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Jagdish Temple, Udaipur जगदीश मंदिर, उदयपुर


Jagdish Temple, Udaipur
जगदीश मंदिर, उदयपुर

इसका निर्माण महाराणा जगत सिंह ने सन् 1651 में करवाया था

जगदीश मंदिर उदयपुर का बड़ा ही सुन्दर,प्राचीन एवं विख्यात मंदिर है। आद्यात्मिक्ता के क्षेत्र में इसका अपना एक विशेष स्थान हैं,साथ ही मेवाड़ के इतिहास में भी इसका योगदान रहा है। यह मंदिर उदयपुर में रॉयल पैलेस के समीप ही स्थित है, यह मंदिर भारतीय-आर्य स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहण है, चूकिं यह मंदिर उदयपुर की शान है इसलिए उदयपुर के बारे में संक्षिप्त जानकारी-उदयपुर झीलों, पहाड़ों, महलों, ऐतिहासिक इमारतों एवं दर्शनीय स्थलों से सुशोभित एक सुन्दर शहर है । महाराणा उदयसिंह ने सन् 1553 में उदयपुर को अपनी राजधानी बनाया , जो की 1818 तक मेवाड़ की राजधानी रही।

इसका निर्माण महाराणा जगत सिंह ने सन् 1651 में करवाया था , उस समय उदयपुर मेवाड़ की राजधानी था। यह मंदिर लगभग 400 वर्ष पुराना है यह उदयपुर का सबसे बड़ा मंदिर है । मंदिर में प्रतिष्ठापित चार हाथ वाली विष्णु की छवि काले पत्थर से बनी है।

यह मंदिर जगत के पालनकर्ता भगवान विष्णु को समर्पित है। यह पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है । इसे जगन्नाथ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है । इसकी ऊंचाई 125 फीट है । यह मंदिर 50 कलात्मक खंभों पर टिका है । मंदिर में प्रवेश से पहले मैंने पाया कि यह मंदिर सिटी पेलेस से कुछ ही दुरी पर है यहाँ से सिटी पेलेस का बारा पोल सीधा देखा जा सकता है,एवं गणगौर घाट भी यहाँ से नज़दीक ही है । मंदिर में भगवान जगन्नाथ का श्रृंगार बेहद खूबसूरत था । शंख, घधा ,पद्म व चक्र धारी श्री जगन्नाथ जी के दर्शन कर मैं धन्य हुआ।

दर्शन कर मुझे सकारात्मक ऊर्जा की अनुभूति हुई। मंदिर की सभी व्यवस्थाएं मुझे बहुत अच्छी लगी मंदिर में मुख्य मूर्ति के अलावा गणेश जी, शिव जी ,माता पार्वती एवं सूर्य देव की मूर्ति भी है । मंदिर के द्वारपाल के रूप में सीढ़ियों के पास दो हाथियों की मूर्तियां तैनाद है। मंदिर में भ्रमण के दौरान मैं इसकी खूबसूरती व स्थापत्य कला पर मोहित हो गया । मैंने देखा की मंदिर के स्तम्भों पर जटिल नक्काशियां की हुई हैं, मंदिर की उत्कृष्ट शिल्पकारी व कलात्मकता सचमुच दर्शनीय है । यहाँ खंभों पर विभिन्न छोटी-छोटी शिल्प कलाकृतियाँ है जिन्हें देखकर लगता है मानो ये कोई कहानी कह रही हो । मंदिर के अंदर लगे शिलालेख हमें इतिहास के बारे में बहुत कुछ बताते हैं।

पुजारी जी से विशेष बातचीत –

मंदिर में भ्रमण के दौरान पुजारी जी से भेंट हुई एवं उनसे विशेष बातचीत करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, उन्होंने बताया कि भगवान जगन्नाथ की यह मूर्ति डूंगरपुर के पास कुनबा गाँव में एक पेड़ के नीचे खुदाई से प्राप्त हुई थी । तब से लेकर मंदिर की निर्माण कार्य के पूरे होने तक भगवान जगन्नाथ की मूर्ति को एक पत्थर पर रखकर उसकी पूजा-आराधना की गई थी। वो पत्थर आज भी मंदिर में मौजूद है। पुजारी जी ने कहा कि इसके सिर्फ स्पर्श मात्र से शरीर की सारी पीड़ाएँ एवं दर्द दूर हो जाते हैं।

पंडित जी से आगे पूछने पर उन्होंने बताया कि इस मंदिर में दिन में पाँच बार आरती का विधान है। जिसका आरंभ सुबह की मंगल आरती से होता है । मेरी जिज्ञासाओं को देखकर पुजारी जी ने आगे विस्तार से मंदिर के बारे में बताया कि भगवन जगन्नाथ की रथ यात्रा बेहद महत्वपूर्ण व दर्शनीय व रोमांचकारी होती है ।जिसमे भगवन पालकी में बिराजकर भक्तों के कंधों पर सवार हो कर पूरे शहर का भ्रमण करते हैं। और उन्होंने बताया कि होली के मौके पर यहाँ फागोत्सव मनाया जाता है, इसके अलावा सावन के पूरे महीने भगवन जगन्नाथ झूले पर सवार रहते हैं।

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