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वीर सिंह बंदेला


#वीर सिंह बंदेला
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ओरछा के विख्यात हिन्दुत्व प्रेमी नरेश मधुकरशाह के पुत्र और बुन्देलखण्ड के लोक देवता हरदौल के पिता "वीर सिंह बुंदेला" एक कुशल शासक और महान योद्धा थे। स्थापत्य की दृष्टि से उनका शासनकाल ,बुन्देलखण्ड का स्वर्णकाल माना जाता है। ओरछा पर अपने शासन के समय(1605-1627) वीरसिंह देव ने झाँसी,दतिया,धामोनी,करैरा के किले के साथ-साथ मथुरा में श्रीकृष्ण के जन्मस्थान पर विशाल मंदिर का निर्माण करवाया था।
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ओरछा के राजा मधुकरशाह ( 1554-1592) की मृत्यु के बाद ,मधुकरशाह के बड़े पुत्र रामशाह(रामसिंह) ओरछा के राजा बने ।
दूसरे पुत्र होरलदेब को पिछोर ,तीसरे पुत्र इन्द्रजीत को कच्छौवा, #वीरसिंह देव को #बड़ौनी ,हरिसिंह को भसनेह,प्रतापराव को कूचपहारिया,रतनसिंह को गौरझामर और रनसिंह को सीपरी( शिवपुरी) की जागीर मिली।
यह सभी जागीरें ओरछा के अधीन मानी जाती थी ,लेकिन रामशाह का इनपर पूर्ण नियंत्रण नहीं था। इस कारण से ओरछा राज्य की स्थिति रामशाह के नियंत्रण से बाहर हो चुकी थी।
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वीरसिंह बुंदेला एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति थे , ओरछा की बिगड़ती स्थिति के बीच उन्होंने पवाया( पद्मावती नगरी, आज के डबरा-भितरवार के बीच का धूम पवाया) पर आक्रमण कर उसे जीत लिया। इसके बाद करहरा(करैरा),नरवर ,कैलारस(कोलारस) को जीता । बेरछा ,तोमरगढ,हथनौरा को जीतकर वीरसिंह देव ने बुन्देलखण्ड में अपने नाम की धाक जमा दी। इस कारण रामशाह चिंतित होकर ,ग्वालियर के आसकरन के साथ वीरसिंह देव को दबाने पहुँचा । लेकिन अपनी छोटी सी सेना से वीरसिंह देव ने छापामार युद्ध से दोनो की सेनाओं को परेशान किया। रामशाह और आसकरन को वापस लौटना पड़ा।
इसके बाद अकबर ने वीरसिंह देव को दबाने के लिये रामशाह को अपनी सेना दी ,जिसके बाद वीरसिंह देव को रामशाह से संधि करनी पड़ी ।
इसी समय अकबर के पुत्र सलीम का अपनी महत्वाकांक्षा के कारण ,अकबर से वैमनस्य बहुत बड़ चुका था ,सलीम अकबर के विश्वासपात्र अबुल फजल से भी बहुत घृणा करता था।
सलीम ने इलाहाबाद आकर ,अकबर के विरुद्ध खुली बगावत कर दी।
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सलीम को दबाने के लिये अकबर ने अबुल फजल को बुलावा भेजा , अबुल फजल उस समय दक्षिण में था।
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वीरसिंह देव सलीम से मिलने इलाहाबाद पहुँचे , जहाँ सलीम ने उनका स्वागत किया और अबुल फजल को मारने का काम सौपा। इसके बदले उन्हें ओरछा का राजा बनाने का वचन दिया।
वीरसिंह देव ने भी इसे अपने राज्य विस्तार की सीढ़ी मानते हुये , इस कार्य को करना स्वीकार किया।
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वीरसिंह देव को अबुल फजल के नरवर पहुँचने की सूचना मिली , आगे चलकर अबुल फजल ने आंतरी ( ग्वालियर) के पास डेरा डाला... जहाँ वीरसिंह देव ने अबुल फजल की सेना को घेर लिया। युद्ध में वीरसिंह देव अबुल फजल को मारने में सफल रहे, जिस्से जहाँगीर अत्यधिक प्रसन्न हुआ।
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इस्से क्रोधित अकबर ने वीरसिंह देव को‌ पकड़ने के लिये सेना भेजी , लेकिन वीरसिंह देव जहाँगीर की बात मान दतिया आ गये, और वहाँ से एरछ पहुँच गये। परेशान होकर शाही सेना को लौटना पड़ा। जिसके बाद वीरसिंह देव ने पूर्व में जीते हुये क्षेत्रों को दोबारा से अपने अधीन करना प्रारंभ किया।
