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जोधाबाई ऐतिहासिक सच


#जोधाबाई_ऐतिहासिक_सच”
#ज़रूर_पढे
हम आधुनिक भारतीयो की सोच में हमेशा से भारत की चीजो,व्यक्तियों, या लेखको को कमतर मानने की प्राथमिकता रही है और ईसी मानसिकता का फायदा शुरू से ही बाहरी लोगो ने उठाया है,और उठा रहे है फिर वो बात चाहे जीवन पद्दति की हो या इतिहास लेखन की या तथ्यात्मक हो, हम बाहरी लोगो के द्वारा थोपी गयी बात या झूठ को आसानी से स्वीकार कर लेते है हम इन्ही घटनाओं, तथ्यात्मक का विश्लेष्ण कर रहे है।
इसी कड़ी में प्रस्तुत है “जोधाबाई” ऐतिहासिक सच या ऐतिहासिक झूठ ? सर्वप्रथम उन किताबो की और देखते है जो की मुगलों या आक्रान्तावो द्वारा लिखित है ।
सबसे पहले बात करते है उस किताब की, जिसे लोग अकबर की आत्मकथा के नाम से जानते वो बात अलग है की जो खुद अनपढ़ हो और खुद की आत्मकथा लिखता, है ये भी विचारणीय प्रश्न है? खेर वो किताब है अकबर नामा(Akbar nama) और इसमें कही भी जोधा शब्द का भी जिक्र नहीं है, तो सवाल उठता की कोई अपनी तथाकथित आत्म कथा में अपनी बेगम का नाम नहीं लिखे क्या ये संभव है ??
अब बात करते है अकबर के बेटे जहागीर की,चूँकि पिताजी ने आत्मकथा लिखी थी तो पुत्र कहा पीछे रहने वाला था, उहोंने भी अपनी आत्म कथा लिखी जिसे तुजुक-ए-जहांगिरी /Tuzuk-E-Jahang
iri नाम दिया गया, इस किताब में भी उसकी माँ, नाम जोधा या जोधा बाई कही भी नहीं लिखा पाया गया। यहा भी एक सवाल उठता है कोई अपनी माँ का नाम केसे भूल सकता है?? इसमें उसकी माँ का नाम {मरियम- उल-जमानी}( Mariam ul-Zamani ) लिखा हुया है,यानि की पति और पुत्र दोनों की आत्मकथा में जोधा का कोई जिक्र नहीं है अब आगे देखते अन्य किताबे क्या कहती है ?
ईरान के मलिक नेशनल संग्रहालय व लाइब्रेरी में बहुत सी पुरानी किताबे है, इसमें भारतीय मुगलों का विवाह पर्सियन दासी से करवाए जाने का जिक्र मिलता है तो ये पर्सियन दासी कोन थी ??हुमायूँ के साथ पर्शिया से मीनाकारी व् कलात्मक वस्तुये बनाने वाले कारीगर परिवार भी आये थे या लाये गये थे उन्ही मेसे कुछ परिवार जोधपुर राजपरिवार व् जयपुर राजघराने की शरण में चले गये पर्शियन लड़कियाँ को राजकुमारियो को कलात्मकता सिखाने व सेवा कार्य हेतु रखा जाने लगा और और पर्सियन दासिया भारतीय राज परम्परा में ढलती गयी यहा तक की कुछ ने अपना आराध्य तो गोविन्द देवजी को मान लिया था।
जब हुमायु, चोसा के युद्ध से जान बचाकर भागा और अपनी गर्भवती पत्नी के साथ मारा मारा फिर रहा था तब उमरकोट (वर्तमान पाकिस्थान के सिंध ) के राणा वीरसाल ने उसे शरण दी और वही पर अकबर का जन्म और बाल्यकाल की परिवरिश हुई और जब अकबर बादशाह बना तो उसको बचपन में देखि हुयी बातो को अमल में लाने का प्रयास किया वो जानता था की अगर भारत पर राज करना है तो राजपूतो से निपटना आसान नहीं होगा और इसने तलवार के बल पर नहीं जीता जा सकताहै, इनको तो प्रेम से ही जीता जा सकता है, ये बात बचपन में उसने अच्छे से सीखी थी और कुछ युध्दों में उसके अनुभव भी की, इसलिए उसने कूटनीति से काम लेना शुरू किया।
