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राष्ट्रकूट_से_राठौड़


राष्ट्रकूट वंश का आरम्भ 'दन्तिदुर्ग' से लगभग 736 ई. में हुआ था। उसने नासिक को अपनी राजधानी बनाया। इसके उपरान्त इन शासकों ने मान्यखेत, (आधुनिक मालखंड) को अपनी राजधानी बनाया। राष्ट्रकूटों ने 736 ई. से 973 ई. तक राज्य किया।
राष्ट्रकूट वंशीय शासक शासकों के नाम शासन काल
दन्तिदुर्ग (736-756 ई.)
कृष्ण प्रथम (756-772 ई.)
गोविन्द द्वितीय (773-780 ई.)
ध्रुव धारावर्ष (780-793 ई.)
गोविन्द तृतीय (793-814 ई.)
अमोघवर्ष प्रथम (814-878 ई.)
कृष्ण द्वितीय (978-915 ई.)
इन्द्र तृतीय (915-917 ई.)
अमोघवर्ष द्वितीय (917-918 ई.)
गोविन्द चतुर्थ (918-934 ई.)
अमोघवर्ष तृतीय (934-939 ई.)
कृष्ण तृतीय (939-967 ई.)
खोट्टिग अमोघवर्ष (967-972 ई.)
कर्क द्वितीय (972-973 ई.)
शासन तन्त्र
राष्ट्रकूटों ने एक सुव्यवस्थित शासन प्रणाली को जन्म दिया था। प्रशासन राजतन्त्रात्मक था। राजा सर्वोच्च शक्तिमान था। राजपद आनुवंशिक होता था। शासन संचालन के लिए सम्पूर्ण राज्य को राष्ट्रों, विषयों, भूक्तियों तथा ग्रामों में विभाजित किया गया था। राष्ट्र, जिसे 'मण्डल' कहा जाता था, प्रशासन की सबसे बड़ी इकाई थी। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई 'ग्राम' थी। राष्ट्र के प्रधान को 'राष्ट्रपति' या 'राष्ट्रकूट' कहा जाता था। एक राष्ट्र चार या पाँच ज़िलों के बराबर होता था। राष्ट्र कई विषयों एवं ज़िलों में विभाजित था। एक विषय में 2000 गाँव होते थे। विषय का प्रधान 'विषयपति' कहलाता था। विषयपति की सहायता के लिए 'विषय महत्तर' होते थे। विषय को ग्रामों या भुक्तियों में विभाजित किया गया था। प्रत्येक भुक्ति में लगभग 100 से 500 गाँव होते थे। ये आधुनिक तहसील की तरह थे। भुक्ति के प्रधान को 'भोगपति' या 'भोगिक' कहा जाता था। इसका पद आनुवांशिक होता था। वेतन के बदले इन्हें करमुक्त भूमि प्रदान की जाती थी। भुक्ति छोटे-छोटे गाँव में बाँट दिया गया था, जिनमें 10 से 30 गाँव होते थे। नगर का अधिकारी 'नगरपति' कहलाता था।
प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी। ग्राम के अधिकारी को 'ग्रामकूट', 'ग्रामपति', 'गावुण्ड' आदि नामों से पुकारा जाता था। इसकी एक ग्राम सभा भी थी, जिसमें ग्राम के प्रत्येक परिवार का सदस्य होता था। गाँव के झगड़े का निपटारा करना इसका प्रमुख कार्य था।
ब उत्तरी भारत में पाल और प्रतिहार वंशों का शासन था, दक्कन में राष्टूकूट राज्य करते थे। इस वंश ने भारत को कई योद्धा और कुशल प्रशासक दिए हैं। इस साम्राज्य की नींव 'दन्तिदुर्ग' ने डाली। दन्तिदुर्ग ने 750 ई. में चालुक्यों के शासन को समाप्त कर आज के शोलापुर के निकट अपनी राजधानी 'मान्यखेट' अथवा 'मानखेड़' की नींव रखी। शीघ्र ही महाराष्ट्र के उत्तर के सभी क्षेत्रों पर राष्ट्रकूटों का आधिपत्य हो गया। गुजरात और मालवा के प्रभुत्व के लिए इन्होंने प्रतिहारों से भी लोहा लिया। यद्यपि इन हमलों के कारण राष्ट्रकूट अपने साम्राज्य का विस्तार गंगा घाटी तक नहीं कर सके तथापि इनमें उन्हें बहुत बड़ी मात्रा में धन राशि मिली और उनकी ख्याति बढ़ी। वंगी (वर्तमान आंध्र प्रदेश) के पूर्वी चालुक्यों और दक्षिण में कांची के पल्लवों तथा मदुरई के पांड्यों के साथ भी राष्ट्रकूटों का बराबर संघर्ष चलता रहा। राष्ट्रकूटों के सबसे शक्तिशाली शासक सम्भवतः इन्द्र तृतीय (915-927) तथा कृष्ण तृतीय (929-965) थे। महीपाल की पराजय और कन्नौज के पतन के बाद 915 में इन्द्र तृतीय अपने समय का सबसे शक्तिशाली राजा था। इसी समय भारत आने वाले यात्री अल मसूदी के अनुसार 'बल्लभराज या बल्हर भारत का सबसे महान् राजा था और अधिकतर भारतीय शासक उसके प्रभुत्व को स्वीकार करते थे और उसके राजदूतों को आदर देते थे। उसके पास बहुत बड़ी सेना और असंख्य हाथी थे।'
