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#जब_तुर्की_ओर_जर्मन_सेना_को_राजपूतो_ने_धूल_चटा_दी - वह भी मात्र एक घण्टे में ।




#जब_तुर्की_ओर_जर्मन_सेना_को_राजपूतो_ने_धूल_चटा_दी - वह भी मात्र एक घण्टे में ।

आज पूरी दुनिया मे इजरायल की वीरता का डंका बजता है । लेकिन इन्ही इजरायली लोगो की मदद भारत के वीर राजपूतो ने की थी ।

आज राजपूत भारतीयों के लिए घर की मुर्गी दाल बराबर है , भारतीय लोगो को कभी मौका ही नही मिला, की राजपूतो का सामना उन्हें करना पड़े, लेकीज जिन्होंने राजपूतो का सामना किया, वे सभी भलीभांति जानते थे -- " जब तक राजपूत है, भारत अजेय है । "

दरअसल हमारी पाठ्यपुस्तकों में राजपूतो के बारे में केवल कुछ पन्ने है । ज़्यादातर पोथियां सिखों , मुसलमानों इनके नाम की हुई है । हमारे बीच यही प्रचारित किया जाता है, की सिख ना होते, तो हिन्दू धर्म भी नही होता , जबकि सत्य यह है, की इन्ही वीर हिन्दुओ ने ना केवल अपने धर्म की रक्षा की, बल्कि उन लोगो को भी बचाया, जो राजपूतो के कुछ नही लगते थे ।

हिन्दू अपनी रक्षा करते आये है, ओर आगे भी करते रहेंगे । अगर हिन्दू धर्म को किसी ने बचाया है, तो वह राजपूत है , केवल राजपूत । भगवान भी अगर वैदिक धर्म की रक्षा के लिए धरती पर प्रकट हुए है, तो वे भी राजपूतो के आंगन में ही खेलकर बड़े हुए है ।

इन्ही वीर राजपूतो ने इतिहास में अपनी बहादुरी का एक ओर पन्ना जोड़ दिया था प्रथम विश्व युद्ध के समय ।

प्रथम विश्व युद्ध मे ब्रिटेन और जर्मनी दो प्रमुख राष्ट्र थे। जर्मनी और तुर्की आपस मे मित्र देश थे, इन्ही दो देशों जर्मनी और तुर्की ने मिलकर " हैफा " नाम ने एक दुर्ग पर कब्जा कर लिया । उस समय जोधपुर की सेना प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटेन की तरफ से लड़ रही थी ।

जब ब्रिटेन आदि सभी मित्र राष्ट्रों ने देखा कि हैफा दुर्ग से तुर्की ओर जर्मन सेना को हटा पाना असंभव है, तो अंग्रेजो ने यह जिम्मेदारी जोधपुर की सेना को सौंपी । उस समय जोधपुर की सेना का नेतृत्व मेजर दलपत सिंह कर रहे थे । जब जोधपुर की सेना दुर्ग को घेरने आगे बढ़ी, तो जर्मन की सेना ने भयंकर गोलाबारी शुरू कर दी , एक बार तो जोधपुर की सेना को पीछे हटना पड़ा, लेकिन उसके बाद अलग अलग रास्तो से होकर जोधपुर की सेना दुर्ग तक पहुंच गई।

एक तरफ जहां जर्मन सैनिक अत्याधुनिक हथियारों से लेश थे, वहीं दूसरी ओर जोधपुर की सेना के पास खटारा बंदूकें थी, जिनका त्याग कर राजपूतो को ढाल, तलवार ,ओर भालो से युद्ध करना पड़ा ।

बड़ा घोर युद्ध हुआ। अंततः परिणाम वहीं हुआ --- " जहां राजपूत, वहां विजय ही विजय " ।

राजपूतो ने जर्मन ओर तुर्की दोनो देशों की सेनाओ को परास्त किया। 1350 जर्मन- तुर्की सैनिकों को बंदी बना लिया गया , इनमें से 35 तो बड़े अधिकारी थे , साथ ही जोधपुर की सेना ने जर्मन सैनिकों से 11 मशीनगन, असंख्य हथियार जब्त किए । भीषण लड़ाई में सीधी चढ़ाई के कारण मेजर दलपत सिंह युद्ध मे गंभीर रूप से घायल हो गए। इस युद्ध मे जोधपुर ने अपने 8 सैनिक ओर 60 घोड़े खो दिये।

इसी युद्ध में विजय प्राप्त करके राजपूताना के इन रणबांकुरो ने एक नये राष्ट्र इजराइल के उदय की नींव रखी थी।

भारत के वीर राजपूतो ने वह कर दिखाया था , जिस काम को करने का बता शायद दुनिया की किसी सेना में नही था । यह असंभव कार्य केवल राजपूत कर सकते थे ।

हाइफा मध्य एशिया मे जर्मनी का मजबूत दुर्ग था । इसे जीते बिना एशिया मे मित्र राष्ट्रो का विजयी होना असंभव था । इस दुर्ग के विजय अभियान मे मित्र राष्ट्रो के हजारो सैनिक मारे जा चुके थे । क्योंकि शत्रुओ का बंकर ऊंचे टीलो पर था और सैनिक नीचे से ऊपर चढ़ने मे मारे जाते थे । हाइफा लड़ाई मे मित्र राष्ट्रो के हजारो सैनिक मारे जा चुके थे । इन विपरीत परिस्थितियो मे भी जोधपुर के इन योद्धाओ ने हाइफा विजय कर पूरे विश्व मे अपने शौर्य का डंका बजा दिया ।

आज भी इजरायली पाठ्यक्रम में " हेफा " के युद्ध को पढ़ाया जाता है । वीर दलपत सिंह जी की प्रतिमा भी दिल्ली में बनी हुईं है।

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तस्वीर संकलन

1 - मेजर दलपत सिंह
2 - हैफा के युद्ध मे भाग लेती जोधपुर की सेना
3 - युद्ध जीतने के बाद शहर में प्रवेश करती जोधपुर की सेना
4 - दिल्ली में हैफा के वीरो की मूर्तियां - त्रिमूर्ति

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