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इतिहास की दो वीर #क्षत्राणिया राजपूतानिया☝



#इतिहास की दो वीर #क्षत्राणिया राजपूतानिया☝
   ...... दोनो का नाम रानी #दुर्गावती था। एक वो जो जबलपुर के राजा दलपतशाह से ब्याही थी और दूसरी जो रायसेन के तोमर राजा सिल्हादी से ब्याही थी।

        पहली रानी दुर्गावती (जबलपुर) का विवरण तो इतिहास में आसानी से मिल जाता है और लोग याद भी करते हैं जो अकबर के विरुद्ध बहादुरी से लड़ते हुए 24 जून, 1564 को वीरगति को प्राप्त हुई।

            दूसरी रानी दुर्गावती (रायसेन, MP) के बारे में कम ही लोग जानते है, क्योंकि शायद इतिहासकरो ने षडयंत्र-वश इनके बलिदान को भुला दिया। रानी सती दुर्गवाती का संबंध भी उसी राजवंश से था, जिससे महारानी पद्मावती थीं। वह मेवाड़ के महाराजा राणा सांगा की बेटी थीं और उनका विवाह रायसेन के तोमर राजा सिल्हादी से हुआ था। 6 मई, 1532 को रानी दुर्गवाती ने 700 राजपुतनियो के साथ जौहर किया। इसकी चर्चा फिर कभी करूँगी फिलहाल आज मैं आपको जबलपुर की रानी दुर्गवाती के बारे में बताऊंगी जिनका आज बलिदान दिवस है।

            पढ़ कर गौरवान्वित होइए कि हमारे हिन्दू समाज में ऐसी ऐसी वीरांगनाएँ थी जिनकी वीरता की गाथा सुनके आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। अपनी उन तमाम लिबरल आधुनिक माताओ, बहनों और बेटियों से आग्रह करूँगी की इन्हें पढ़े और मंथन करे, क्या किसी और धर्म में महिलाओं के ऐसे शौर्य और पराक्रम का वर्णन मिलता है???
.... नही ना??? ...... तो अपने संस्कृति पर गर्व करिये और जड़ो से जुड़िये , शाख़ से टूट हुए पत्ते सड़ कर मिट्टी में मिल जाते है।

शौर्य और पराक्रम की देवी “महारानी दुर्गावती” (जबलपुर)

             महारानी दुर्गावती कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल की एकमात्र संतान थीं। महोबा के राठ गांव में 1524 ई0 की दुर्गाष्टमी पर जन्म के कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया। नाम के अनुरूप ही तेज, साहस और शौर्य के कारण इनकी प्रसिद्धि सब ओर फैल गयी।
        उनका विवाह गढ़ मंडला के प्रतापी राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपतशाह से हुआ। 52 गढ़ तथा 35,000 गांवों वाले गोंड साम्राज्य का क्षेत्रफल67,500 वर्गमील था। यद्यपि दुर्गावती के मायके और ससुराल पक्ष की जाति भिन्न थी। फिर भी दुर्गावती की प्रसिद्धि से प्रभावित होकर राजा संग्राम शाह ने उसे अपनी पुत्रवधू बना लिया।
पर दुर्भाग्यवश विवाह के चार वर्ष बाद ही राजा दलपतशाह का निधन हो गया। उस समय दुर्गावती की गोद में तीन वर्षीय नारायण ही था। अतः रानी ने स्वयं ही गढ़मंडला का शासन संभाल लिया। उन्होंने अनेक मंदिर,मठ, कुएं, बावड़ी तथा धर्मशालाएं बनवाईं। वर्तमान जबलपुर उनके राज्य का केन्द्र था। उन्होंने अपनी दासी के नाम पर चेरीताल, अपने नाम पर रानीताल तथा अपने विश्वस्त दीवान आधारसिंह के नाम पर आधारताल बनवाया।
           रानी दुर्गावती का यह सुखी और सम्पन्न राज्य उनके देवर सहित कई लोगों की आंखों में चुभ रहा था। मालवा के मुसलमान शासक बाजबहादुर ने कई बार हमला किया; पर हर बार वह पराजित हुआ। मुगल शासक अकबर भी राज्य को जीतकर रानी को अपने हरम में डालना चाहता था।
             उसने विवाद प्रारम्भ करने हेतु रानी के प्रिय सफेद हाथी (सरमन) और उनके विश्वस्त वजीर आधारसिंह को भेंट के रूप में अपने पास भेजने को कहा। रानी ने यह मांग ठुकरा दी। इस पर अकबर ने अपने एक रिश्तेदार आसफ खां के नेतृत्व में सेनाएं भेज दीं। आसफ खां गोंडवाना के उत्तर में कड़ा मानकपुर का सूबेदार था।
          एक बार तो आसफ खां पराजित हुआ; पर अगली बार उसने दुगनी सेना और तैयारी के साथ हमला बोला। दुर्गावती के पास उस समय बहुत कम सैनिक थे। उन्होंने जबलपुर के पास नरई नाले के किनारे मोर्चा लगाया तथा स्वयं पुरुष वेश में युद्ध का नेतृत्व किया। इस युद्ध में 3,000 मुगल सैनिक मारे गये। रानी की भी अपार क्षति हुई। रानी उसी दिन अंतिम निर्णय कर लेना चाहती थीं। अतः भागती हुई मुगल सेना का पीछा करते हुए वे उस दुर्गम क्षेत्र से बाहर निकल गयीं। तब तक रात घिर आयी। वर्षा होने से नाले में पानी भी भर गया।
अगले दिन 24 जून, 1564 को मुगल सेना ने फिर हमला बोला। आज रानी का पक्ष दुर्बल था। अतः रानी ने अपने पुत्र नारायण को सुरक्षित स्थान पर भेज दिया। तभी एक तीर उनकी भुजा में लगा। रानी ने उसे निकाल फेंका। दूसरे तीर ने उनकी आंख को बेध दिया। रानी ने इसे भी निकाला; पर उसकी नोक आंख में ही रह गयी। तभी तीसरा तीर उनकी गर्दन में आकर धंस गया।
रानी ने अंत समय निकट जानकर वजीर आधारसिंह से आग्रह किया कि वह अपनी तलवार से उनकी गर्दन काट दे; पर वह इसके लिए तैयार नहीं हुआ। अतः रानी अपनी कटार स्वयं ही अपने सीने में भोंककर आत्म बलिदान के पथ पर बढ़ गयीं। गढ़मंडला की इस जीत से अकबर को प्रचुर धन की प्राप्ति हुई। उसका ढहता हुआ साम्राज्य फिर से जम गया। इस धन से उसने सेना एकत्र कर अगले तीन वर्ष में चित्तौड़ को भी जीता।
जबलपुर के पास जहां यह ऐतिहासिक युद्ध हुआ था, वहां रानी की समाधि बनी है। देशप्रेमी वहां जाकर अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।

भारत वर्ष की महान राजपूत वीरांगना शत शत नमन🙏

https://www.rajputland.in/
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