#PRATIHAR___RAJPUT_MANDORE_
#KANNAUJ_NAGAUD
#ओसियांनगरी #jodhpur #राजस्थान
🔰🔰जोधपुर से लोहावट आते जाते समय दो प्रतिहार/परिहार राजपूत राजाओं के जुड़े ऐतिहासिक महत्व के स्थानों में से होकर लगातार गुजरना होता है, एक मांडव्यपुर यानि मंडोर जो कि प्रतिहार क्षत्रिय राजपूत वंश की एक शाखा की राजधानी रही है, कनौज के लिए लडने वाले प्रतिहारों ने मंडोर विजय कर एक दुर्ग बनाया, यहीं पर प्रतिहारों की वंशावली का अभिलेख भी मिलता है कि राजा हरिश्चंद्र प्रतिहार ने इस वंश की स्थापना की थी, इनकी दो रानियों की जानकारी है एक ब्राह्मण थी, उसके वंशजों ने गुजरात मालवा में तथा दूसरी क्षत्रानी थी जिसके वंशज उतर भारत राजपूताने, दोआब में शासन किया हैं, इसी वंश के सम्राट नागभट्ट प्रतिहार ने मेडंतक या मेडता में राजधानी बनाई थी,
इसी वंश के सम्राट वत्सराज प्रतिहार उर्फ उपेन्द्र ने ओसिया में प्रतिहार शैली नागर शैली की स्थानीय महामारू शैली के सुन्दर मंदिर बनाये। उसकी एक जैन मंदिर में प्रशस्ति है जिसमें उसके विरूध्द का वर्णन है। भाषा संस्कृत है लिपि देवनागरी है, मंदिर भी नागरी शैली के है।
आठवीं से ग्यारहवीं सदी के धार्मिक विश्वास और आस्था की जानकारी लेनी है तो कहीं मत जाईये, कोई किताब पढने की जरूरत नहीं है, किसी शास्त्र को देखने की जरूरत नहीं है, गुप्त वंश के बाद के और प्रतिहारों के काल के धर्म की जीवंत व्याख्या करते और उस समय की जन आस्था की सरस कहानी बताते हैं, हजार सालों से अडिग खडे़ औसिया के ये प्रतिहार कालीन मंदिर।
प्रारंभ की सरल देवकुलिकाऐं है, एक छोटा सी चबूतरी है, उसी पर बिना बरामदा वाला एकल शिखर वाला छोटा देवलक अपनी सादगी की मिसाल है।
प्रतिहार राजपूतों के शुरूआती आस्था की दास्तान कहता है, गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं है शायद रही हो। उसके पास में पश्चिम मुखी थोड़ा ऊँचा शिखर युक्त देवालय है ।
लगता है अब प्रतिहार समृद्ध हो रहे थे, सम्पन्नता आंडम्बर लाती है, अब मंदिरों का आकार बढा हैं, वास्तु शिल्प और खुदाई में कलात्मकता, सूक्ष्मता और सुन्दरता बढती है यानि प्रतिहार राज्य में स्थायित्व और सुरक्षा दिखने लगती है जिसकी असय उनकी वास्तु शैली नागर में दिखता है,
अब चबूतरे बड़े है, गर्भगृह हैं, इसके चारों ओर प्रदक्षिणा पथ बना दिया था, भक्तों के दर्शन के लिए सभामंडप बना है, द्वार मंडप भी बनने लगे थे अब बहु शिखर मंदिर बनने लगे थे।
दीवारों की सादगी की जगह सुंदर खुदाई होने लगी क्योंकि कारीगरों को देने के पैसा था, खुदाई के लिए समय था,
