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#प्रतिहार_वंश #क्षत्रिय_केवल_राजपूत इस पोस्ट का टाइटल बड़े विवादों वाला है, ओर अगर सत्य को मानने की आदत हो, तो इसमे विवाद कुछ भी नही ... क्यो की क्षत्रिय तो केवल राजपूत ही है ।


#प्रतिहार_वंश 
#क्षत्रिय_केवल_राजपूत

इस पोस्ट का टाइटल बड़े विवादों वाला है, ओर अगर सत्य को मानने की आदत हो, तो इसमे विवाद कुछ भी नही ... क्यो की क्षत्रिय तो केवल राजपूत ही है ।

यह बात मानकर चलिए, की सनातन के सभी वर्णो में कोई भी छोटा- बड़ा, ऊँचा या नीचा नही है, सभी वर्ण आपस मे समान रूप से पवित्र है, सामवेद कहता है, चारो वर्णो को एक साथ बैठकर यज्ञ करना चाहिए, ओर सारे वर्णो की कल्याण की बात ही वेदों में कहीं गयी है, किसी वर्ण का एक दूसरे के प्रति तिरस्कार का भाव नही है । इसलिए स्वम् को शुद्र, वैश्य या ब्राह्मण वर्ण का पाकर मन मे कुंठा ना धारण करें, सभी वर्ण का अपना अपना महत्व है ... अपनी श्रेष्ठता है, उदाहरण के लिए, मुझे अगर सुंदर मकान बनवाना हुआ, तो में शुद्र के पास जाऊंगा, ना कि किसी क्षत्रिय के पास ...

क्यो की एक क्षत्रिय तलवार का " कलाकार " हो सकता है, लेकिन भवन, एवम अन्य कलाओं में वह इतना निपुण नही होगा, ठीक यही बात शुद्र एवम अन्य जातियों के साथ लागू होती है ।

इसलिए छोटा बड़ा कोई नही , सब बराबर, ओर सभी समान रूप से पवित्र, पूजनीय , एवम सम्मानीय है ।

लेकिन शुद्र वर्ण में ना जाने क्यो कोई जाना ही नही चाहता !! एक वर्ण को तुच्छ देखने की शुरुवात यहीं से होती है, जिसे जातिवाद कहते है, ओर जिस जातिवाद का आरोप मुझपर लगाए जाते है ।

#राजपूत_शब्द_की_प्राचीनता

वैदिक कालीन #राजपुत्र #राजन्य या #क्षत्रिय' वर्ग ही कालान्तर में राजपूत जाति में परिणत हो गया।

#राजपूत शब्द वैदिक 'राजपुत्र' का ही अपभ्रंश शब्द है।#ॠगवेद में 
"कस्य धतधवस्ता भवथ:
कस्य बानरा, #राजपुत्रेव सवनाय गच्छद',

#यजुर्वेद में 'पश्वी #राजपुत्रो गोपायति राजन्यों वै प्रजानामधिपति रायुध्रुंव आयुरेव गोपात्यथो क्षेत्रमेव गोवायते',

तथा ॠगवेद में ही ''ब्राह्मणोस्य मुखमासीद्वाहू #राजन्य कृत्य:'' के गहरे काले शब्द यह प्रकट करते हैं कि 'राजपुत्र' तथा 'राजन्य' समानार्थक रूप में प्रयुक्त हुए ह।

राजन्य 'क्षत्रिय' अर्थात् योद्धाओं के लिए प्रयुक्त होता था जो राज्य के अधिपति थे। 'मनस्मृति' में भी क्षत्रिय का यही अर्थ लिया गया है। 'शतपथ ब्राह्मण' में राजपुत्र, राजन्य तथा क्षत्रियों का पृथक रूप में उल्लेख मिलता है,


'महाभारत', 'तैत्रेय ब्राह्मण' तथा कालिदास की 'रघुवंश' काव्यकृति मे इन शब्दों का प्रयोग समानार्थक रूप में हुआ है।

 डॉ० गौरीशंकर प्रसाद ओझा ने 'राजपुत्र' शब्द का उल्लेख कौटिल्य के अर्थशास्र, कालिदास के 'मालविकाग्निमित्र', अश्वघोष के 'सौंदरानंद' तथा बाणभ के 'हर्षचरित' एवं 'कादम्बरी' ग्रन्थों में विभिन्न अर्थों में किया जाना बतलाया है। कौटिल्य ने राजा के पुत्रों के लिए तथा कालिदास व अश्वघोष ने सामन्तों के पुत्रों के अर्थ में राजपुत्र शब्द का प्रयोग किया है।

भारत के इतिहासकार " राजपूत " शब्द को केवल इसलिए पौराणिक नही मानते, क्यो की इनके परमपिता हेनसांग ने अपनी चीन यात्रा के दौरान " राजपूत " की जगह " क्षत्रिय " शब्द प्रयोग में लिया !!

यह तो बात रहीं "राजपूत " शब्द के प्राचीन होने की !! ओर यह इस बात का प्रमाण भी है, की राजपूत ओर क्षत्रिय एक ही है । या फिर यह कहिए, की केवल राजपूत ही क्षत्रिय है ।

#गुर्जर_प्रतिहार_वंश ...

