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सम्राट नागभट्ट प्रतिहार- महान धर्म रक्षक


सम्राट नागभट्ट प्रतिहार- महान धर्म रक्षक 

तद्वंशे प्रतिहार केतान्भ्रुती त्रैलोक्य रक्षास्पदे
देवो नागभट पुरातन मुनेर्भुतिर्ववाद्भुतम ।
येनासो सुकृत्प्रमार्थिर्बल्न म्लेच्छ-धिपाक्शोहीनिः
क्शुन्दानास्फुर दुग्रहेतिरुचिरैर्दोश्च्तुर्भिर्वभौ ।।

आदिवाराह ।

पुराणों में एक प्रतीकात्मक कथा का वर्णन मिलता है। वह इस प्रकार से है। युगों पूर्व हिरण्याक्ष नामक असुर ने धरती को रसातल मे डुबो दिया था , तब धरती को पाताल से मुक्त करने हेतु भगवान् वाराह ने हिरण्याक्ष का वध किया और धरती को पाताल से बाहर निकाल कर उसका उद्धार किया ,जिस प्रकार वे धरती के रक्षक कहलाये ।

गुजरात जो गुर्जर प्रदेश के नाम से भी जाना जाता था वहाँ शासक प्रतिहार क्षत्रिय राजपूत वंश से हुए थे। वराह अवतार की प्रतीकात्मक कथा से प्रभावित होकर प्रतिहार शासक भी आदिवाराह नाम से जाने लगे। उनकी राजमुद्रा पर भी वराह का रूप अंकित उन्होंने करवाया। क्योंकि वे भी भगवान् वाराह की तरह हिन्दुभूमि को म्लेच्छो के काल-पाश में जाने से बचा पाए थे और म्लेच्छो के अधिकार में गयी हुयी भूमि को उनसे वापस छीन कर उसका उद्धार करने में सफल हो पाए थे ।

इस्लाम की स्थापना तथा अरबो का रक्तरंजीत साम्राज्यविस्तार सम्पूर्ण विश्व के लिए एक भयावह घटना है। मोहम्मद पैगम्बर के मृत्यु के बाद अरबो का इस्लामिक साम्राज्यवाद रूपी उत्थान हुआ|

१०० वर्ष भीतर ही उन्होंने पश्चिम में स्पेन से पूर्व में चीन तक अपने साम्राज्य को विस्तारित किया।

वे जिस भी प्रदेश को जीतते वहां के लोगों के पास केवल दो ही विकल्प रखते। या तो वे इस्लाम स्वीकार कर ले या मौत के घाट उतरे। उन्होंने पर्शिया जैसी महान संस्कृतियों ,सभ्यताओं,शिष्टाचारो को रोंद डाला ,मंदिर, उपासनास्थल ,पाठशालाए, ग्रंथालय आदि सब नष्ट कर डाले। कला और संस्कृतियों को जला डाला। सम्पूर्ण विश्व विशेष रूप से एशिया प्रान्त में हाहाकार मच गया।

ग्रीस,मिश्र,स्पेन,अफ्रीका,इरान आदि महासत्ताओ को कुचलने के बाद। अरबो के खुनी पंजे हिन्दुस्तान की भूमि की ओर बढ़े।

कठिन परिश्रम के बाद अंतर्गत धोखेबाजी से से राजा दाहिर की पराजय हुयी और अरबो की सिंध के रूप में भारत में पहली सफलता मिली।

सिंधविजय के तुरंत बाद अरबों ने सम्पूर्ण हिन्दुस्तान को जीतकर वहा की संस्कृति को नष्ट भ्रष्ट करने हेतु महत्वाकांक्षी सेनापति अब्दुल-रहमान-जुनैद-अलगारी और अमरु को सिंध का सुबेदार बनाकर भेजा।

