|| ॐ जय श्रीराम ||
विस्मृत वीर: इनकी भी याद करो कुर्बानी....!!!
#हल्दी_घाटी_युद्ध_में_राजा_राम_शाह_तोमर_बलिदान_दिवस(18 जुन,1576)
अगर ग्वालियर के महाराजा मान सिंह तोमर के पोते राजा राम शाह तोमर तीन बेटों के साथ बलिदान नहीं देते तो हल्दी घाटी के युद्ध का परिणाम बदल सकता था. राजा राम सिंह ने युद्ध में पकड़ बनाए रखी, और मुगलों में दहशत फैला दी.
अकबर की रणनीति थी कि लड़ते-लड़ते प्रताप के दस्ते को उनकी सेना से दक्षिण में दूर ले जाएं.यहां पर अकबर और उनके सेनापति आमेर के राजा मान सिंह प्रताप को घेरे लेंगे, तब तक राणा की शेष बची सेना को परास्त कर दिया जाएगा.उनकी रणनीति यहां तक तो सफल रही कि महाराणा को घेर लिया गया, लेकिन वो अपने घोड़े चेतक के ऐतिहासिक बलिदान की वजह से उस घेरे को तोड़ कर सुरक्षित निकल आए थे.
युद्ध के प्रत्यक्षदर्शी मुल्ला बदायूं ने लिखा है कि बाईं तरफ बची बाकी सेना ग्वालियर की थी.उसका नेतृत्व राजा राम शाह कर रहे थे.उनके साथ उनके तीन बेटे शालिवाहन, भवानी सिंह, प्रताप सिंह और पोता बलभद्र सिंह भी थे.इस मोर्चे पर मुगल सेना के पैर उखड़ने ही वाले थे, कि अकबर की सेना के सरदार मेहतर खां ने ये अफवाह फैला दी कि राजा राम शाह और उनके बेटे मारे गए और सम्राट अकबर अब खुद सेना के साथ युद्ध करने आ रहे हैं.अफवाह को सच मान राजा राम शाह और उनके बेटों ने क्रोध में मरने की इच्छा लेकर युद्ध किया.दूसरी ओर अफवाह से अकबर की हार रही सेना में दोबारा आत्मविश्वास आ गया.राजा राम सिंह व उनके तीनों राजकुमार शहीद हुए, लेकिन तब तक महाराणा के साथ अग्रिम मोर्चे से लौट रही सेना मोर्चे पर आ गई.शाम हो गई थी और उस दिन के युद्ध को विराम दे दिया गया.इस तरह हल्दीघाटी के प्रथम चरण में ग्वालियर के राजा, राजकुमारों व सेना के बलिदान से प्रथम चरण में महाराणा का गौरव बना रहा..!!
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