इसमें उनके भाई हरिसिंह का सहयोग उन्हें हमेशा मिलता रहा। भसनेह अकबर के अधीन खड्गराय के जिम्मे आ चुका था , हरिसिंह देव ने भसनेह को दोबारा प्राप्त करना चाहा और भसनेह के पास खड्गराय से युद्ध करते हुये हरिसिंह वीरतापूर्वक शहीद हो गये। हरिसिंह की मृत्यु से वीरसिंह देव बहुत दुखी हुये।
इसी समय रामशाह के पुत्र संग्रामशाह का वीरसिंहदेव से मेल हो गया और भांडेर वीरसिंह देव को दे दिया। इमलौटा में आकर वीरसिंह देव का खड्गराय से युद्ध हुआ, जिसमें खड्गराय मारा गया।
इस्से क्रोधित होकर अकबर नें अबदुल्लाखां के नेतृत्व में वीरसिंह देव को पकड़ने मुगल सेना भेजी ....मुगल सेना के आने के पहले वीरसिंह देव ओरछा पर अधिकार कर चुके थे। मुगल सेना और वीरसिंह देव का ओरछा के पास सामना हुआ, जिसमें वीरसिंह देव का साथ इंद्रजीत ,उग्रसेन,संग्रामशाह, राव प्रताप आदि सामंत दे रहे थे। दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ ,जिसमें मुगल सेना को पीठ दिखानी पड़ी और वीरसिंह देव को विजय प्राप्त हुई ।
अकबर इस समय जरावस्था के कारण कमजोर हो चुका था। अपने पुत्र मुराद और दनियाल की मृत्यु के बाद, सलीम के विद्रोह करने के कारण अकबर बहुत चिंतित था, और सन् 1605 में उसकी मृत्यु हो गयी ।
सलीम(जहाँगीर) अगला मुगल शासक बना , उसने वीरसिंह बुन्देला को बुंदेलखंड के अधिकांश भाग का शासक स्वीकार किया।
वीरसिंह देव ने अपने बाहुबल और चतुराई से बुन्देलखण्ड को मुगलों के सीधे नियंत्रण से बाहर रखा....
पचास से ज्यादा छोटे-बड़े युद्ध किये...और बुन्देलखण्ड को एकजुट किया।
बुन्देलखण्ड में अनेक गढ़ी,किले,मन्दिर और तालाब बनवाये।
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जिसमे #झाँसी, दतिया ,धमौनी,करैरा के किले वीरसिंह देव ने ही बनाबाये थे ...मथुरा में 81 मन सोने के तुलादान के साथ, मथुरा में केशवदेव जी का लगभग 250 फुट उँचा एवं विशाल मंदिर(बाद में औरंगजेब ने इसे तुड़वा दिया) , मथुरा का बलदेव मंदिर का निर्माण वीरसिंह देव जी ने करवाया, भितरवार के पास धूमेश्वर महादेव मन्दिर भी इनके द्वारा बनवाया गया एक प्रसिद्ध मंदिर है।
ओरछा,दतिया ,टीकमगढ़ सहित पूरे बुन्देलखण्ड में मन्दिरों के साथ-साथ 100 से ज्यादा तालाबों का निर्माण करवाया...
जिसमें वीरसागर तालाब ,दिनारा का तालाब,अलगी का तालाब आदि प्रमुख हैं।
कहा जाता है ,कि इन्होंने 52 निर्माण कार्य एकसाथ प्रारंभ करवाये थे... दतिया,ओरछा सहित पूरे बुन्देलखण्ड में अनेक भव्य महलो का निर्माण करवाया।
रीतिकाल के आधार-स्तंभ #केशवदास भी कुछ समय के लिये वीरसिंह देव के दरबार में रहे और वहाँ "वीरसिंह देव चरित" की रचना की।
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हिन्दुत्व के पुरोधा ,वीर और निडर शासक वीरसिंह देव को सत्-सत् नमन्....🙏🙏🙏.
शिवम् सिंह परमार
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लेख स्त्रोत
1.https://m.facebook.com/permalink.php?story_fbid=1292318017491792&id=56765971995762
2. http://hindi.indiawaterportal.org/Ponds-of-Shivpur
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3.बुन्देलखण्ड का संक्षिप्त इतिहास-गोरेलाल तिवारी
4.बुन्देलखण्ड चित्रावली
5.http://www.sarita.in/tourism/veer-singh-judev-fort

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