जुनैद ने पूरी शक्ति के साथ गुजरात,मालवा और राजस्थान के प्रदेशों पर हमला बोल दिया।उस समय वहां अनेक छोटी छोटी रियासते राज्य करती थीं।
जैसलमेर के भाटी,अजमेर के चौहान,भीनमाल के चावड़ा आदि ने डट कर अरबी सेना का मुकाबला किया। पर वे सफल नहीं हो पाए और एक के बाद एक हारते गए।
जैसलमेर के भाटी शासकों की पराजय के बाद वहा के प्रदेशों पर अरबों का अधिकार हो गया।

इन सबको हराकर जुनैद ने मालवा पर आक्रमण कर दिया। जहां की राजधानी थी उजैन, जहां प्रतिहार साम्राज्य का शासन था और जहां के शासक थे एक महावीर धर्मपुरुष सम्राट नागभट प्रतिहार।

अरबी सेना का नागभट्ट के साथ युद्ध हुआ। जिसमे अरबी सेना को वापस लौटना पडा क्योंकि नाग भट ने उनका कड़ा प्रतिकार किया था, परन्तु वे लौट कर पूर्ण शक्ति के साथ आयेंगे ये निश्चित था।

सम्पूर्ण भारत पर अब अरबो के भीषण आक्रमण से होने वाले महाविनाश का खतरा मंडराने लगा और सम्पूर्ण भारत की जनता ये प्रतीक्षा करने लगी की कोई महान योद्धा उन्हें इस खतरे से बचाए।

उन दिनों चित्तोड़ और मेवाड़ पर नागदा के गहलोत वंशीय बाप्पा रावल ने वहा अपना अधिकार जमा लिया था। नाग भट की तरह वो भी अरबों के संभावित खतरे से परिचित थे। इसीलिए उन्होंने अरबों के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा स्थापित किया। जिसमें अनेक पूर्व ,पश्चिमी,उत्तर और दक्षिणी राजाओं ने हिस्सा लिया।

नागभट्ट को ये पता चलते ही उसने अपनी सारी सेना और शक्ति लेकर वो बाप्पा रावल के साथ हो लिया ।चालुक्यो ने अपने युवा युवराज अव्निजनाश्रय पुल्केशी को भी भारी सेना के साथ नागभट्ट के साथ भेज दिया और इस प्रकार एक महान सेना का गठन हुआ जिसकी संख्या एक लाख से अधिक थी।

मारवाड़ के आसपास सन् ७३८ में अरबो की विशाल सेना से हिन्दुओं की इस सेना का जिसका नेतृत्व नागभट्ट और बाप्पा रावल कर रहे थे। भीषण संग्राम हुआ जिस संग्राम का वर्णन देवासुर संग्राम से करना उचित होगा।

दिन ढलने से पूर्व ही अरबों की सेना की मुख्य टुकड़ी काट कर फेंक दी गई। सूर्यास्त होने से पूर्व इने गिने अरबी सैनिको को छोड़ के बाकी सारे वध कर दिए गए। जुनैद अपने अंगरक्षको के साथ भाग निकला। युद्ध में आये हुए घावों के कारण उसी रात उसकी मृत्यु हो गयी ।सम्पूर्ण अरब में उनके बड़े सेनापति के अपनी सेना के साथ मारे जाने से हाहाकार मच गया ।

बाप्पा रावल ने युद्ध में विजय प्राप्त होने के पश्चात सिंध पर आक्रमण कर वहां भी मुसलमानों को उखाड़ फेका। सिन्धु नदी को लांघकर इरान तक प्रदेश को विजय कर और वहां के सुलतान हैबत्खान की पुत्री से विवाह कर बाप्पा रावल ने संन्यास ले लिया।

अरबों की भारत में भीषण पराजय होने से उनकी प्रतिष्ठा को कलंक लग गया था। जिसे धोकर उस खोयी हुयी प्रतिष्ठा को प्राप्त करने और प्रतिशोध की भावना से अरब भारत के विरुद्ध एक दूसरा अभियान छेड़ने के लिए शाक्तिसंचय में लग गए।

उन्होंने इरान,ईराक, मिश्र,आफ्रिका आदि से सेनाये और सेनानायको को इकठ्ठा किया और तामीन के नेतृत्व में भारत तथा नागभट्ट की ओर कूच कर दिया ।

