Skip to main content

#बाबू_कुंवर_सिंह

#बाबू_कुंवर_सिंह

बाबू कुंवर सिंह का जन्म आरा के निकट जगदीशपुर रियासत में 1777 में हुआ था | मुग़ल सम्राट शाहजहा के काल से उस रियासत के मालिक को राजा की उपाधि मिली हुई थी।ये उज्जैनिया पवार(परमार)राजपूत कुल के थे. कुंवर सिंह के पिता का नाम साहेबजादा सिंह और माँ का नाम पंचरतन कुवरी था | कुंवर सिंह की यह रियासत भी डलहौजी की हडप नीति का शिकार बन गयी थी।
कुंवर सिंह न केवल 1857 के महासमर के सबसे महान योद्धा थे, बल्कि वह इस संग्राम के एक वयोवृद्ध योद्धा भी थे। इस महासमर में तलवार उठाने वाले इस योद्धा की उम्र उस समय 80 वर्ष की थी। महासमर का यह वीर न केवल युद्ध के मैदान का चपल निर्भीक और जाबांज खिलाड़ी था, अपितु युद्ध की व्यूहरचना में भी उस समय के दक्ष , प्रशिक्षित एवं बेहतर हथियारों से सुसज्जित ब्रिटिश सेना के अधिकारियों, कमांडरो से कही ज्यादा श्रेष्ठ थे।

1857 का संग्राम, सबसे पहले मुख्यत: एक सैनिक विद्रोह था जिसमे अधिकतर अवध, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के राजपूत सैनिक शामिल थे। इन सैनिको से प्रेरणा लेकर ही इन क्षेत्रो में आम जनता ने अंग्रेज़ो के विरुद्ध बगावत करी। अवध में तो ये बगावत सबसे भीषण थी और समाज के लगभग हर वर्ग ने संग्राम में भाग लिया जिसका नेतृत्व राजपूतो ने किया। अवध, पूर्वांचल और पश्चिम बिहार के राजपूतो ने संग्राम में सबसे सक्रीय रूप से भाग लिया जिसके परिणाम स्वरुप संघर्ष समाप्ति के बाद अंग्रेज़ो ने उनका दमन किया। सिर्फ अवध में ही एक साल के अंदर राजपूतो की 1783 किलों/गढ़ियों को ध्वस्त किया गया जिनमे से 693 तोप, लगभग 2 लाख बंदूके, लगभग 7 लाख तलवारे, 50 हजार भाले और लगभग साढ़े 6 लाख अन्य तरह के हथियारों को अंग्रेज़ो ने जब्त करके नष्ट किया। यहाँ तक की अधिकतर संपन्न राजपूतो के घर किलेनुमा होते थे, उन्हें भी नष्ट कर दिया गया। इसके बाद शस्त्र रखने के लिये अंग्रेज़ो ने लाइसेंस अनिवार्य कर दिया जो बहुत कम लोगो को दिया जाता था। इसका परिणाम यह हुआ की अवध के राजपूत शस्त्रविहीन हो गए।

महान स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के शब्दों में ———–

“अंग्रेजो का जुआ उतार फेकने के बाद जिस एक कमी के कारण क्रांतिकारियों के सारे परिश्रम विफल हो रहे थे,वह कुशलता और रणनीति की कमी जगदीशपुर के राजमहल ने शेष न रहने दी,इसलिए जगदीशपुर के उस हिन्दू राजा के ध्वज की और सोन नदी उतरकर ये सिपाही दोड़े जा रहे थे.क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम का नेत्रत्व करने वाला सुयोग्य नेता इन्हें जगदीशपुर में ही मिलने वाला था.राजपूत वंश की खान से ही जिस महान स्वतंत्रता सेनानी का जन्म हुआ उस वीर का नाम कुंवर सिंह था.अपने स्वदेश को गुलामी की कठिन अवस्था में देखकर मन में उत्पन्न हुई क्रोधाग्नि के कारण वह वृद्ध कुंवर सिंह अपने महल में मूंछो पर ताव देता खड़ा था.

