Skip to main content

#मेहरानगढ़ किला भारतीय राज्य राजस्थान के जोधपुर शहर में स्थित है, जो राजस्थान के विशाल किलों में से एक है।

किला_राठौड़

#मेहरानगढ़_किले_के_बारे_में_रोचक_तथ्य

#यह_किला_रजपूतो_की_शान_है
#यह_किला_राठौड़ो_का_अभिमान_है

#मेहरानगढ़ किला भारतीय राज्य राजस्थान के जोधपुर शहर में स्थित है, जो राजस्थान के विशाल किलों में से एक है। पन्द्रहवी शताब्दी में बना यह शानदार किला 125 मीटर ऊँची पथरीली चट्टान पहाड़ी पर स्थित है। इस किले के भीतर प्राचीन भारतीय राजवंशों के राजाओं के साजोसामान को सजोकर रखा गया है। इसके अलावा यहाँ पर बहुत सी आकर्षक पालकियाँ, हाथियों के हौदे, तरह-तरह की शैलियों में बने लघु चित्र, संगीत वाद्य यन्त्र, प्राचीन वस्त्रों व फर्नीचर का आश्चर्यजनक संग्रह भी अभी तक मौजूद है। यह किला राजस्थान के सबसे प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है और यहाँ हर साल लाखों की संख्या में पर्यटक घूमने के लिए आते है।

#मेहरानगढ़ किला भारत के प्राचीनतम किलों में से एक है और भारत के समृद्धशाली अतीत का प्रतीक है। यह किला जोधपुर किलों में सबसे बड़े किलों में से एक है। आज हम इसी मेहरानगढ़ किले के बारेमें जानेंगे।

#मेहरानगढ़ किले का संक्षिप्त विवरण
स्थान जोधपुर, राजस्थान (भारत)
निर्माण 1459
निर्माता राव जोधा

#मेहरानगढ़ किले का इतिहास
इस शानदार किले का निर्माण कार्य राव जोधा द्वारा 12 मई 1459 को एक पहाड़ी पर शुरू किया गया जिसे महाराज जसवंत सिंह द्वारा पूरा करवाया गया था। पहाड़ी पर काफ़ी पक्षी रहते थे, जिस कारण इस पहाड़ी को भोर चिडिया के नाम से भी जाना जाता था। जोधपुर के राजा रणमल की 24 संतानों मे से एक राव जोधा भी थे। वे जोधपुर के 15वें शासक थे|

#जोधपुर का मेहरानगढ़ फोर्ट भारत के सबसे विशाल आकार के किलो में से एक है, पहाड़ो की ऊंचाई पर बना यह विशालकाय किला रजपूतो की उन्नति और कला प्रेम का जीता जागता उदाहरण है । यह शानदार किला राव जोधा राठौड़ द्वारा 1459 ईस्वी में बनाया गया था, मेहरानगढ़ किला पहाड़ो की एकदम चोटी पर होने के कारण भारत के सबसे खूबसूरत किलो में से एक है । इस किले में प्रवेश के लिए शानदार गोल घुमावदार रास्ता आज भी पर्यटकों को अचंभित कर देता है मुगल काल मे हुए तोपों से आक्रमण के निशान आज भी इस किले में देखे जा सकते है। इस किले के बायीं तरफ कीरत सिंह सोढ़ा की छतरी है, जो कि एक वीर राजपूत सेनानी थे, इस किले की रक्षा हेतु उन्होंने लड़ते हुए प्राण दे दिए थे । इस किले में कुल सात दरवाजे है, मेहरानगढ़ किले का म्यूजियम भी भारत के सबसे प्रसिद्ध म्यूजियम में से एक है, किले में पुराने शस्त्र, पालकिया वस्त्र आज भी है । इस म्यूजियम में हमे राठौड़ सेना, उनकी पोशाक इन सभी के बारे में भली भांति जानकारी मिल जाती है । इस किले का पूरा श्रेय राठौड़ वंश के राव जोधा को दिया जाता है, 1459 में उन्होंने जोधपुर शहर बसाया था ।

#इस किले की वीर गाथाएं आज भी जन जन के कानोमे गूंजती है, एक बार किसी चरवाहे ने इस किले की आलोचना कर दी थी, क्रोध में आकर दुर्गादास राठौड़ ने उस चरवाहे का सिर धड़ से अलग कर दिया । इसी किले से जसवंत सिंहः जी और राजा मालदेव जैसे रणबांकुरे शासन किया करते थे, इस किले के लिए ही लड़ते लड़ते जेता ओर कुंपा जैसे वीरो ने अपने प्राण न्योछावर किये थे।

#जोधपुर नगर बसाया
1459 में उन्होंने जोधपुर शहर बसाया था ।

#यह किला भारतीय राज्य राजस्थान के जोधपुर शहर से मात्र 5 कि.मी. की दूरी पर स्थित है।

#यह किला मूल रूप से सात द्वार (पोल) व अनगिनत बुर्जों से मिलकर बना हैं।

#इस किले में कुल सात दरवाजे है। जिनमे से सबसे प्रसिद्ध द्वारो का उल्लेख निचे किया गया है :

