#देवरा_का_युद्ध_1_सितम्बर_1608
जिस स्वतंत्रता की रक्षार्थ महाराणा प्रताप का संपूर्ण जीवन आहूत हो गया और जिसके लिए अनेकों राजपूत योद्घाओं ने अपना बलिदान दिया, आज उसी स्वाधीनता का हरण करने के लिए मुगल सेना पुन: चित्तौड़ की ओर आ रही थी। जिसका समाचार पाते ही पूरे मेवाड़ में मानो आग लग गयी। देशभक्ति का ज्वर चढ़ गया और हर व्यक्ति एक स्वाभिमानी स्वतंत्रता प्रेमी सैनिक और योद्घा के रूप में अपने महाराणा के साथ आ खड़ा हुआ। देशभक्ति का उफान देखने योग्य था। चारों ओर शत्रु सेना का सामना कर उसे मार भगाने के लिए वीरोचित वातावरण बन रहा था। हिंदू वीरों ने समझ लिया कि आज पुन: उनकी वीरता की परीक्षा की घड़ी आ चुकी है। जिस स्वतंत्रता की रक्षार्थ उन लोगों ने बड़े-बड़े बलिदान दिये थे, उसके विषय में वास्तविकता भी यही थी कि यदि आज तनिक सा भी प्रमाद प्रदर्शित किया गया तो पूर्वजों का सारा पुरूषार्थ और उनके सारे बलिदान व्यर्थ हो जाने थे। इसलिए परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के लिए बड़ी तैयारी की जानी आवश्यक थी।
देवरा नामक स्थान पर मुगल सेना और महाराणा अमरसिंह की सेना का सामना हुआ। अब्दुर्रहीम खानखाना का भाई मुगल सेना का सेनापति था। दोनों ओर से भीषण संग्राम आरंभ हो गया। राजपूत अपनी परंपरागत वीरोचित शैली में युद्घ करने लगे। भयंकर संग्राम में हताहतों की संख्या निरंतर बढ़ती ही जाती थी। हिंदू वीरों ने अनेकों मुगलों का वध कर दिया। मुगलों ने अमरसिंह और उसके वीर सैनिकों की वीरता का लोहा माना। उन्हें यह भली भांति ज्ञात हो गया कि महाराणा प्रताप आज चाहे ना हों, पर उनकी परंपरा अभी तक जीवित है। सलुम्बरा के देशभक्त सरदार का महाराणा अमरसिंह को उसके सिंहासन से हाथ पकडक़र खींचना काम कर गया।
राजपूतों ने अपने शौर्य से मुगल सेना को इतना भयभीत कर दिया कि वह युद्घ क्षेत्र से पीछे हटने लगी और अंत में मैदान छोडक़र भाग खड़ी हुई। सायंकाल से पूर्व ही युद्घ का निर्णय हो गया। राजपुतो ने महाराणा प्रताप के समय शुरू हुई विजय श्रृंखला कायम रखी ।
देवरा विजय कि हार्दिक शुभकामनाए🙏🙏
जय राजपुताना🙏🙏
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