चौहान साम्राज्य में शाशन व्यवस्था की बात अगर हम कर ही रहे है, तो विशेष शब्दो के साथ मे इस बात को रखना चाहता हूं --
चौहान साम्राज्य में शाशन व्यवस्था की बात अगर हम कर ही रहे है, तो विशेष शब्दो के साथ मे इस बात को रखना चाहता हूं --
" चौहान राजा विग्रहराज चतुर्थ ने प्रतिज्ञा की थी की वह भारत को अखण्ड आर्यवर्त में परिवर्तित कर देगा, मेरे रहते एक भी ब्राह्मण किसी म्लेच्छ के अत्याचार का शिकार नही हो सकता , मेरे रहते आर्यवत में एक भी मंदिर को खंडित नही किया जा सकता, अगर ऐसा होता है, तो में उसी समय सिंहासन का त्याग कर अग्निसमाधि ले लूँगा "
चौहान राजा विग्रहराज ने अपना यह वचन पूरा भी किया -- इसी कारण विग्रहराज चतुर्थ को " भगवान विष्णु का अवतार कहा जाता है । ( शिवालिक स्तम्भ ) इसी तरह पृथ्वीराज द्वितीय ने भी भीषण प्रतिज्ञा की थी, उन्हें श्री राम का अवतार कहा गया है । ( हांसी शिलालेख )
विभिन्न साक्ष्यों से पता चलता है कि जिस प्रकार दैवी देवताओ की पूजा की जाती थी, राजा भी अपनी प्रजा में उसी प्रकार पूजनीय होता था। वह दैवीय शक्ति का प्रतीक माना जाता था । राजाओ को ईश्वर मानने का तातपर्य यह नही था कि राजा निरंकुश होकर अपनी पुजा करवाते थे, बल्कि राजाओ के कर्म भगवान विष्णु, या भगवान श्री राम की तरह होते थे, इसी कारण साधारण जनता उन्हें भगवान का अवतार मानकर पूजती ।। राजाओ की तुलना देवत्व से की गई है, ओर अगर राजा निरंकुश होता तो उन्हें नरक का भागी बताया गया है । यह हमारे मनुस्मृति का शाशन था ।
चौहानों के समय मे " राजा " पूर्ण रूप से स्वतंत्र नही थे, राजा पर पूरे मंत्रिमंडल का नियंत्रण होता था, राजा कोई भी निर्णय अपने परामर्शकर्ताओं , मंत्रियों के परामर्श के बिना नही करता था, " ललित विग्रहराज " नाटक से हमे ज्ञात होता है कि विग्रहराज ने हमीर पर आक्रमण करने से पूर्व अपने मंत्री श्रीधर से परामर्श लिया था ।। यतार्थ में राजा को व्यवस्थापिका संबंधी अधिकार बहुत कम हुआ करते थे, शुक के अनुसार राजा को राज्यरूपी पेड़ की जड़ माना जाता था, चौहानों के समय मे शासन - पुराणों, स्मृतियों उनपर लिखे गए भाष्यों, नीतिशास्त्रों ओर लोकपरम्परा पर आधारित थी।।
" वर्णव्यवस्था " के आधार पर " विश्वरूप " तथा " मेघातिथि " में मात्र क्षत्रियो को ही राजसत्ता का अधिकारी बताया गया है, मेघातिथि की अनुसार अगर किसी राज्य में क्षत्रिय राजा का अभाव हो, तो वह राज्य जल्द ही समाप्त हो जाता है । विष्णु धर्मोत्तर पुराण में भी कहा गया है, क्षत्रिय राजा के बिना प्रजा अव्यवस्था के कारण नष्ठ हो जाती है ।
शुक के अनुसार अपने पूर्वजन्मों के तप के कारण ही व्यक्ति राजा बनकर जन्म लेता है, राजा के हाथ मे सारी शक्ति होने के बाद भी राज्य के धन का बहुत कम हिस्सा राजा के अधिकार में होता था । चौहानों ने भी इस परंपरा को ही चलने दिया, राजा मितव्ययी नही होता था, तथा घन् को एकत्र करने वाला, तथा उसका सदुपयोग करने वाला होता था । राज्य की होने वाली आय का सीमित अंश ही वह अपने ऊपर खर्च कर सकता था ।।
चौहान शाशन में राजा सर्वोपरि होता था, उन्हें हर अपराधी को दंडित करने का अधिकार प्राप्त था, राजा के बाद उनका ज्येष्ठ पुत्र राज्य का अधिकारी होता था, ओर अगर राजा निसंतान होता, तो राजा का भाई उत्तराधिकारी बनता ।। यदि कोई राजा जनता की दृष्टि से गिर जाता, तो उसका फिर शासन कर पाना असंभव था, इसका साक्ष्य अर्णोराज चौहान की हत्या उनके पुत्र जगदेव ने कर दी थी, लेकिन जनता ने जगदेव के इस घृणित कर्म कर कारण उसे राजा स्वीकार नही किया, ओर गद्दी से उतार फेंका ।।