इसी दोरान आमेर राजघराने में लगभग गृहयुद्ध की सी स्थिति चल रही थी आसकरण को गद्दी से उतारकर भारमल को राजा बना दिया और आसकरण हाजी खा पठान की सहायता माग कर वापस आमेर प्रयास किया किन्तु भारमल बहुत ही उच्च स्तर का कूटनीतिज्ञ भी था उसने बातचीत कर आसकरण को नरवर का राज मान लिया और राजा भारमल आमेर का उत्तराधिकारी बना।
अभी कुछ समय बीता और राजकुमार सुजा जो की भारमल के बड़े भाई राजा पूरणमल का पुत्र था उसने मेवात के शासक सेफुउर्दीन हुसेन जो की दिल्ली के अधीन था की शह पाकर राज्य के अन्दर विद्रोह कर दिया क्योकि राजकुमार सुजा स्वम् को आमेर का वास्तविक शासक मानता था( भारमल ने युवराज पद अपने पुत्र भगवान दास को दे दियाऔर युवराज ही भावी राजा होता है ) भारमल ने मजबूरी में हुसेन से समझोता किया व् कुछ निशिचतराशि खिराज के रूप देना स्वीकार किया और अपने पुराने मित्र चगताई खान की मदद मागी तो अकबर इसी मोके की तलाश में ही था,उसने भारमल राजा सागानेर में मुलाक़ात की भारमल का अकबर से संधि करने का एक मात्र प्रमुख कारण ये ही था जब सामने घर का सदस्य(सुजा) ही हो तो हमारी हर कमजोर कड़ी जानता है और यही सोच कर भारमल ने संधि के प्रस्ताव पर विचार किया वरना उस वक्त तक कोई भी कछवाह वंश की कोई भी खाप इतनी मजबूत नहीं थी की वो आमेर को चुनोती दे सके, हा छोटे मोटी झडपे किसी भी रियासत में आम बात होती है।
उस जमाने में और आज भी कई जगह दूसरी जाति धर्म की लडकियों का कन्यादान धार्मिक रीति के अनुसार किया जाता है और उसे धर्मपुत्री का स्थान मिलता है इसे उच्चतम स्तर का धार्मिक कर्म माना जाता है। अगर राजस्थान के राजपूत परिवारों के सांस्क्रतिक विरासत का गहनता से अध्ययन करे तो हमे ज्ञात होगा की किसी भी गाव या जागीर में होने वाली लगभग हर शादी में कुछ कन्यादान राशि या वस्तु ठिकाने या जागीरदार परिवार की और से दी जाती है, और इतिहास की किताबो में इस बात के अनेको उदाहरण है,जिसमें राजा,ठाकुर द्वारा अन्यकुल की लडकी का कन्या दान किया गया और उसको धर्म पुत्र्री का स्थानं दिया।
भारमल ने भी हरखू का कन्यादान अकबर के साथ करके न केवल अपनी धार्मिक परम्परा को आगे बड़ाया बल्कि कूटनीति से एक दासी को बेगम का दर्जा दिलवाया पर भारतीय परम्परा को ना समझने वाले या जानबूझकर कलंकित करने वाले इस बात का बिना किसी आधार के दुष्प्रचार किया और इसी रीती का पालन जोधपुर नेरश मोटा राजा उदय सिंह ने भी जहागीर से अपनी दासी पुत्री का कन्यादान करके किया, जिसे इतिहास में जगत गुसाई के नाम से जानते है चुकी जगत गुसाई जोधपुर से थी इसलिए कुछ इतिहासकारों जोधा के नाम से लिखा है।