#जय पोल (विजय का द्वार), इसका निर्माण महाराजा मान सिंह ने 1806 में जयपुर और बीकानेर पर युद्ध में मिली जीत की ख़ुशी में किया था।

#फ़तेह पोल , इसका निर्माण 1707 में मुगलों पर मिली जीत की ख़ुशी में किया गया।

#डेढ़ कंग्र पोल, जिसे आज भी तोपों से की जाने वाली बमबारी का डर लगा रहता है।

#लोह पोल, यह किले का अंतिम द्वार है जो किले के परिसर के मुख्य भाग में बना हुआ है। इसके बायीं तरफ ही रानियो के हाँथो के निशान है, जिन्होंने 1843 में अपनी पति, महाराजा मान सिंह के अंतिम संस्कार में खुद को कुर्बान कर दिया था।

#इस किले के भीतर बहुत से बेहतरीन चित्रित और सजे हुए महल है। जिनमे मोती महल, फूल महल, शीश महल, सिलेह खाना और दौलत खाने का समावेश है। साथ ही किले के म्यूजियम में पालकियो, पोशाको, संगीत वाद्य, शाही पालनो और फर्नीचर को जमा किया हुआ है। किले की दीवारों पर तोपे भी रखी गयी है, जिससे इसकी सुन्दरता को चार चाँद भी लग जाते है।

#किले को बनाने में आकर्षक बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया गया था, जिसपर जोधपुर के कारीगरों ने अपनी शानदार शिल्पकारी का प्रदर्शन किया हैं।

#इस किले की चौडाई 68 फीट और ऊंचाई 117 फीट है।

#इस किले के एक योद्धा कीरत सिंह सोडा के सम्मान में यहाँ एक छतरी भी बनाई गई है। छतरी एक गुंबद के आकार का मंडप है जो राजपूतों की समृद्ध संस्कृति में गर्व और सम्मान व्यक्त करने के लिए बनाया जाता है।

#राव जोधा ने 1460 ई. मे इस किले के नजदीक एक चामुंडा माता के मंदिर का भी निर्माण करवाया और वहा मूर्ति की स्थापना की। चामुंडा माता को जोधपुर के शासकों की कुलदेवी माना जाता है।

#किले के अन्दर के एक हिस्से को संग्रहालय में बदल दिया गया, जहाँ पर शाही पालकियों का एक बड़ा समावेश देखने को मिलता है।

#इस संग्रहालय में 14 कमरे हैं, जो शाही हथियारों, गहनों और वेशभूषाओं से सजे हैं।

#यहाँ आने वाले पर्यटक किले के भीतर बने मोती महल, फूल महल, शीशा महल और झाँकी महल जैसे चार कमरे को भी देख सकते हैं।

#मोती महल को पर्ल पैलेस भी कहा जाता है जोकि किले का सबसे बड़ा कमरा है। यह महल राजा सूर सिंह द्वारा बनवाया गया था, जहां वे अपनी प्रजा से मिलते थे।

#फूल महल मेहरानगढ़ किले के विशालतम अवधि कमरों में से एक है। यह महल राजा का निजी कक्ष था। इसे फूलों के पैलेस के रूप में भी जाना जाता है, इसमें एक छत है जिसमें सोने की महीन कारीगरी है।

#शीशा महल सुंदर शीशे के काम से सजा है। सैलानी शीशा महल में बनी अद्भुत धार्मिक आकृतियों को देख सकते हैं। शीशा महल को ‘शीशे के हॉल’ के रूप में भी जाना जाता है।

#झाँकी महल, जहाँ से शाही औरते यहाँ हो रहे सरकारी कामों की कार्यवाही को देखती थीं। वर्तमान में, यह महल शाही पालनों का एक विशाल संग्रह है।

#शहर के निचले भाग से ही किले में आने के लिये एक घुमावदार रास्ता भी है। जयपुर के सैनिको द्वारा तोप के गोलों द्वारा किये गये आक्रमण की झलकियाँ आज भी हमें स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इस किले के बायीं तरफ किरत सिंह सोडा की छत्री है, जो एक सैनिक था और जिसने मेहरानगढ़ किले की रक्षा करते हुए अपनी जान दी थी।

#मेहरानगढ़ किले का म्यूजियम राजस्थान के बेहतरीन और सबसे प्रसिद्ध म्यूजियम में से एक है। किले के म्यूजियम के एक विभाग में पुराने शाही पालकियो को रखा गया है, जिनमे विस्तृत गुंबददार महाडोल पालकी का भी समावेश है, जिन्हें 1730 में गुजरात के गवर्नर से युद्ध में जीता गया था। यह म्यूजियम हमें राठौर की सेना, पोशाक, चित्र और डेकोरेटेड कमरों की विरासत को भी दर्शाता है।