इतिहास् कहता है, चौहान चक्रवर्ती थे --- चौहान राजा भट्टारक , परमेश्वर , महाराजधिराज तथा भारतेश्वर की उपाधियां धारण करते थे ।।
प्रसिद्ध राजा पृथ्वीराज चौहान को भारतेश्वर की उपाधि प्राप्त थी ।। यह भारतेश्वर कि उपाधि मिलना साधारण बात नही थी, यह उपाधि पृथ्वीराज चौहान तृतीय की शक्ति तथा बुद्धिमता को दर्शाता है, उनके पास विशाल सेना थी ।
प्राचीन प्रशस्तियो से ज्ञात होता है कि राजा एक निश्चित समय तक ही शाशन कर सकता था, एक निश्चित आयु तक राज करने के बाद उन्हें महल छोड़ वानप्रस्थ की ओर प्रस्थान करना होता ।
चौहान साम्राज्य इतना महान् साम्राज्य था की चौहानों के शाशन से पूर्व राजाओ की तुलना देवताओ से की जाती थी --
लेकिन इतिहास में यह प्रथम बार हुआ --
" की देवताओ की तुलना चौहान राजाओ से होने लगी "
यह महान चौहान साम्राज्य था ।।
निश्चित रूप से चौहान राजाओ ने अपने त्याग, वीरता , शौर्य , दया , उदारता के बल पर जनता के ह्रदय में इतना सम्मान बना लिया कि साधारण जनता ने चौहान राजाओ को ही " परमेश्वर " मान लिया ।।
चौहान शाशन में राजा के उत्तरदायित्व --
राजा का उत्तरदायित्व था कि अपनी प्रजा से वह वैसा ही व्यवहार करें, जैसा व्यवहार वह अपने पुत्रों-पुत्रियों से करता है ।। जिस प्रकार एक पिता अपने पुत्र का भरण पोषण तथा रक्षा करता है, उसी प्रकार चौहान राज्य में नियम था, की राजा अपनी प्रजा का भरण पोषण तथा रक्षा करेगा ।
प्रत्येक परिस्थिति में चौहान राजा को अपनी प्रजा तथा उनकी संपति की रक्षा करनी होती थी ।
चौहान शाशन में राजा वेतन लेकर जनता की सेवा करता था, तथा आमजनता के लिए राजा के दर्शन सहज थे । चौहान शाशन की मान्यता थी, की जिस राज्य में राजा के दर्शन दुर्लभ हो जाए, वह न् केवल जनता के कोप का शिकार होता था, बल्कि उसका पतन भी शुरू हो जाता है । राजा को जनता के ट्रस्टी के रूप में देखा जाता था । चौहानो के कानून के अनुसार नियम था, की राजा अपने आप को केवल एक वेतनभोगी सेवक माने, ओर जनता की सेवा करें ।।
" एक बार एक बहुत सुंदर महिला ने राजा को आने वश में कर लिया, तथा जनता पर पूर्ण नियंत्रण की मांग कर दी ।। तब राजा ने जवाब दिया, की देवी , में इस जनता का मालिक नही हूँ, यह जनता मेरी मालिक है, में केवल उनका मालिक हूँ, जो कानून तोड़ते है , में उनका स्वामित्व तुम्हे कैसे दे सकता हूँ, जब में स्वयं जनता का दास हूँ । इसलिए में जनता का शाशन तुम्हे देने में असमर्थ हूँ "
चौहान शाशन में तीन विभाग राजा के पास थे -
1 - कार्यकारिणी
2 - न्यायपालिका
3 - सैनिक कर्तव्य
व्यवस्था संबंधी अधिकार मंत्रियों के पास थे, मंत्री ब्राह्मण से लेकर शुद्र सभी होते थे, सामाजिक व्यवस्था का काम इन्ही मंत्रियों पर होता था । आज सामाजिक भेदभाव या अन्य सामाजिक समश्याओ के लिए राजाओ को दोष नही दिया जा सकता, यह अधिकार तो राजा के पास था ही नही, तो फिर इस अव्यवस्था के लिए राजा के साथ सम्पूर्ण समाज भी जिम्मेदार था ।।
चौहान आने नैतिक मूल्यों के लिए इतने विख्यात थे, की चौहान राजाओ के अनुसार,
" अगर राज्य पर आक्रमण हो रहा हो, नरसंघार हो रहा हो, ओर सैनिक मर रहे हो, अगर इस स्तिथि में राजा युद्ध नही करता, स्वयं रण में नही उतरेगा, तो उसका सारा गौरव अंधकार की गहरी खाई में डूब जाएगा ।। युद्ध मे राजा को ही सेना का संचालन करना होगा, ओर युद्धकाल में सर्वोच्च् सेनापति भी राजा ही बनेगा "
क्रमशः
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