अत्यंत दूरदृष्टी रखनेवाले नागभट्ट ये जानते थे कि ये एक ना एक दिन होना ही था। इसलिए वे दक्षिण में राष्ट्रकूट से हो रहे युद्ध को छोड़कर वापस उज्जैन आये और वहां से सीधे चित्तौर पहुंचे जहाँ बाप्पा रावल का पुत्र खुमान रावल राज्य करता था।

नागभट्ट ने खुमान को उसके पिता बाप्पा रावल ने किये हुए संयुक्त युद्ध को याद दिलाया और पुनः एक बार वैसा ही मोर्चा तथा सेना संगठन अरबों के विरुद्ध करने का आवाहन किया। जिसे खुम्मान ने स्वीकार किया। एक बार फिर पुल्केशी परमारों ,सोलंकियो ने मोर्चे में सहभाग लिया और महासेना का गठन हुआ ।

इस बार मोर्चे का नेतृत्व पूर्ण रूप से नागभट्ट के हाथ में था। नागभट्ट ने अनोखी सोच सोची कि इस से पहले की शत्रु हम पर वार करे। हम खुद ही शत्रु पर कूच करे।

इस से पहले की अरबी सेना सिन्धु नदी को पार करती। नागभट्ट ने उन पर आक्रमण किया। जो युद्ध कुछ सप्ताह बाद होना थ। वो कुछ पहले हो जाने से अरब चकित हो गए। भीषण संग्राम में रणभूमि म्लेच्छो के रक्त से तर हुयी।

सूर्यास्त होने से पूर्व तामीन का शीश हवा में लहरा गया और सेना नायक की मृत्यु होने से युद्ध में अरबो की पूर्ण रूप से पराजय हुई। भागते हुए अरबों का हिन्दू सेना ने कई दूर तक पीछा किया। कई स्थानों पर अरब वापस खड़े होते गए और उखड़ते गए।

मुस्लिम इतिहासकारों ने अरबो की इस पराजय का वर्णन "फुतुहूल्बल्दान" नामक ग्रन्थ में किया है। जिसमें अरब लिखते है कि हिन्दुओ ने अरबी मुसलमानों के लिए थोड़ी भी जमीन नहीं छोड़ी। इसलिए उन्हें भागकर दरिया के उस पार एक महफूज नगर बसाना पड़ा।

बार बार भारत में अपनी सेना की हानि होने की वजह से अपनी बची हुयी प्रतिष्ठा वापस मिलाने अरबों ने ये निश्चय कर लिया की भारत के किसी भी हिस्से को अब छुआ नहीं जाए और इसीलिए अगले 350 सालों तक अरबो ने भारत खंड में पैर नहीं रखा।

और इसप्रकार प्रतिहार नागभट्ट और बाप्पा रावल ने अपने भूमि और धर्म की रक्षा की!

आज इस घटना और हमारे मध्य दीर्घकाल बीत गया है।

कल्पना करना भी भयावह है कि यदि बप्पारावल औरनागभट्ट जैसे महान वीर यदि उस वक्त राज्यों में बटे भारत को एक कर अरबो के विरुद्ध ना खड़े होते तो आज हम कौन होते,क्या कर रहे होते और किस हाल में होते...और इसीलिए हमें उन धर्मवीरो का सम्मान करना चाहिए।

अरबी राक्षसों के मुह में जाने से प्रतिहारो ने हिन्दुभूमि को बचाया और अपने आप को आदिवाराह की उपाधि दी!

आज भी हमारी भूमि अधर्मियों के चंगुल में फंसती जा रही है। आज भी हमें नागभट्ट जैसे "आदिवाराह" की आवश्यकता है। जो की अधर्मियों का नाश कर धर्म की पताका फहराए !

जय क्षात्र धर्म !!
जय राजपूताना !!

https://www.rajputland.in/

#ҡรɦαƭ૨เყα_૨αʝρµƭ

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