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Timangarh Fort तिमणगढ़ किला #Dynasty_Yaduvanshi_Rajput_Warrior_Clan_Ruler

Timangarh Fort
तिमणगढ़ किला

#Dynasty_Yaduvanshi_Rajput_Warrior_Clan_Ruler

Timangarh Fort : इस किले का राजा पारस पत्थर से लोहे को बदलता था सोने में : राजस्थान में एक ऐसा किला है जिसके बारे में इतिहासकार लिखते है कि इस किले के राजा के पास पारस पत्थर था, जिसकी मदद से वह लोहे को स्वर्ण में बदल लिया करता था| यही कारण था कि यह राजा अपनी प्रजा से कर के रूप में नकद रुपया ना लेकर लोहा लिया करता था और उसे स्वर्ण में बदल लेता था| स्वर्ण को सुरक्षित रखने के लिए किले के गर्भ में अनेकों तलघर बने है, जहाँ स्वर्ण रूपी खजाना रखा जाता था| रियासत के अंतिम चरण में इस किले में खुदाई की गई थी, पर खुदाई में क्या मिला ? इस तथ्य पर आज भी प्रश्नचिन्ह है| हाँ खुदाई में पत्थर के गोल चाक निकले वे आज भी वहीं रखें है|

जी हाँ ! हम बात कर रहे है करौली मुख्यालय से 42 किलोमीटर दूर माँसलपुर तहसील के भोजपुर गांव के पूर्व में सागर की पार पर बने तिमनगढ़ किले की| इस किले को श्रीकृष्ण के वंशज यदुवंशी राजा तिमनपाल ने बनवाया था| सन 1048 में बना यह किला समुद्रतल से 1309 फिट की उंचाई पर बना है| इस किले में सोने के खजाने का इतिहास खंगालने वाले “करौली राज्य का इतिहास” पुस्तक के लेखक दामोदर लाल गर्ग को एक ताम्रपत्र मिला था, जिसमें कुल 15 लाइनें लिखी है, जिसमें महाराजा हरिपाल के शासन में बाला किले के अन्दर खजाना गाड़ने की बात लिखी हुई है|

किले में 80 से ज्यादा प्राचीरें है| मुख्यद्वार को जगनपोल के नाम से जाना जाता है| धन व मूर्तियाँ निकालने के लिए असामाजिक तत्वों द्वारा खंडहर बना दिए इस किले में ननद-भौजाई के जुड़वां कुँए, राजगिरि बाजार, फर्शबंदी की सड़क, तेल कुआँ-चाक, आमखास प्रासाद, मंदिर, घुड़साल व किलेदारों के रहने के आवास बने है| शिल्प का इस किले में भंडार था, जो इस किले को खँडहर में तब्दील होने का कारण बना|

अपने समय इस क्षेत्र का सत्ता का महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा यह किला भी मोहम्मद गौरी की नजर से नहीं बच सका और सन 1196 में गौरी ने इस किले पर अधिकार कर लिया| मुस्लिम इतिहासकार हसन निजामी ने लिखा है- “अब तक संसार के किसी शासक ने इसे नहीं जीता, जिसे हमारे बादशाह ने चारों ओर से घेर लिया| किले का राजा कुंवरपाल जिसे अपनी सेना पर गर्व व दुर्ग की दृढ़ता पर पूर्ण विश्वास था, ने शत्रु की सेना की संख्या देखते हुए आत्मसमर्पण पर मजबूर हुआ और किले पर मुसलमानों का अधिकार हो गया, हालाँकि बाद में उसके वंशजों ने कुछ वर्ष बाद किले पर दुबारा कब्ज़ा कर लिया|

The Fort is said to have been built circa 1100 AD, with some destruction thereafter. Its reconstruction is said to have been undertaken in 1244 AD by Yaduvanshi Rajput Raja Timanpal, the scion of Vijay Pal, the Raja of Bayana. The name "Timangarh" is assumed to be in recognition of Raja Timanpal's contribution. A stone engraving at the entrance of the Fort also mentions this as this year, but some historians believe that this engraving was placed at the time of the reconstruction of the Fort, going by the fact that some idols unearthed are more than a thousand year old. The Fort is originally believed to have had five entrances or dwaars (pols in the local dialect), but some more gates were apparently added later by the Moguls. The latter additions are apparent from the way some carved blocks from deep inside the fort have been used in the construction of the gate at the main entrance to the Fort, along with plain-faced stone blocks of somewhat different colours and variety. The Fort is thus believed to have been under occupation of Mohammad Gouri's forces from 1196 to 1244 AD.
Little is known about when the fort was abandoned, but villagers believe that its residents deserted this complex almost 300 years back. The Fort is supposed to carry the curse of a Natni (a trapeze artiste), and there is a Natni ka khamba (Natni’s pillar) located in the neighbouring plains area, about three km from the Fort. It is said that the then King challenged the Natni to walk over a rope stretching some two km near the entrance, and had promised her half his kingdom in return. She completed the course from one side to the other, but on her return journey, the Ranis panicked and ordered the rope be cut. The Natni fell and died, but placed a curse on the king that his majestic Fort would one day be in ruins. That curse has now come true.

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