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#राजपूतानी_सिर्फ_जौहर_नही_युद्ध_भी_करती_थी

#राजपूतानी_सिर्फ_जौहर_नही_युद्ध_भी_करती_थी
राजपूतनीयों के युद्ध कला पर ही प्रभावित होकर अंग्रेज इतिहासकार कर्नल James Tod अपनी पुस्तक Annals And Antiquities Of Rajsthan में लिखते हैं--"पुरे संसार के विरता को तराजु के एक पलड़े में रख दिया जाए और दुसरे पलड़े में भारतवर्ष के सिर्फ क्षत्राणीयों की विरता को तराजु के दुसरे पलड़े में रखकर मापा जाए तो क्षत्राणीयों का विरता ज्यादा वजनदार होगा।"

....अब चंद शब्दों में दो-तीन लोगों के आरोप को जवाब दे दुं -राजपूतों पर जो पोस्ट श्रृंखला मैनें शुरू किया है वह जातिवाद के परिधी में नही ब्लकि स्वाभिमान के परिधि में आता है।जातिवाद उसे कहते हैं -"जो दुसरे जाति के खिलाफ कोई लेख लिखता हो या टिप्पणी करता हो।मैं तो अपने पुर्वजों के विरता की गौरव गाथा लेख के माध्यम से अपने भाईयों तक पहुंचा रहा हुं ताकी वें भी जान सके और अंगुली उठाने वालें को खुद जवाब दे सकें।

..... 1. #नाईकी_देवी ---: यह मूलराज सोलंकी की मां थी और गोवा के राजा परमार्दिन की बेटी थी।पति के स्वर्गावास के बाद अपने राज्य पाटन,गुजरात का खुद संचालन कर रही थी क्योंकी तब मूलराज सोलंकी सोलंकी बहुत छोटे थे।1178 की बात है पाटन पर गौरी आक्रमण कर देता है।महिला होने के बावजुद भी अपने बच्चें को पीठ पर बांधकर गौरी से युद्ध करती है राजामाता सैंकड़ों तुर्को को तलवार से काट देती है। इस युद्ध में इनका साथ गुजरात के शासक भीम सोलंकी देते हैं।दोनों मिलकर गौरी को बुरी तरह से हराते हैं गौरी इस युद्ध में गंभीर रूप से घायल होकर सेना सहित भाग जाता है।इस हार के बाद कोई भी विदेशी भारत पर 50 वर्ष तक आक्रमण नही करता है। (स्त्रोत -- इतिहास के छः स्वर्णमिम पृष्ठ-सावरकर ,प्रबंध चिंतामणि जैन ग्रंथ, सल्तनत काल में हिंदू प्रतिरोध पेज न-111-112 तथा संस्कृति और संक्रमण पेज-243)

....2. #महारानी_दुर्गावती ---: महाराज कृतिसिंह चंदेल की इकलौती संतान थी।जब इनके पति दलपतशाह का स्वर्गवास के बाद यह राज्य ब्यवस्था का खुद संचालन करने लगी।इनके राज्य के शाषण ब्यवस्था और यहां के नागरीकों का जीवन इतना समृद्ध था कि इसकी चर्चा आईने अकबरी में भी की गई है।खैर 24 जून 1564 को अकबर के रिश्तेदार आसफ खां ने गोंडवाना पर हमला बोल दिया तो रानी खुद अपने नाबलिग पुत्र को साथ लेकर युद्ध करने लगी।मुगलों की सेना बहुत बड़ी थी लेकिन रानी दुर्गावती ने मुगल सेना में त्राही-त्राही मचा दी थी।रानी का बेटा नारायण युद्ध करते हुए मारा गया इसके बावजुद भी वह लड़ती रही।जिस तरह बिजली की तरह लड़ रही थी लड़ाई मुगलों ने इनके आंखो में तीर मार दी।इन्होने तीर को झट से निकाल दिया फिर दुसरे आंख में भी आकर तीर लग गई।तब रानी ने देखा की विजय की कोई संभावना नही है तब अपने सेनापति के कटार से खुद को मारकर विरगति को प्राप्त हो गई।
(स्त्रोत-- मध्यप्रदेश का इतिहास और महारानी दुर्गावती )

......3. #रानीबाई ----: सिंध भारत के सीमा पर स्थित है इसलिए अरब से होने वाले आक्रमण को सफलतापुर्वक सामना करता था।634 से 711 के बिच सिंध पर सऊदी अरब ने आठ बार आक्रमण किया।हर आक्रमण में सिंध ने अरबी सेना को परास्त किया। हजाज और अब्दुल्ला खां जैसे अरब के खलिफा भी इन लड़ाईयों में मारा गया था।712 में खुद मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर चढाई कर दी।राजा दाहिर विरगति को प्राप्त हो गयें तो उनकी पुत्री राजमहिषी रानीबाई ने राजपूत औरतों के साथ खुद युद्ध किया।अंत में देखा की यह युद्ध जीतने नही सकतें तो सामना करते हुए किले में वापस आ गई और विशाल अग्निकुंड में कई राजपूत औरतों के साथ कुद पड़ी।यही देश का पहला जौहर था (स्रोत --History of Sindh पेज-182-183 तथा The Struggle For Empire एवं इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार )..