वृद्ध युवा–हाँ वह वृद्ध युवा था,क्योंकि अस्सी शरद ऋतुएँ देह पर से उतर गई थी.परन्तु उनकी आत्मा का तेज अभी भी जीवित अंगारे सा दहकता था.अस्सी वर्ष का कुंवर सिंह,अस्सी वर्ष का कुमार और उसमे भी सिंह,,,उसके देश का अंग्रेजो द्वारा किया गया अपहरण उसे कैसे मान्य हो?????

अपने स्वदेश का अपहरण करने वाली अंग्रेजी तलवार के मै टुकड़े करूँगा,ऐसी गर्जना कुंवर सिंह ने कीं और उन्होंने गुपचुप शिवाजी की निति पर चलते हुए नाना साहब से सम्पर्क करके क्रांति की योजना बनाई,

कुंवर सिंह के मन में क्रांति की भावनाएं जोर पकड़ रही हैं ये जानकारी जल्द ही अंग्रेजो को मिल गई और उन्होंने छल से कुंवर सिंह को पकड़ने की निति बनाई…
भयंकर चाल,भयंकर बोल और हर हर महादेव का बोल…अफजल खान वध के पोवाडा की चाल…..
पटना के कमिश्नर टेलर ने कुंवर सिंह को आतिथ्य का विनम्र निमन्त्रण भेजा,पर चतुर कुंवर सिंह ने अस्वस्थता का बहाना बनाकर इसे ठुकरा दिया,
जल्द ही दानापुर के बागी सिपाही जगदीशपुर आ पहुंचे,अब फिर किसके लिए ठहरना????
पटना शहर हाथी पर बैठकर जाने से भी अस्वस्थता के कारण जिस कुंवर सिंह ने मना कर दिया था वो राजा भोज परमार का वंशज और अस्सी साल का बुजुर्ग राजपूत अपनी रुग्ण शैय्या से तडाक से उठा और सीधा रणभूमि में ही जाकर रुका”

कुंवर सिंह के नेतृत्त्व में इस सेना ने सबसे पहले आरा पर धावा बोल दिया। क्रांतिकारी सेना ने आरा के अंग्रेजी खजाने पर कब्जा कर लिया। जेलखाने के कैदियों को रिहा कर दिया गया। अंग्रेजी दफ्तरों को ढाहकर आरा के छोटे से किले को घेर लिया। किले के अन्दर सिक्ख और अंग्रेज सिपाही थे। तीन दिन किले की घेरेबंदी के साथ दानापुर से किले की रक्षा के लिए आ रहे कैप्टन डनवर और उनके 400 सिपाहियों से भी लोहा लिया। डनवर युद्ध में मारा गया। थोड़े बचे सिपाही दानापुर वापस भाग गये। किला और आरा नगर पर कुंवर सिंह कीं क्रांतिकारी सेना का कब्जा हो गया। लेकिन यह कब्जा लम्बे दिनों तक नही रह सका। मेजर आयर एक बड़ी सेना लेकर आरा पर चढ़ आया। युद्ध में कुंवर सिंह और उसकी छोटी सी सेना पराजित हो गयी। आरा के किले पर अंग्रेजो का पुन: अधिकार हो गया।

कुंवर सिंह अपने सैनिको सहित जगदीशपुर की तरफ लौटे। मेजर आयर ने उनका पीछा किया और उसने जगदीशपुर में युद्ध के बाद वहा के किले पर भी अधिकार कर लिया। कुंवर सिंह को अपने 122 सैनिको और बच्चो स्त्रियों के साथ जगदीशपुर छोड़ना पडा। अंग्रेजी सेना से कुंवर सिंह की अगली भिडंत आजमगढ़ के अतरौलिया क्षेत्र में हुई। अंग्रेजी कमांडर मिल मैन ने 22 मार्च 1858 को कुंवर सिंह की फ़ौज पर हमला बोल दिया। हमला होते ही कुंवर सिंह की सेना पीछे हटने लगी अंग्रेजी सेना कुंवर सिंह को खदेड़कर एक बगीचे में टिक गयी। फिर जिस समय मिल मैन की सेना भोजन करने में जुटी थी, उसी समय कुंवर सिंह की सेना अचानक उन
पर टूट पड़ी। मैदान थोड़ी ही देर में कुंवर सिंह के हाथ आ गया। मिलमैन अपने बचे खुचे सैनिको को लेकर आजमगढ़ की ओर निकल भागा। अतरौलिया में पराजय का समाचार पाते ही कर्नल डेम्स गाजीपुर से सेना लेकर मिलमैन की सहायता के लिए चल निकला। 28 मार्च 1858 को आजमगढ़ से कुछ दूर कर्नल डेम्स और कुंवर सिंह में युद्ध हुआ। कुंवर सिंह पुन: विजयी रहे। कर्नल डेम्स ने भागकर आजमगढ़ के किले में जान बचाई।