अब ये बात आती है की हरखू राजकुमारी नहीं थी दासी ही थी तो हम कुछ समकालीन किताबो और लेखो पर नजर डाले तो ये बात सिद्ध हो जाती है।
1 भारत भ्रमण के लिए 17 सदी में पारसी लेखक आया और उसने अपनी पुस्तक पारसीतीस्ता में साफ़ साफ़ लिखा है की ये भारतीय राजा को हमारा देव अहुर मझदा स्वर्ग प्रदान करे क्यों की इसने एक पारसी दासी को शाही बेगम बनाया है।
2 अगर हम अकबर-ए-महुरियत के कथन पर गौर करे तो साफ़ साफ़ नजर आता है की वो दासी ही थी न की राजकुमारी यहा लिखा है ﻭﺕ ﺷﮩﺰﺍﺩﯼ ﯾﺎ ﺍﮐﺒﺮ ﮐﮯ ﺑﺎﺭﮮ ﻣﯿﮟ ﺷﮏ ﻣﯿﮟ ﮨﯿﮟ “हमें इस हिन्दू निकाह पर संदेह है क्यौकी निकाह के वक्त राजपरिवार के गमी का माहोल नहीं था और ना ही गोद भराई की रस्म अदा की गयी ।
3 अरब की किताबो में कई जगह इस बात का जिक्र है की parsi ( “ ﻭﻧﺤﻦ ﻓﻲ ﺷﻚ ﺣﻮﻝ ﺃﻛﺒﺮ ﺃﻭ ﺟﻌﻞ ﺍﻟﺰﻭﺍﺝ ﺭﺍﺟﺒﻮﺗﺎﻷﻣﻴﺮﺓ ﻓﻲ ﻫﻨﺪﻭﺳﺘﺎﻥ ﺁﺭﻳﺎﺱ ﻛﺬﺑﺔ ﻟﻤﺠﻠﺲ ”) हम यकीन नहीं करते हमे इस निकाह पर हमें संदेह है।
4 सिक्खो के धर्म गुरूओ ने भी इस धार्मिक रस्म की प्रशंसात्मक रूप से पत्राचार किया और लिखा की क्षत्रियो ने अब तलवार और बुध्दि दोनो को काम में लेना शुरू कर दिया है।
5 अब बात करते है हमारी राजस्थानी/हिन्दी भाषा में पट्टे-परवानें, बहियां, खरीते, खतत्, अर्जियां, हकीकत, याददाश्त, रोजनामचे, गांवों के नक्शे, हाले-हवाले, चिट्ठिया, पानडीख्यातो और बहीयो आदि में ये गध्यावली कई जगह लिखी मिलती ह। “गढ़ आमेर आयी तुरकान फौज ,ले ग्याली पसवान कुमारी ,राण राज्या राजपूता लेली इतिहासा पहली बारले बिन लड़िया जीत”।मतलब आमेर किले में मुगल फौज आती है और एक दासी की पुत्री को ब्याह कर ले जाती है, हे रण के लिये पैदा हुए राजपूतों तुमने इतिहास में पहली बार बिना लड़े पहली जीत हासिल कर ली ।
ये तो बात हुई मध्य भारतीय इतिहासकारो की लेखनी की, आधुनिक इतिहासकारो की क्या राय है देखते है, “इन्डियन काउंसिल आफ हिस्टोरिकल रिसर्च” के पूर्व चेयरमेन प्रोफेसर इरफ़ान हबीब साफ़ साफ़ इस बात का खंडन करते है की जोधा नाम की भी कोई पत्नी अकबर की थी और इसी तरह की राय “अलीगढ विश्वविद्यालय” के इतिहास के पूर्व प्रमुख प्रोफेसर आलम भी बात को जोर देकर कहते है इतिहास में जोधा का नाम कही नहीं है और ये मुगले-आजम या उस जेसी फिल्मो या गपशप मेगजिनो को इतिहास के संधर्भ में नहीं देखा जा सकता है।
इसके अलावा कई लेखको जिसमे से प्रमुख रूप इतिहासविज्ञजदुनाथ सरकार जिन्होंने वर्षो तक शोध करके“ऐ हिस्ट्री ऑफ़ जयपुर” लिखी उसमे व् अन्य जेसे डॉ मथुरालाल शर्मा द्वारा लिखित “हिस्ट्री ऑफ़ जयपुर स्टेट ” में भी कही इस बात का जिक्र नहीं। ईसी तरह आप देखे वो चाहे श्याम सिंह रत्नावत द्वारा लिखित “कछवाहो की वंशावली” की हो या डॉ हुकम सिंह भाटी “कछवाहो की ख्यात” , माया बंसल की आलोचनात्मक शोधपूर्ण