कृष्ण तृतीय
कृष्ण तृतीय ने मालवा के परमारों तथा वेंगी के चालुक्यों से लोहा लिया। उसने तंजावुर के चोल राजाओं, जिन्होंने कांची के पल्लवों को पराजित किया था, के विरुद्ध भी अभियान छेड़ा। कृष्ण तृतीय ने चोल नरेश परंतक प्रथम को पराजित कर चोल साम्राज्य के उत्तरी भाग पर क़ब्ज़ा कर लिया। इसके पश्चात् वह रामेश्वरम तक गया जहाँ उसने एक 'विजय स्तम्भ' तथा एक मन्दिर का निर्माण किया। अपनी विजय और अभियानों की सफलता के प्रतीक के रूप में कृष्ण तृतीय ने सकल दक्षिण दिशाधिपति की उपाधि ग्रहण की। कृष्ण तृतीय अपनी विजयों के बावजूद एक बुद्धिमान प्रशासक नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसने अपने सभी पड़ोसियों के विरुद्ध लड़ाई छेड़कर उन्हें अपना शत्रु बना लिया जिसका परिणाम उसके उत्तराधिकारियों को भुगतना पड़ा। कृष्ण तृतीय की मृत्यु के पश्चात् उत्तराधिकार के लिए उसके पुत्रों में संघर्ष छिड़ गया तथा आंतरिक मतभेद और गहरे हो गए। मालवा के परमारों ने इस स्थिति का पूरी तरह से लाभ उठाया और राष्ट्रकूटों पर चढ़ाई कर दी। परमार नरेश सीयक ने 972 में राष्ट्रकूटों की राजधानी मालखेड़ पर धावा बोला और उसे तहस-नहस कर डाला। इसी अवधि में अन्य राष्ट्रकूट के सामंतों ने भी बग़ावत कर दी और अपनी-अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। इसके साथ ही राष्ट्रकूट साम्राज्य का अन्त हो गया।
राष्ट्रकूट नरेश कला तथा साहित्य के भी संरक्षक थे। उनके दरबार में न केवल राजशेखर जैसे संस्कृत के विद्वान् थे वरन् ऐसे भी साहित्यकार थे जो प्राकृत और अपभ्रंश में लिखते थे। जिनसे आधुनिक भारतीय भाषाओं की उत्पत्ति हुई है। अपभ्रंश के महान् कवि स्वयंभू तथा उनका पुत्र सम्भवतः राष्ट्रकूट दरबार के ही सदस्य थे। कहा जाता है कि नौवीं शताब्दी के राष्ट्रकूट नरेश अमोघवर्ष ने कन्नड़ में काव्य शास्त्र पर प्रथम पुस्तक लिखी।
राजनीतिक संगठन
इन साम्राज्यों का प्रशासन उत्तर में गुप्त और हर्ष तथा दक्कन में चालुक्यों के प्रशासन के आधार पर व्यवस्थित था। पहले की तरह सत्ता तथा सभी गतिविधियों का केन्द्र सम्राट था। वह प्रमुख प्रशासक के साथ-साथ प्रमुख सेनाध्यक्ष भी था। वह बड़े ही शानदार दरबार में बैठता था। दरबार से लगे प्रांगण में उसके पैदल और घुड़सवार सिपाही रहते थे। युद्ध के दौरान क़ब्ज़े में किए गए घोड़ों और हाथियों का उसके सामने से जुलूस निकाला जाता था। सामंती सरदार, उनका प्रमुख, राजपूत तथा कई उच्चाधिकारी उसके दरबार की शोभा बढ़ाते थे और उसके आज्ञापालन के लिए तत्पर रहते थे। न्याय का काम भी राजा के हाथ में ही था। राजदरबार न केवल राजनीतिक कार्यवाइयों का वरन् न्याय और सांस्कृतिक जीवन का भी केन्द्र था। राजदरबार में कुशल संगीतज्ञ तथा नर्तकियाँ भी रहती थीं। विशेष अवसरों पर रनिवास की महिलाएँ भी राजदरबार में आती थीं। अरब लेखकों के अनुसार राष्ट्रकूट साम्राज्य में ऐसी महिलाएँ पर्दा नहीं करती थीं। पर्दाप्रथा भारत मे मुस्लिमो के कारण आयी है ।
राष्ट्रकूटों के यही वंसज आज राठौड़ कहे जाते है , इनका सीधा संबंध राम जी के रक्त से है ।
साभार

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