अब कुंवर सिंह बनारस की तरफ बड़े। तब तक लखनऊ क्षेत्र के तमाम विद्रोही सैनिक भी कुंवर सिंह के साथ हो लिए थे। बनारस से ठीक उत्तर में 6 अप्रैल के दिन लार्ड मार्क्कर की सेना ने कुंवर सिंह का रास्ता रोका और उन पर हमला कर दिया। युद्ध में लार्ड मार्क्कर पराजित होकर आजमगढ़ की ओर भागा। कुंवर सिंह ने उसका पीछा किया और किले में पनाह के लिए मार्क्कर की घेरे बंदी कर दी। इसकी सुचना मिलते ही पश्चिम से कमांडर लेगर्ड की बड़ी सेना आजमगढ़ के किले की तरफ बड़ी। कुंवर सिंह ने आजमगढ़ छोडकर गाजीपुर जाने और फिर अपने पैतृक रियासत जगदीशपुर पहुचने का निर्णय किया। साथ ही लेगर्ड की सेना को रोकने और उलझाए रखने के लिए उन्होंने अपनी एक टुकड़ी तानु नदी के पुल पर उसका मुकाबला करने के लिए भेज दी। लेगर्ड की सेना ने मोर्चे पर बड़ी लड़ाई के बाद कुंवर सिंह का पीछा किया। कुंवर सिंह हाथ नही आये लेकिन लेगर्ड की सेना के गाफिल पड़ते ही कुंवर सिंह न जाने किधर से अचानक आ धमके और लेगर्ड पर हमला बोल दिया। लेगर्ड की सेना पराजित हो गयी।

अब गंगा नदी पार करने के लिए कुंवर सिंह आगे बड़े लेकिन उससे पहले नघई गाँव के निकट कुंवर सिंह को डगलस की सेना का सामना करना पडा। डगलस की सेना से लड़ते हुए कुंवर सिंह आगे बढ़ते रहे। अन्त में कुंवर सिंह की सेना गंगा के पार पहुचने में सफल रही। अंतिम किश्ती में कुंवर सिंह नदी पार कर रहे थे, उसी समय किनारे से अंग्रेजी सेना के सिपाही की गोली उनके दाहिनी बांह में लगी। कुंवर सिंह ने बेजान पड़े हाथ को अपनी तलवार से काटकर अलग कर गंगा में प्रवाहित कर दिया। घाव पर कपड़ा लपेटकर कुंवर सिंह ने गंगा जी पार की।

वीर सावरकर ने किस प्रकार अपनी पुस्तक 1857 के स्वतंत्रता समर के पृष्ठ संख्या 340-341 में इस घटना का वर्णन किया है आप स्वयं पढ़ें——
“भारत भूमि का यह सौभाग्य तिलक,स्वतंत्रता की तलवार-राणा कुंवर सिंह !गंगा पाट में बीचो बीच पहुँच गया तब शत्रु की एक गोली आई और राणा के हाथ में घुस गई.खून की धारा बह निकली.जिससे सारे शरीर में गोली का जहर फैलने का खतरा हो गया…..
यह देखते ही उस भीष्म ने क्या किया???
आंसू बहाने लगा क्या???
तनिक भी विचलित हुआ क्या?रक्त का बहाव रोकने को किसी से सहायता मांगी क्या??
नही-नही ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.हाथ पर मक्खी बैठे,उतना भी कम्पित नही हुआ.उसने दुसरे हाथ से अपनी तलवार निकाली,और फिरंगी गोली से भ्रष्ट हुआ अपना हाथ कुहनी से छांट दिया और वह काटा हुआ टुकड़ा गंगा को अर्पण करते हुए कुंवर सिंह ने गंभीर गर्जना की–हे माता हे गंगा ! बालक का यह उपहार स्वीकार कर!!
इस महान वृद्ध राजपूत द्वारा भगीरथी को यह अलौकिक उपहार अर्पित करते ही उसकी शीतल फुआरो ने उसका देह सिंचन किया और मात्रप्रेम से उत्साहित यह वीरवर अपनी सेना सहित गंगा पार हो गया”

