एक हिन्दू राजपूत, बने सिख योद्धा, नाम लक्ष्मणदास और कहलाए बंदा सिंह बहादुर ...🚩🙏 (पढ़ें दास्तां) 👇
◆क्या आप जानते हैं जम्मू-कश्मीर के राजौरी में जन्मे एक राजपूत ने गुरु गोबिंद सिंह के बेटों और मां की हत्या का बदला लिया था। यही बाद में बंदा सिंह बहादुर कहलाए थे। इनके 300वीं शहीदे दिवस पर खुद पीएम मोदी पहुंचे थे।
पढ़िए इनकी बहादुरी के किस्से।
● बंदा सिंह बहादुर अकेले ऐसे योद्धा हुए हैं, जिन्होंने मुगलों के अजेय होने के भ्रम को तोड़ा। वो मुगलों के खिलाफ सभी लड़ाई जीते थे। लेकिन 1715 में आखिरी लड़ाई लड़ी। जिसमें खाने की कमी के चलते उन्हें आत्मसमर्पण करना पड़ा। इसके बाद मुगल बादशाह फर्रुखसियर ने बंदा सिंह और उनके सैनिकों के शरीर काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिए थे।
● उनका नाम सिख धर्म के महान योद्धाओं और शहीदों की फेहरिस्त में शामिल है।बंदा सिंह बहादुर का असली नाम लक्ष्मण दास था। गुरू गोबिंद सिंह ने ही उन्हें बंदा सिंह नाम दिया था। गुरू गोबिंद सिंह की लक्ष्मण दास से मुलाकात 3 सितंबर सन् 1708 को महाराष्ट्र के नांदेड़ में गोदावरी नदी के किनारे हुई थी। मुलाकात के दौरान लक्ष्मण दास ने उन्हें कई तरीकों से अपमानित करने की कोशिश की लेकिन उनकी किसी भी युक्ति का प्रभाव गुरू गोबिंद सिंह पर नहीं पड़ा। लक्ष्मण दास उनसे काफी प्रभावित हुए और यहीं उन्होंने पहली बार स्वयं को गोबिंद सिंह का दास कहा।
● उन दिनों सरहिंद के गवर्नर नबाव वजीर खान के अत्याचार आम जनता पर बढ़ते ही जा रहे थे। गुरू गोबिंद सिंह को उम्मीद थी कि बहादुर शाह अपने वादे को पूरा करेगा और वजीर खान को सजा देगा। जनता पर हो रहे अत्याचार को रोकने और अपने बेटों साहिबजादा जोरावर सिंह व साहिबजादा फतेह सिंह सहित माता गुजरी देवी की हत्या का बदला लेने का जिम्मा गोबिंद सिंह ने बंदा दास बहादुर को सौंपा। मई, 1710 में उसने सरहिंद को जीत लिया और सतलुज के दक्षिण में खालसा राज्य की की स्थापना की।
● 10 दिसंबर सन् 1710 को बहादुर शाह द्वारा बंदा सिंह बहादुर और उनकी सेना का पकड़ने का फरमान जारी किया गया। सन् 1715 में बादशाह फर्रूखसियर की फौज ने अब्दुल समद खान के नेतृत्व में बंदा सिंह और उनकी फौज पर आक्रमण किया पर बंदा सिंह बहादुर ने अपने लडाको के साथ मुग़लों की सेना से घिरे होने के बाद भी गुरदासपुर के नजदीक गुरूदास नंगल गांव में उनको कई महीनों तक रोक कर रखा। अति हो जाने पर खाने की कमी के कारण मजबूर होकर उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया।
● सन् 1717 के शुरूआती दिनों में तकरीबन 794 योद्धाओं के साथ बंदा सिंह को दिल्ली लाया गया। 5 मार्च से 13 मार्च तक लगातार 9 दिनों तक रोजाना तकरीबन 100 सिक्खों को फांसी पर चढ़ाया गया। बंदा सिंह बहादुर को हजारो खालसा वीरो की तरह इस्लाम धर्म कबूल करने या मौत की सजा चुनने का विकल्प दिया गया। बंदा सिंह ने मौत चुनी। बादशाह फर्रुखसियर के आदेश पर बंदा सिंह और उनके सैन्य अधिकारियों के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए थे ...
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नमन ऐसे वीरो को जिनकी बदौलत आज भी सनातन धर्म जीवित है ...🙏🚩
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