......4 #सुमति ---: यह गढमण्डल के सेनापति सुमेर सिंह की बहन थी जिसकी शादी बदन सिंह नामक जागीरदार से हुई थी।अकबर के सेनापति आसफ खां गढमण्डल पर आक्रमण किया था और इस युद्ध में 24 जून 1564 महारानी दुर्गावती विरगति प्राप्त हो गई थी।इस युद्ध में बदन सिंह ने शत्रु को दुर्ग का सारा भेद बता दिया था।घटना 26 जून 1564 का है घर में आसफ खां के दो मुगल सैनिक बदन सिंह को पुरस्कार देने आए थें।सुमति ने उनदोनों का वार्तालाप सुन लिया।तब वह क्रोध से आग बबुला हो गई और झट से पहले वह अपने घर का दरवाजा बंद करती है उसके बाद वह पिछे से एक मुगल सैनिक को तलवार से काट देती है।हमला इतना अचानक था कि दुसरे सैनिक को सम्हलने का अवसर नही देती है और उसके गर्दन को झट से काट कर फिर अपने पति के गर्दन पर तलवार रखती हुई कहती है--दुर हट पापी नीच मै तुम्हारे जैसे देशद्रोही और कृतघ्न की पत्नी कहलाना नही चाहती।पुरस्कार तुझे मै देती हुं यह कहकर वह अपने ही पति को सीने में तलवार भोंक कर मार देती है। (स्रोत -- राजपूत नारियां,पेज '92 )

.......5 ##महारानी_कर्मावती ---: मेवाड़ के राजा विक्रमादित्य कायर और विलासी था।जब मेवाड़ पर बहादुरशाह ने आक्रमण किया था तो विक्रमादित्य मेवाड़ को बचाने के लिए हुमायूं को राखी भेजती है लेकिन हुमायूं ग्वालियर के समीप शेरशाहं से लड़ रहा था इसलिए वह नही आ सका।अंत में महारानी कर्मावती क्षत्राणीयों की टोली और बाघसिंह तथा सोलंकी भैरवदास के साथ स्वयं ही किले में घुंस रहे बहादुरशाह के सेना को विरतापुर्वक सामना किया।लड़ते हुए जब थक गई तो उन्होनें क्षत्राणीयों के साथ जौहर कर लिया बाद में हुमायूं आता है तबतक जौहर की आग ठंढी हो चुकी थी (स्रोत - राजपुताने का इतिहास -गौरीशंकर ओझा )

6. #कर्मदेवी ---: मेवाड़ और सिरोही के बिच एक सम्पन्न राजपूत जागीरदार था।इसके पति मेवाड़ में कुतुबुद्दीन का सामना करने गये थे।कुतुबुद्दीन वहां से हारकर जब लौटता है तो इस सम्पन्न जागीरदार के क्षेत्र को लुटने लगता है।तब कर्मदेवी कुतुबुद्दीन के सैनिकों से मोर्चा लेकर अपने क्षेत्र के लोगों को रक्षा कर लेती है।कुतुबुद्दीन भी इसलिए ज्यादा देर तक सामना नही कर पाता क्योंकी वह मेवाड़ युद्ध में घायल हो गया था। ( स्रोत -- कर्नल टाॅड का इतिहास )

..... 7 #उमांदे ---: यह रावल लुणकर्ण की बेटी थी तथा मारवाड़ का शासक राजा मालदेव की पत्नी थी जो पीहर में जोधपुर किले के रक्षा के लिए खुद शेरशाह से लड़ी थी और शेरशाह के आजिम खां नामक सेनापति को मार गिरायी थी।शेरशाह की विजय हुई तो गुंदोज चली आई उसके बाद मेवाड़ के केलवा में शेष जीवन ब्यतीत किया।पति के स्वर्गावास के बाद सती हो गई इनके स्मृति केलवा में छतरी का निर्माण किया गया है जो आज भी है।(स्रोत --राजपूत नारीयां पेज -109-110 )

...... 8.#सारन्धा ---- यह बुंदेलखंड के ओरक्षा नरेश चम्पतराय की पत्नी थी।दाराशिकोह से चम्बल की लड़ाई में औरंगजेब को यही महाराज ओरक्षा चम्पतराय के यहां शरण लेनी पड़ी थी।उसके बाद धरमत के औरंगजेब दाराशिकोह को हराकर विजय होता है तो महाराज चम्पतराय को एक घोड़ा पुरस्कार स्वरूप देता है तो चम्पतराय के अनुपस्थिती में वली बहादुर नामक एक मुगल सेनापति घोड़े को छिनकर ले जाने लगता है।यह देखकर महारानी सारन्धा अपने नजदीक सैनिक से तलवार छिनकर उसका गर्दन पर वार कर देती है।इसके बाद कृत्घन औरंगजेब जब ओरछा पर आक्रमण करता है तो अपनी पति चम्पतराय के साथ औरंगजेब की सेना से लड़ती है किंतु हार जाती है उसके बाद जंगल में चली जाती है।तेजस्वी छत्रसाल इन्ही के लड़का थे।(स्रोत - बुंदेलखंड का इतिहास तथा वीर छत्रसाल )

.......9. #वेलुर के राजपूत जमींदार #नारायण सिंह की #बेटी_तेजस्वीनी एक बाल विधवा थी जिन्होने ग्वालियर में 1857 रानी लक्ष्मीबाई की ओर से भयंकर युद्ध किया था।जिसके कारण इनको तिरूचिरापल्ली की जेल में बंद कर दिया जाता है रिहा होने के कुछ दिन के बाद नेपाल चली जाती है और वहां गोला-बारूद बनाना सिखकर क्रांतिकारीयों की मदद करती है।1905 में बंग-भंग आंदोलन में भी भाग लेती है।बंगाल में तिलक इनसे खुद आशिर्वाद लेते हैं। (स्रोत -क्रांतिकारीयों की गाथा,भाग-1 )

......10.#महारानीअहिल्याबाई --: इंदौर की रानी खुद मुगलों से दो बार युद्ध करती है और विजय भी होती है।इन्होने 30वर्ष तक इंदौर का संचालन किया था।इन्होने ही काशी,प्रयाग ,आदी के मंदिरों का जिर्णोद्धार किया था।

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