यह कहते है कि मुगलो या अंग्रेजो में सिंहः उपाधि दी, तो उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि विक्रमादित्य परमार के दरबार के नवरत्नों में एक नाम अमर सिंह था, उस समय ना तो मुसलमानी धर्म का जन्म हुआ था, ओर ना ही ईसाई धर्म का, ओर जब इन दोनो धर्मो का जन्म हुआ, तो इन्होंने हिन्दुओ को " कुत्ता " हरामजादा " चोर " " हरामी " यही कहा, वनराज, सिंहः उपाधि देकर शत्रु कभी आपका आत्मविश्वास बढ़ाएगा क्या ?
जब आपमें इतनी ही अक्ल नही की शत्रु कभी आपका सम्मान नही कर सकता, ओर वह भी तब जब शत्रु म्लेच्छ हो।
आप राजपूतो को नीचा दिखाने के किये कितने प्रोपगेंडा चलाएंगे ??
यहां तो बाल्मीकि रामायण में भी श्रीरामचन्द्र को सिंह पुरुष कहा गया है ।
जब गौरी भी यहां नही आया था, तब आल्हा के एक भाई का नाम था - उदलसिंह ,ओर आल्हा के एक मित्र जिन्हें वह काका भी कहता था, जो बनारस का राजा था, उसका नाम था - तलनसिंहः राय । फिर यह सिंह मुगलो या अंग्रेजो का दिया कब से हो गया ?
ओर यदि शत्रु भी राजपूतो का शौर्य देखकर उन्हें शेर कहे, तो यह तो सम्मान की बात थी। क्या कुत्ता, गधा, या कुछ और कहते शत्रु हमारे लोगो को, तब आपके कलेजे को ठंडक मिलती क्या ?
आपने सोचा कभी, आपकी सोच कितनी नीचे गिर चुकी है ???

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