Comments

Popular posts from this blog

सुर्यवंशी गहरवार वंश

#__सुर्यवंशी___गहरवार___वंश 👈🙏🚩 #_गहरवार_क्षत्रीय_वंश सुदूर अतीत में #__सूर्यवंशी राजा मनु से संबन्धित हैं। #_अक्ष्वाकु के बाद #__रामचन्द्र के पुत्र "#_लव' से उनके वंशजो की परंपरा आगे बढ़ाई गई है और इसी में काशी के गहरवार शाखा के कर्त्तृराज को जोड़ा गया है।          लव से कर्त्तृराज तक के उत्तराधिकारियों में गगनसेन, कनकसेन, प्रद्युम्न आदि के नाम महत्वपूर्ण हैं। कर्त्तृराज का गहरवार होना घटना के आधार पर हैं जिसमें काशी मे ऊपर ग्रहों की बुरी दशा के निवारणार्थ उसके प्रयत्नों में "#__ग्रहनिवार' संज्ञा से वह पुकारा जाने लगा था।    कालांतर "ग्रहनिवार' का अपभृंश गहरवार बन गया। बनारस के राजाओं की अनेक समय तक  #__सूर्यवंशी सूर्य-कुलावंतस काशीश्वर पुकारा जाता रहा है। इनकी परंपरा इस प्रकार है - कर्त्तृराज, महिराज, मूर्धराज, उदयराज, गरुड़सेन, समरसेन, आनंदसेन, करनसेन, कुमारसेन, मोहनसेन, राजसेन, काशीराज, श्यामदेव, प्रह्मलाददेव, हम्मीरदेव, आसकरन, अभयकरन, जैतकरन, सोहनपाल और करनपाल। करनपाल के तीन पुत्र थे - वीर, हेमकरण और अरिब्रह्म। करनपाल ने हेम...

क्षत्राणी

# क्षत्राणी मैंने उसको जब-जब देखा, लोहा देखा। लोहे जैसा तपते देखा, गलते देखा, ढलते देखा मैंने उसको गोली जैसा चलते देखा। # यह_ही_है_क्षत्राणी यथार्थ में देखा जाए तो क्षत्राणीयों का इतिहास व उनके क्रियाकलाप उतने प्रकाश में नहीं आए जितने क्षत्रियों के। क्षत्राणीयों के इतिहास पर विहंगम दृष्टि डालने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि क्षत्रिय का महान त्याग व तपस्या का इतिहास वास्तव में क्षत्राणीयों की देन है। राजा हिमवान की पुत्री  # गंगा  ने अपनी तपस्या के बल पर भगवान् श्रीनारायण के चरणों में स्थान पाया और भागीरथ की तपस्या से वे इस सृष्टि का कल्याण करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुई। उन्हीं की छोटी बहन  # पार्वती  ने अपनी तपस्या के बल पर भगवान् सदाशिव को पति के रूप में प्राप्त किया व दुष्टों का दलन करने वाले स्वामी कार्तिकेय और देवताओं में अग्रपूजा के अधिकारी गणेश जैसे पुत्रों की माता बनी। महाराजा गाधि की पुत्री व विश्वामित्र जी की बड़ी बहन  # सरस्वती  अपनी तपस्या के बल पर ही जलरूप में प्रवाहित होकर पवित्र सरस्वती नदी का रूप धारण कर सकीं। इसी प्रकार  # नर्मदा...

जय देव

# MUST_READ_AND_SHARE जय देव !  # धर्मवीर_बाबा_हासिल_देव_जी_की_जय_हो  !  # आज_बाबा_हासिल_देव_जी_की_जयंती_है  , बाबाजी को कोटि कोटि नमन ! जिस तरह जय सिंह खिंची चौहान जी , सिक्ख गुरु जी , बाबा बन्दा बहादुर जी और सम्भाजी महाराज के साथ बर्बरता करके शहीद किया गया था उसी तरह इस वीर राजपूत को शहीद किया गया था ! ये वो  # राजपूत_वीर  थे जिन्होंने शहादत देदी लेकिन सर नहीं झुकाया ! दिल्ली के बादशाह ने उन्हें तसीहें देकर शहीद कर दिया लेकिन बाबाजी बादशाह के आगे झुके नहीं ! राजा हमीर देव जम्वाल का बिक्रमी 1456 से लेकर 1483 तक जम्मू पर राज था ! उनके दो बेटे थे - अजैब देव और हासिल देव ! राजा हमीर के देहांत के बाद उनका बड़ा बेटा अजैब देव राजा बना और कुछ समय बाद राजा अजैब देव के छोटे भाई बाबा हासिल देव जी को जम्मू की रियासत का वज़ीर बना दिया गया ! राजा अजैब देव जी की बिक्रम सम्वत 1514 में मृत्यु हो गई ! राजा का बेटा कुंवर बीरम देव उस समय बोहत छोटे थे ! वज़ीर हासिल देव जी ने अपने भतीजे को पाला और साम्राज्य को चलाने में पूर्ण मदद की , और साफ सुथरे ढंग से राज्ये चलाना सिखाय...