राज में स्थायित्व था, कभी राम के महल के द्वारपाल यानि प्रतिहार अब हिन्दुस्तान के द्वारपाल बन चुके थे। यानि अरबों के आक्रमणकारियों के विरूद्ध ये भारत के रक्षक थे, दिशाओं के रक्षक थे , यानि दिकपाल थे, और अब भव्य महामारू शैली के मंदिर बनाकर धर्मपाल बनने की आकांक्षा रखते थे,
अब अरब और मध्य एशिया से व्यापार के कारण प्रतिहार धनी थे, उपजाऊ दोआब था, राजधानी कन्नौज को जीत चुके थे।
अरब यात्रियों ने सम्राट मिहिरभोज अल बोरा की ताकत और शक्तिशाली सेना का वर्णन किया है जिसके घोड़े हकरा यानि सरस्वती का पानी पीते थे। अब व्यापारिक समृद्धि थी ,तो जैन व्यापारियों ने भी मध्य एशिया से व्यापार करके समृद्ध हुए,
अब ओसिया बडा़ व्यापार केंद्र बनने लगा था। यहां शैव वैष्णव मंदिर बनने लगे, तो जैन व्यापारियों ने जैन धर्म के मंदिर बनाने को प्रश्रय दिया। वैष्णव और शैव आस्तिक प्रतिहारों ने भी जैनों की आस्था और विश्वास को प्रोत्साहित किया क्योंकि विना व्यापार के राज्य की समृद्धि नहीं, समृद्धि बिना व्यापारिक वर्ग के नहीं, व्यापारी तभी रहेगे जब उनकी धर्म और धन की सुरक्षा हो जो प्रतिहारों ने की।
ओसिया जो ओसवालों की उत्पत्ति का केन्द्र था जो पहले अकेश या उकेश या नवनेरी कहलाता था, अब शैव-वैष्णव समन्वय के प्रतिक के रूप हरिहर मंदिर बनने लगे,विष्णु और शिव के एक साथ। एक साथ दोनों की हरि यानि विष्णु और हर या महादेव। अर्द्धनारीश्वर रूप का भी अंकन है,
सूर्य है,
ब्रह्म है,
नवगृह हैं,
महिषासुरमरदिनी का मंदिर बना,पहले जो जैन मंदिर था, बाद हिन्दूओं ने भी सचिका या सचचियाय के रूप में पूजना शुरू कर दिया जो कि जैन हिन्दू धार्मिक समन्वय का प्रतीक बन गया था, इस कालांतर में परमार पंवार, देवल, ओसवाल, पारख जैन पूजने लगे।
अब मंदिर के चारों ओर चारों कोनों पर देवकुलिकाऐं बनने लगी। इसे पंचायतन मंदिर भी कहते हैं। इन मंदिरों में सुदर रमणक हैं,। प्रतिहारों के काल में ओसिया हिन्दू जैन संस्कृति का समन्वय केंद्र बन चुका था, कालांतर में प्रतिहार कमजोर हुए, राठौड़ो ने उनसे मंडोर छीन लिया, कन्नौज छिन गया,
भीनमाल छिन गया, रह गया तो प्रतिहारों का वैभव शाली इतिहास। मंडोर छीनने के बाद बालेसर शेरगढ में शेष रही गई
प्रतिहारों की इंदा शाखा,
अलवर सीकर की राघव शाखा,
भीनमाल एरिया की देवल शाखा,
कन्नौज के पार कलहंस शाखा
और उनकी आस्था और धार्मिक विश्वास की कहानी सुनाते ओसिया के मंदिर।।
अगर कान लगाकर सुनोगे तो बहुत कुछ सुना देगे,ये ओसियां के उपेक्षित मंदिर, सुना देगें प्रतिहारों के श्री राम के राजमहल के द्वारपाल से हिन्द के द्वारपाल बनने की कहानी, नहीं सुनोगे तो भी दिखा देगें अपनी दुर्दशा की कहानी, चलो अब बहुत हो गया ।।
Source - नरपतसिंह भाटी ,हरसाणी, खंड विकास अधिकारी, लोहावट
https://www.rajputland.in/
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