पुस्तक “जय वंश महाकाव्य का तुलानात्मक अध्यन”, “कुर्म विलास” के संपादक जे के जैन, “जयनगर पंचरंग्म” जो की हरी वंश आचार्य द्वारा लिखित व् “मानवंश महाकाव्य” जो सूर्य नारायण जी,“प्रथ्वीराजमहाकाव्य” गोकुल नाथ या हस्थलिखित पांडुलिपिय ग्रन्थ रामकीर्ती प्रकाश हो या कछवाहो की ख्यात हो आदि को देखे कही भी इस बात का जिक्र तक नहीं मिलता है की राजपूत राजाओं ने अपनी बेटिया मुगलों को दी हां कुछ पुस्तको में इसबात का जिक्र जरुर है की अन्य कुल या दासियों का कन्यादान राजपूत राजावो ने किया है जिनमे से प्रमुख है डॉ महिन्द्र भानावत द्वारा लिखित “मीरा निर्भय” व् “राजपूत रासो” जो की डॉ महावीर प्रसाद शर्मा है द्वारा लिखित व् श्री त्रिलोक सिंह धाकरे द्वारा लिखित “राजपूतो की वंशावली इतिहास की महागाथा” आदि उपरोक्त सभी तथ्यों से ये बात स्वत सिद्ध होती है की किसी भी राजकुमारी की शादी मुगल के साथ नहीं हुयी।
राजस्थान के जाने माने इतिहासविज्ञ प्रो. राजेंद्र सिंह खंगारोत इस संबंध में बताया की इस गलत फहमी की शुरुवात कर्नल जेम्स टॉड की पुस्तक “एनल्स एंड एंटीकिव्टीज ऑफ़ राजस्थान” से हुयी,इस पुस्तक में उन्होंने लिखा- “जोधाबाई के अकबर विवाह के कारण शाही परिवार का संबंध जोधपुर से स्थापित हुआ|” (भाग 2,पृष्ठ स.965) यहाँ टॉड ने उल्लेख किया है कि-“ये जोधाबाई जोधपुर की जोधाबाई है न कि आमेर की|” हालाकि इसी पुस्तक में संपादक विलियमकुक महोदय ने फुटनोट में “आईने ए अकबरी” (पृष्ठ 919)का सन्दर्भ देते हुए टॉड के मत को स्पष्ट किया है| कुक महोदय लिखते है- “जोधाबाई के बारे में कुछ संदेह हो सकता है परन्तु यह स्पष्ट है कि वह जहाँगीर की पत्नी थी, अकबर की नहीं|” (पृष्ठ 965) तो जिन लोगो ने सरसरी तोर पर पढ़ा उनको यही समझ में आया और इतिहास को निजी लाभ व् आक्र्न्तावो को महान बनाने के लिए बुरी तरह तोडा मरोड़ा गया है और हमारे पूर्वजो कोनीचा दिखने का दुस्प्र्यास है।
अंत में सबसे महत्वपूर्ण सबूत जब लेखक(भवर सिंह रेटा,जय राजपुतानासंघ स.सदस्य) ने एकता कपूर के धारावाहिक को IBF के माध्यम से इस धारावाहिक की एतिहासिकता पर सवाल उठाया तो उनकी कानूनी व् कहानीकार इतिहासकार टीम लाचार व् नाजवाब नजर आई बाद में उन्होंने पत्र के माध्यम से ये लिखा की सीरियल,मूल आधार मुगले-आजम फिल्म व किसी पेपर की न्यूज़ आदि को आधार बनाया है और इस पर कोई भी ऐतिहासिकता सबूत लेखक को नहीं दे सके, उप्र्रोक्त सबूत साफ साफ कह रहे है की किस तरह हमारे उज्ज्वल पवित्र इतिहास को गंदा किया जा रहाहै। उपरोक्त तथ्यों से ये बात साफ़ हो जाती है की अकबर के कोई जोधाबाई नाम की पत्नी नहीं थी ये केवल फिल्मकारों द्वारा फेलाया हुआ झूठ है ।

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#ҡรɦαƭ૨เყα_૨αʝρµƭ

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