अंग्रेजी सेना उनका पीछा न कर सकी। गंगा पार कर कुंवर सिंह की सेना ने 22 अप्रैल को जगदीशपुर और उसके किले पर पुन: अधिकार जमा लिया। 23 अप्रैल को ली ग्रांड की सेना आरा से जगदीशपुर की तरफ बड़ी ली ग्रांड की सेना तोपों व अन्य साजो सामानों से सुसज्जित और ताजा दम थी। जबकि कुंवर सिंह की सेना अस्त्र -शस्त्रों की भारी कमी के साथ लगातार की लड़ाई से थकी मादी थी। अभी कुंवर सिंह की सेना को लड़ते – भिड़ते रहकर जगदीशपुर पहुचे 24 घंटे भी नही हुआ था। इसके बावजूद आमने-सामने के युद्ध में ली ग्रांड की सेना पराजित हो गयी।

चार्ल्स बाल की ‘इन्डियन म्युटनि’ में उस युद्ध में शामिल एक अंग्रेज अफसर का युद्ध का यह बयान दिया हुआ है की——-
“वास्तव में जो कुछ हुआ उसे लिखते हुए मुझे अत्यंत लज्जा आती है। लड़ाई का मैदान छोडकर हमने जंगल में भागना शुरू किया। शत्रु हमे पीछे से बराबर पीटता रहा। स्वंय ली ग्रांड को छाती में गोली लगी और वह मारा गया। 199 गोरो में से केवल 80 सैनिक ही युद्ध के भयंकर संहार से ज़िंदा बच सके। हमारे साथ के सिक्ख सैनिक हमसे आगे ही भाग गये थे”

22 अप्रैल की इस जीत के बाद जगदीशपुर में कुंवर सिंह का शासन पुन: स्थापित हो गया। किन्तु कुंवर सिंह के कटे हाथ का घाव का जहर तेजी से बढ़ रहा था इसके परिणाम स्वरूप 23 अप्रैल 1858 को इस महान वयोवृद्ध पराक्रमी विजेता का जीवन दीप बुझ गया।

वीर सावरकर के शब्दों में——-
“””‘जब कुंवर सिंह का जन्म हुआ था तब उनकी भूमि स्वतंत्र थी और जिस दिन कुंवर सिंह ने प्राण त्यागे उस दिन भी उनके किले पर स्वदेश और स्वधर्म का भगवा ध्वज लहरा रहा था,,राजपूतो के लिए इससे पुण्यतर मृत्यु और कौन सी हो सकती है??????

साभार ।

Comments

Popular posts from this blog

सुर्यवंशी गहरवार वंश

#__सुर्यवंशी___गहरवार___वंश 👈🙏🚩 #_गहरवार_क्षत्रीय_वंश सुदूर अतीत में #__सूर्यवंशी राजा मनु से संबन्धित हैं। #_अक्ष्वाकु के बाद #__रामचन्द्र के पुत्र "#_लव' से उनके वंशजो की परंपरा आगे बढ़ाई गई है और इसी में काशी के गहरवार शाखा के कर्त्तृराज को जोड़ा गया है।          लव से कर्त्तृराज तक के उत्तराधिकारियों में गगनसेन, कनकसेन, प्रद्युम्न आदि के नाम महत्वपूर्ण हैं। कर्त्तृराज का गहरवार होना घटना के आधार पर हैं जिसमें काशी मे ऊपर ग्रहों की बुरी दशा के निवारणार्थ उसके प्रयत्नों में "#__ग्रहनिवार' संज्ञा से वह पुकारा जाने लगा था।    कालांतर "ग्रहनिवार' का अपभृंश गहरवार बन गया। बनारस के राजाओं की अनेक समय तक  #__सूर्यवंशी सूर्य-कुलावंतस काशीश्वर पुकारा जाता रहा है। इनकी परंपरा इस प्रकार है - कर्त्तृराज, महिराज, मूर्धराज, उदयराज, गरुड़सेन, समरसेन, आनंदसेन, करनसेन, कुमारसेन, मोहनसेन, राजसेन, काशीराज, श्यामदेव, प्रह्मलाददेव, हम्मीरदेव, आसकरन, अभयकरन, जैतकरन, सोहनपाल और करनपाल। करनपाल के तीन पुत्र थे - वीर, हेमकरण और अरिब्रह्म। करनपाल ने हेम...

