Rohtasgarh Fort, Rohtas bihar
रोहतासगढ़ किला, रोहतास बिहार
रोहतासगढ़ किला, रोहतास बिहार
#अयोध्या के सूर्यवंशी राजा त्रिशंकु के पौत्र व राजा सत्य हरिश्चंद्र के पुत्र रोहिताश्व ने कराया था। रोहतासगढ़ शहर की स्थापना रोहिताश्व ने की थी जो महान राजा हरिश्चन्द्र का बेटा था। रोहतासगढ़ किला भारत के कई प्राचीन किलों में से के है।
बहुत दिनोंं तक यह किला राजपुत राजाओं के अधिकार में रहा था,
बहुत दिनोंं तक यह किला राजपुत राजाओं के अधिकार में रहा था,
आज मैं आपको
बता रहा हूं ।
बिहार के रोहतास गढ़ के किले के बारे में।
बता रहा हूं ।
बिहार के रोहतास गढ़ के किले के बारे में।
रोहतासगढ़ किला कैमूर श्रेणी पर, देहरी के दक्षिण में लगभग 40 किमी दूर स्थित है और यह समुद्र तल से 1500 मीटर ऊँचा है।
कहा जाता है कि सोन नदी के बहाव वाली दिशा में पहाड़ी पर स्थित इस प्राचीन और मजबूत किले का निर्माण त्रेता युग में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा त्रिशंकु के पौत्र व राजा सत्य हरिश्चंद्र के पुत्र रोहिताश्व ने कराया था। रोहतासगढ़ शहर की स्थापना रोहिताश्व ने की थी जो महान राजा हरिश्चन्द्र का बेटा था। रोहतासगढ़ किला भारत के कई प्राचीन किलों में से के है।
बहुत दिनोंं तक यह किला राजपुत राजाओं के अधिकार में रहा था, लेकिन 16वीं सदी में मुसलमानों के अधिकार में चला गया और अनेक वर्षों तक उनके अधीन रहा। इतिहासकारों की मानें तो किले की चारदीवारी का निर्माण शेरशाह ने सुरक्षा के दृष्टिकोण से कराया था, ताकि कोई किले पर हमला न कर सके। बताया जाता है कि स्वतंत्रता संग्राम की पहली लड़ाई (1857) के समय अमर सिंह ने यही से अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का संचालन किया था।
कहा जाता है कि सोन नदी के बहाव वाली दिशा में पहाड़ी पर स्थित इस प्राचीन और मजबूत किले का निर्माण त्रेता युग में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा त्रिशंकु के पौत्र व राजा सत्य हरिश्चंद्र के पुत्र रोहिताश्व ने कराया था। रोहतासगढ़ शहर की स्थापना रोहिताश्व ने की थी जो महान राजा हरिश्चन्द्र का बेटा था। रोहतासगढ़ किला भारत के कई प्राचीन किलों में से के है।
बहुत दिनोंं तक यह किला राजपुत राजाओं के अधिकार में रहा था, लेकिन 16वीं सदी में मुसलमानों के अधिकार में चला गया और अनेक वर्षों तक उनके अधीन रहा। इतिहासकारों की मानें तो किले की चारदीवारी का निर्माण शेरशाह ने सुरक्षा के दृष्टिकोण से कराया था, ताकि कोई किले पर हमला न कर सके। बताया जाता है कि स्वतंत्रता संग्राम की पहली लड़ाई (1857) के समय अमर सिंह ने यही से अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का संचालन किया था।
ऐतिहासिक रूप से बिहार का रोहतास जिला पूर्व मौर्य काल में छठवीं शताब्दी ईसा पूर्व से पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व तक मगध साम्राज्य का हिस्सा था। यहाँ सम्राट अशोक का छोटा सा शिलालेख है जो यह बताता है कि इस स्थान पर मौर्यों का शासन था। 1857 के युद्ध के समय रोहतास में बड़ी हलचल हुई थी। जब भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई तब रोहतास शाहबाद जिले का एक हिस्सा था, परन्तु वर्ष 1972 में इसे स्वतंत्र जिला घोषित कर दिया गया।
रोहतास गढ़ का किला काफी भव्य है। किले का घेरा 28 मील तक फैला हुआ है। इसमें कुल 83 दरवाजे हैं, जिनमें मुख्य चारा घोड़ाघाट, राजघाट, कठौतिया घाट व मेढ़ा घाट है। प्रवेश द्वार पर निर्मित हाथी, दरवाजों के बुर्ज, दीवारों पर पेंटिंग अद्भुत है। रंगमहल, शीश महल, पंचमहल, खूंटा महल, आइना महल, रानी का झरोखा, मानसिंह की कचहरी आज भी मौजूद हैं। परिसर में अनेक इमारतें हैं जिनकी भव्यता देखी जा सकती है। यह पर्यटन स्थल साहस, शक्ति और सोन घाटी की सर्वोच्चता के प्रतीक के रूप में खड़ा है। रोहतासगढ़ किले में कई ऐसे स्थान हैं जो पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, जैसे कि- गणेश मंदिर, हाथी दरवाज़ा, हैंगिंग हाउस हाथिया पोल, आईना महल, हब्श खान का मकबरा, जामी मस्जिद, दीवान-ए-खास, दीवान-ए-आम, रोह्तासन मंदिर और देवी मंदिर।
दो हजार फीट की उंचाई पर स्थित इस किले के बारे में कहा जाता है कि कभी इस किले की दीवारों से खून टपकता था। फ्रांसीसी इतिहासकार बुकानन ने लगभग दो सौ साल पहले रोहतास की यात्रा की थी, तब उन्होंने पत्थर से निकलने वाले खून की चर्चा एक दस्तावेज में की थी। उन्होंने कहा था कि इस किले की दीवारों से खून निकलता है। वहीं, आस-पास रहने वाले लोग भी इसे सच मानते हैं। वे तो ये भी कहते हैं कि बहुत पहले रात में इस किले से आवाज भी आती थी। लोगों का मानना है कि वो संभवत: राजा रोहिताश्व के आत्मा की आवाज थी। इस आवाज को सुनकर हर कोई डर जाता था। हालांकि, किले से आने वाली आवाज और दीवारों से खून निकलने की बात अंधविश्वास है या सच- ये रहस्य तो इतिहास के गर्त में ही छिपा है।

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