भारत के रक्षक - नागभट्ट प्रतिहार द्वितीय
नागभट के पिता को वत्सराज राष्ट्रकूटों से बड़ी बुरी तरह परास्त हुए थे , इस पराजय के बाद महाराज वत्सराज ज़्यादा दिन तक जीवित नहीं रह पाएं। उनके बाद नागभट प्रतिहार द्वितीय का राजतिलक हुआ , उनके राजा बनने से पहले राष्ट्रकूटों ने प्रतिहारो को शक्ति को शून्य कर दिया। मौके का फायदा उठाकर पाल भी अब स्वतंत्र हो गए थे। लेकिन नागभट द्वितीय ने इन मुश्किल हालातो की कभी परवाह नहीं की ।
नागभट द्वितीय के समय अरब, अफ्रीका , तथा यूरोप का बहुत बड़ा भाग मुसलमानो के कोप का शिकार हो चुका था , वहां के लोगो के सर में हथोड़े मार , गर्म चिमटे लगा , गले पर छुरी चाकू रख इस्लाम की दीक्षा दी जा चुकी थी , भारत के सिंध तक मनुष्य के भेष में यह पशु आतंक फैला रहे थे , हँसते खिलते सिंध को , इन हिंसक पशुओ में बर्बाद कर दिया था।
ऐसे विकट समय में भी नारायण के मूर्त रोप नागभट ने अपने धनुष तथा धनुष से ना केवल मनुष्यो की रक्षा की बल्कि धर्म को भी सुरक्षित किया
गुजरात प्रशस्ति के पेज संख्या ४२ में नागभट प्रतिहार के बारे में वर्णन मिलता है की __
आध: पुमान पुनरपि स्पुतकीर्तिरस्मा
जजातस्स एवं किलः नागभटस्तदारण्य
नागभट्ट के सिहासन पर विराजमान होते ही सबसे पहले कान्यकुब्ज के शाशक को पराजित किया , इस आक्रमण के पीछे कारण यह था की कान्यकुब्ज के शाशक ने जैन मत ग्रहण कर लिया था , इससे क्रुद्ध हो , नागभट ने कान्यकुब्ज के राजा पर हमला बोला था , कान्यकुब्ज के गोपालदुर्ग के राजा ने महावीर स्वामी का एक मंदिर बना दिया था , नागभट हिन्दू धर्म के प्रति इतने कटटर थे , की हिन्दू देवी देवताओ के अलावा किसी अन्य का मंदिर या पूजा स्थल बनना उन्हें स्वीकार नहीं था। उन्होंने गोपालदुर्ग के गढ़ को केवल इसलिए कुचल कर रख दिया था , की उन्होने महावीर स्वामी का जैन मंदिर बना दिया था था। नागभट द्वितीय के समय कुमारिल भट्ट नाम के एक ब्राह्मण सन्यासी ने चारो दिशाओ में अपने ज्ञान की ज्योत से , बौद्ध तथा जैन नास्तिको की पद पर कड़ा प्रहार करना शुरू किया था , उस समय बौद्ध तथा जैनो का आतंक भारत में बहुत बढ़ , गया था। ब्राह्मणो को लेकर चारो और विद्वेष था , जैन तथा बौद्ध धर्म के अनुआयी खुलेआम सनातन धर्म का अपमान करने लगे। स्कंदपुराण में जैनो तथा बोद्धो के आतंक का विस्तृत वर्णन किया गया है। स्कंदपुराण ३/२/३६/९२-१५ से हमे ज्ञात होता है , जैन तथा बुद्ध मत के लोग उस समय खुलेआम वेदो का उपहास उड़ाते थे , राक्षसों की तरह यह जैन और बौद्ध मत के लोग यज्ञ तथा हवन में बाधा डालने लगे थे।
जैन, बौद्ध तथा मुसलमानो के भयंकर आतंक से हिन्दू त्राहिमाम त्राहिमाम करने लगे। एक तरफ तो अरब की और से क्रूर राक्षसी धर्म आंधी की तरह सबको बर्बाद करत हुआ , सबको उजाड़ता , एक अरबी राक्षसी धर्म भारत की और मुँह फाड़े खड़े थे , ऐसे समय में भी यह गद्दार भारत के राजाओ के साथ नहीं थे जैनो की राजनीती को नागभट ने समझा , तथा इस मत जड़ से उखाड़ फेंका था।
नागभट द्वितीय की प्रसंसा करते हुए स्कंदपुराण का कहना है " जब भारत अरब देश के आक्रमण से तंग था , और भारत अंदर घोर अंधकार छाया हुआ था , वे धरा पर सूर्य के प्रकाश की भांति चमक उठे , एक बार कोई काम करने की सोच लेने के बाद उस कार्य को पूर्ण करने के बाद ही दम लेते थे। इसी कारण उन्हें आत्मबल जितेन्द्रिय भी कहा जाता है। खुद को प्रतिहारो से स्वतंत्र करने वाले पालो पर चढ़ाई करते हुए वीर पाल सम्राट धर्मपाल को परास्त कर दिया , अब नागभट की नजर राष्ट्रकूट साम्राज्य पर थी , नागभट के पिता वत्सराज प्रतिहार के घोड़े और उनका छत्र राष्ट्रकूट उर्फ़ राठोड़ो ने छीन लिया था। नागभट गंगा जमुना दोआब पर राष्ट्रकूटों को घेरकर बैठ गया। इस युद्ध के लिए नागभट ने बड़ी तैयारी की थी , बड़ी बुरी तरह से राष्ट्रकूट नागभट के हाथो इस युद्ध में परास्त हुए।