क्षत्राणी

# क्षत्राणी मैंने उसको जब-जब देखा, लोहा देखा। लोहे जैसा तपते देखा, गलते देखा, ढलते देखा मैंने उसको गोली जैसा चलते देखा। # यह_ही_है_क्षत्राणी यथार्थ में देखा जाए तो क्षत्राणीयों का इतिहास व उनके क्रियाकलाप उतने प्रकाश में नहीं आए जितने क्षत्रियों के। क्षत्राणीयों के इतिहास पर विहंगम दृष्टि डालने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि क्षत्रिय का महान त्याग व तपस्या का इतिहास वास्तव में क्षत्राणीयों की देन है। राजा हिमवान की पुत्री  # गंगा  ने अपनी तपस्या के बल पर भगवान् श्रीनारायण के चरणों में स्थान पाया और भागीरथ की तपस्या से वे इस सृष्टि का कल्याण करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुई। उन्हीं की छोटी बहन  # पार्वती  ने अपनी तपस्या के बल पर भगवान् सदाशिव को पति के रूप में प्राप्त किया व दुष्टों का दलन करने वाले स्वामी कार्तिकेय और देवताओं में अग्रपूजा के अधिकारी गणेश जैसे पुत्रों की माता बनी। महाराजा गाधि की पुत्री व विश्वामित्र जी की बड़ी बहन  # सरस्वती  अपनी तपस्या के बल पर ही जलरूप में प्रवाहित होकर पवित्र सरस्वती नदी का रूप धारण कर सकीं। इसी प्रकार  # नर्मदा...

जय देव

# MUST_READ_AND_SHARE जय देव !  # धर्मवीर_बाबा_हासिल_देव_जी_की_जय_हो  !  # आज_बाबा_हासिल_देव_जी_की_जयंती_है  , बाबाजी को कोटि कोटि नमन ! जिस तरह जय सिंह खिंची चौहान जी , सिक्ख गुरु जी , बाबा बन्दा बहादुर जी और सम्भाजी महाराज के साथ बर्बरता करके शहीद किया गया था उसी तरह इस वीर राजपूत को शहीद किया गया था ! ये वो  # राजपूत_वीर  थे जिन्होंने शहादत देदी लेकिन सर नहीं झुकाया ! दिल्ली के बादशाह ने उन्हें तसीहें देकर शहीद कर दिया लेकिन बाबाजी बादशाह के आगे झुके नहीं ! राजा हमीर देव जम्वाल का बिक्रमी 1456 से लेकर 1483 तक जम्मू पर राज था ! उनके दो बेटे थे - अजैब देव और हासिल देव ! राजा हमीर के देहांत के बाद उनका बड़ा बेटा अजैब देव राजा बना और कुछ समय बाद राजा अजैब देव के छोटे भाई बाबा हासिल देव जी को जम्मू की रियासत का वज़ीर बना दिया गया ! राजा अजैब देव जी की बिक्रम सम्वत 1514 में मृत्यु हो गई ! राजा का बेटा कुंवर बीरम देव उस समय बोहत छोटे थे ! वज़ीर हासिल देव जी ने अपने भतीजे को पाला और साम्राज्य को चलाने में पूर्ण मदद की , और साफ सुथरे ढंग से राज्ये चलाना सिखाय...