भारत के सबसे महान राजवंशो में गुर्जर - प्रतिहार वंश का नाम आता है । कुछ वामपंथी ओर विदेशी इतिहासकार तो इस वंश को बिना किसी आधार के विदेशी साबित घोषित करने पर लगे हुए है । कुछ अन्य जाति के लोग भी इस वंश के राजाओ को " राजपूतो " से छीन अपनी जाति का घोषित कर रहे है । जबकि इसके सम्बंध में उनकेकोई ऐतिहासिक प्रमाण है भी नही ।

प्रतिहार वंश मूल रूप से श्री राम के भाई लक्ष्मण से चला है । प्रतिहार वंश के बारे में संज्ञा कुछ इस प्रकार दी गयी है -

" स्वभ्राता रामभद्रस्य प्रतिहार्य कृतः यतः
  श्री परिहारवंशोयमतसत्यमतसनोचमतीपानुआयत

अर्थात अपने भाई रामभद्र का परिहार्य ( द्वारपाल ) का कार्य करने के कारण इसे प्रतिहार वंश का नाम दिया गया ।

इस प्रकार विक्रम संवत 570 के आस पास से ही प्रतिहारो के नाम का डंका बज चुका था, अब पुराणों से अगर हम विवरण निकाले तो ..

भरत हुए, भरत के बाद सुमति, सुमति के बाद देवताजित उर्फ तेजस ( अग्निपुराण ओर विष्णुपुराण ) उनके बाद इंद्रद्युम्न, उनके बाद परमेष्टि, उनके बाद प्रतिहार ...

इसी प्रतिहार से , प्रतिहार वंश बना, ओर यह कोई अनोखी घटना नही थी, हम जानते है कि रघु से रघुवंश, शिशुनाग से शैसुनाग , सातवाहन से सातवाहन कुल, गुप्त से गुप्तवंश, मुखर से मौखरि वंश, चोल से चोलवन्य नामक राजवंशो के नाम प्रसिद्ध हुए । इसी प्रकार चंद्रातेय से चंदेल, राष्ट्रकूट से राष्ट्रकूट वंश, चाहमान से चौहान तथा, परमार से परमार वंश की स्थापना हुई ।

भागवत पुराण से तो हमे यह भी ज्ञात होता है, की प्रतिहार्य के पुत्रों में एक का नाम " अज " भी था । राम-लक्ष्मण के पिता दसरथ के पिता का नाम भी " अज " था । अतः यह प्रतिहार्य वंश भी रघुकुल ही हुआ ।

अब ठीक यही बात " गुर्जर " शब्द को लेकर है । गुर्जर - प्रतिहार तो कभी कोई जाति थी ही नही , यह केवल राजपूत थे, जो अपने प्रधानपुरुष या प्रदेश के नाम से अपना वंश स्थापित कर गए ! यह मामला ठीक वैसे ही है जैसे " बच्चन " कोई जाति नही है, हरिवंश राय " बच्चन " एक कवि थे, " अहीर " जाति से यादव थे, बच्चन लगाना शुरू कर दिया, कल यहीं बच्चन एक अलग जाति बन जाएगी ।
वैसे स्कन्दपुराण में 90000 भारतीयों के एक प्रदेश को गुजरत्रा कहा गया है । यह किसी गुर्जर नाम के व्यक्ति से बना प्रदेश मालूम होता है, लेकिन गुर्जर जाति नही है, केवल एक वंश है राजपूतो का, यह स्पष्ठ है ।

आज कुछ " गैर- क्षत्रिय " खुद को मिहिरभोज का वंशज बताते है, दूसरी ओर वहीं लोग एक हूण " तोरमाण " के पुत्र " मिहिरकुल " को भी अपना पूर्वज कहकर उसकी जयंती बनाते है । जबकि इतिहास गवाह है " राजपूत - हूण" सदैव ही आपस मे एक दूसरे के शत्रु रहे है ।

 हूण एक विदेशी जाति है, फिर किसी जाति का पूर्वज " देशी - विदेशी " दोनो ही लोग कैसे हो सकते है ?

चलो मान भी लिया कि हूण ओर राजपूत , दोनो विदेशी थे ... ओर दोनो भारत मे आक्रमणकारी बनकर आये, लेकिन हूणों ने एक बार भी धरा ओर धर्म के संरक्षण में भाग नही लिया, इस समय देश मे विदेशी शक भी विधमान थे, उन्होंने भी धर्म की रक्षा के लिए कुछ भी नही किया । स्पष्ठ है कि वे विदेशी थे, इसके विपरीत प्रारंभ से अंत तक प्रतिहार, परमार, चालुक्य, चाहमान, सारे सूर्यवशी, चंद्रवशी ओर सारे वंश के राजपूत पृथ्वी की रक्षा के लिए विलंब प्राणों ओर प्रिया, प्रिय पुत्र तथा सर्वस्व का मोह छोड़कर दौड़ पड़े, क्यो की यह धरती उनकी माँ थी, ओर वे इस धरती के पुत्र थे ।

   " माता भूमि: पुत्रोह्म पृथिव्या
    प्राणिनाम निकृष्ठयापी जन्मभूमि परा प्रिया "

अर्थात वह उनकी जन्मभूमि थी, जिन्हें वे प्राणों से अधिक प्रिय मानते थे, प्रतिहार ऐसे ही वीर क्षत्रिय थे, जिनका परमकर्तव्य राष्ट्र द्वार की रक्षा करना, मल्लेछो को रोकना ( प्रतिहरण करना ) था । इसीलिए वे प्रतिहार " प्रतिहरण विधरेह: प्रतिहार आसित : कहलाये ।

ना तो राजपूत शब्द नया है, ओर ना ही राजपूतो को छोड़कर अन्य कोई क्षत्रिय है । आज का जो नया गुर्जर शब्द आया है, यह " गौचर " शब्द का अपभ्रंस है । नयी जातियां भारत मे उदय होती रही है, बल्कि यूं कहें, की जातियों का नाम परिवर्तन कलयुग की धांधली के होता ही रहा है ।

कुशवाहा, गहलोत, यादव, गुर्जर यह सब राजपूतो के सरनाम थे, जो लगातार अन्य जातीयों के द्वारा अपना लिए गए ! अब राजपूत अपना सरनाम क्या रखें ??

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