राष्ट्रकूट एक बड़ी शक्ति थे , उन्हें प्रतिहारो ने बड़ी बुरी तरह कुचल डाला था , यह देख अन्य कई राजाओ ने लड़े बिना ही नागभट्ट के आगे समर्पण कर दिया था। और जिन राजाओ ने नागभट के आगे समर्पण नहीं किया , नागभट ने बलपूर्वक उन राजाओ से उमके दुर्ग जीत लिए।
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उसके बाद नागभट प्रतिहार द्वितीय ने मालवा के परमारो को , वत्स व् मत्स्य राजाओ को , अर्थात चौहानो और राजस्थान के राजाओ को उनके दुर्गो से बाहर खदेड़ उनपर अपना कब्जा स्थापित कर दिया था। केवल इतना ही नहीं गजनी के मल्लेछ गजनवियों को परास्त करने का श्रेय भी महाराज नागभट प्रतिहार को जाता है। सम्राट नागभट अपनी मृत्यु से पहले तक एक सार्वभौम शाशक बन चुके थे। जब वे गद्दी पर बैठे थे , तो भारत मुसलमानो के आक्रमण के भय से जूझ रहा था , वहीँ यह बौद्ध और जैन धर्म के लोग अनैतिक तरीको धर्म के प्रचार में लगे थे , अपनी सुंदर सुंदर कन्याओ के बल पर कई क्षत्रिय राजाओ को इन्होने फांस लिया था , इस तरह राजकीय दरबारों तक जैनो की सीधी पहुँच हो गयी थी , लेकिन इन सभी विकट परिस्थितियों से भी हमारे राजाओ ने हमे निकाल लिया था।
नागभट द्वितीय को भी अरबी आक्रमणकारियो से पूरा संघर्ष करना पड़ा था , मुस्लमान सिंध से होते होते , जनसख्या विस्फोट करते पंजाब तक आ चुके थे। यह लोग विदेशी घुसपैठिये ही थे , जो मौका पाने के साथ ही भारत में खून की नदी बहाकर यहाँ की धन , सम्पदा , सम्पति लूटने को आतुर थे। पुराणों में सिंध में बसे हुए अरबो को यवन मल्लेछ कहा गया है। उसी तरह उत्तर पश्चिम हिमालय की पहाड़ियों में भी मल्लेछ आ बसे थे।
पद्मपुराण में तुर्को को भी मल्लेछ ही कहा गया है " हिमाचलया मल्लेछा उदीची दिशमाश्रिता " , यह मल्लेछ तुर्की मुसलमान ही थे। यह कुशल घुड़सवार हुआ करते थे तथा युद्ध से मुँह मोड़ने वाले नहीं थे। तुर्की लोगो ने भी हिन्दुओ की तरह मुसलमानो के साथ बड़ा लंबा संघर्ष किया है अपने धर्म को बचाने के लिए , ंतुरकी लोग पहले " टेंगरी " नाम के किसी देवता को मानते थे। जिसका अर्थ होता था - धरती का राजा उर्फ़ जगन्नाथ। यह अर्धचंद्र और सितारे उसी टेंगडी उर्फ़ जगन्नाथ की निशानिया है अर्धचन्द्रमा और सितारे से अरब का इन प्रतीकों से कोई लेना देना नहीं है , यह बस तुर्की लोगो की इस्लामपूर्व के अपन धर्म की निशानियाँ है। नागभट द्वितीय ने पंजाब के रास्ते हिमाचल होते हुए , कश्मीर और इन सभी हिमलाय के प्रदेशो में मल्लेछों का भयंकर संघार किया। तभी भारत में इस्लाम का जनसख्या विस्फोट इतने लम्बे समय तक रुक पाया है। १० से १५ सालो में किसी भी देश को पूर्ण इस्लामिक बना देने वाले मुस्लिम सुल्तान यहाँ १००० साल आतंक फैलाकर भी भारत की २० % जनता का भी धर्मपरिवर्तन नहीं करवा सके। नागभट्ट के बाद देश की रक्षा का भार रामभद्र प्रे आया। लेकिन रामभद्र के शाशनकाल में प्रतिहार कुछ कमजोर भी हुए , लेकिन इसका कोई विशेष लाभ विदेशियों को नहीं मिलना था।
क्यो की उनके बाद गद्दी पर भारत के सबसे महान शासकों में एक मिहिरभोज "वराह " गद्दी पर विराजमान थे ....
साभार - राम पुरोहित
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