Skip to main content

श्री रामचन्द्र ओर क्षात्रधर्म


#श्री_रामचन्द्र_ओर_क्षात्रधर्म

राजा दशरथ अपने चारों पुत्रो को अपनी चार भुजाएं मानते थे, किन्तु श्री राम से उन्हें विशेष अनुराग था, क्यो की श्री राम ब्रह्मा के समान प्राणियों में बढ़कर अति गुणवान थे ।

स ही देवेरूदीर्णस्य रावणस्य व्धार्थिभी
अर्थितो मानुषे लोके जज्ञे विष्णु: सनातनः

श्री राम के इतने गुणवान होने का कारण यह था, की वे स्वम् अविनाशी भगवान विष्णु के अवतार थे । जब रावण नाम के एक राक्षस के कारण सनातन संस्कृति और संकट आ खड़ा हुआ, तब देवताओ के अनुरोध पर रावण के विनाश के लिए भगवान विष्णु ने रामचन्द्र के रूप में अवतार लिया था। 

स ही वीर्योपपन्नश्व रूपवाननसूयक:
भुवावनुपम: सूनुर्गुणैर्दशरथोपमः ।।

श्री रामचन्द्र जी अत्यंत रूपवान, गुणवान, महावीर्यवान, निन्दरहित ओर उपमारहित राजपूत ( राजपुत्र ) थे। अर्थात उनके समान कोई दूसरा ना था । वे अपने पिता के समान ही गुणवान थे।

स तू नित्यम प्रशन्नात्मा मर्दुपूर्व च भाष्ते ।
उच्चभानोयपि परुषं नोत्तरं प्रतिपद्यते ।।

श्री राम सदा प्रसन्नचित रहने वाले, तथा सबसे कोमल वचन बोलने वाले थे । कोई कठोर वचन कहता भी तो उससे कोई कड़वी बात ना कहते ।

कथंचिदुपकारेण कृतनेकेन तुष्यति ।
न स्मरत्यपपकाराणां शतमप्यावत्तया ।।

कौई उनपर थोड़ा भी उपकार कर देता, तो वे उसे बहुत बड़ा मानते थे, ओर अपकार करने वालो को मन मे नही रखते थे, मतलब भूल जाते थे । उनका अपने मन पर इतना वश था ।

शीलवृद्बर्ज्ञानवृद्धैर्वयोवृद्धैश्व सज्जने: ।
कथनन्नास्त वै नित्यमस्त्रयोग्यान्तरेपवपि ।।

श्री राम को जब भी अस्त्र शस्त्र से अभ्यास मिलता, तब उनका अवकाशकाल सदाचारी, ज्ञानी, बूढ़े बुजर्गो तथा सज्जन लोगो के बीच बैठकर व्यतीत होता । उन्हें अच्छे लोगो की संगत ही अच्छी लगती थी, कुसंगति पसंद नही थी ।

बुद्धिमान्यमधुराभाषी पुर्वभाषी प्रियंवदं ।
वीर्यवान्न च वीर्येण महता स्वेन गर्वितः ।।

वे स्वम् बड़े बुद्धिमान, कोमल वचन बोलने वाले, पहले बोलने वाले, ओर प्रिय बोलने वाले थे । वे स्वम् वीर होकर भी वीरता के मत में चूर नही थे ।

💐 कितना निर्मल स्वभाव है श्री राम का, यहां देखिये दैनिक व्यवहार की ही कितनी सुंदर चीज़ रामायण के माध्यम से हमे सीखने को मिली है, श्री राम राजकुमार है, सुंदर है, उनमे सारे गुण भी है --- लेकिन खाली समय मे वे बूढ़े बुजर्गो तथा सन्तो के बीच बैठते है, इधर उधर तेरी मेरी करने में अपना समय व्यतीत नही करते । श्री राम वीर है, समर्थ है, लेकिन राह चलते का अभिवादन खुद आगे बढ़कर करते है । हमारे पास से हमारे मोहल्ले का आदमी निकल जाए, हम राम राम तक नही करते, समाज मे एकता कैसे आये ? शहर में एक ही काम्पलेक्स में रहने वाले लोग एक दूसरे को नही जानते, लेकिन श्री राम का स्वभाव देखिये, कितना सामाजिक है । हमे अपने घर के बुजर्गो के पास बैठे भगवान जाने कितना समय हो गया होगा, लेकिन श्री राम के अवकाश का समय इन्ही साधु, सन्तो ओर बुजर्गो में बीच व्यतीत होता था। 

न चानृतकथो विद्वान्वृद्धानां प्रतिपुजकः।
अनुरक्त प्रजाभिश्व प्रजाश्चाप्यनूरञ्जते ।।

श्री रामचन्द्र कभी मिथ्या भाषण नही करते थे । तथा विद्ववानों तथा वृद्धजनों का सदैव सम्मान करते थे । श्री रामचन्द्र अपनी प्रजा में पूरे लोकप्रिय थे ।

अब जो व्यक्ति सबके हालचाल पूछेगा, सन्तो बुढो का सम्मान करेगा । सदैव मीठा बोलेगा, ओर अन्याय का विरोध हो रहा हो, वहां भी वह वीरो को तरह आगे रहता हो, उसकी समाज मे क्या प्रतिस्ठा होगी ? यह बहुत ही सुंदर संदेश समाज निर्माण के लिए रामायण और श्री राम के चरित्र से दिया गया है ।

सानूक्रोशो जितक्रोधो ब्राह्मणप्रतिपूजक: ।
दीनानुकम्पी धर्मज्ञो नित्य प्रग्रहवाञ्शुचिः।।

श्री राम का आपमे क्रोध पर पूर्ण नियंत्रण था । वे ब्राह्मणों तथा दीनों की सदैव सहायता करते । श्रीरामचन्द्र अपने स्वधर्म को जानने वाले थे, तथा सदा पवित्र रहने वाले थे।

कुलोचितमतिः क्षात्रं धर्म स्वं बहु मन्यते ।
मन्यते परया कीतर्या महत्वस्वर्गफलं ततः ।।

दया, दान, शरणागति के साथ व्यव्हार इन सभी कर्व्यपालन मे श्रीराम पूरी तरह कुशल थे। वे प्रजापालन , समाज की व्यवस्था जैसे अनव कार्य क्षात्रधर्म को बहुत महत्व देते थे। उन्हें अपने राजपूत होने पर पूरा गर्व था, अपने क्षत्रिय धर्म को वे केवल कीर्तिप्राप्ति का ही नही, बल्कि स्वर्गप्राप्ति का भी साधन मानते थे ।

यहां रामायण से शिक्षा वर्णधर्म के पालन की है, जिस तरह श्री राम को अपनी जाति , अपने वर्ण पर गर्व था, वे अपनी जाति के कर्तव्यों को पूर्ण करना ही स्वर्गप्राप्ति का साधन मानते थे । कुछ ऐसे ही वचन गीता में श्री कृष्ण के है । वर्णधर्म को पूरा महत्व ठाकुर श्री राम, ओर ठाकुर श्री राम दोनो ने दिया है।

नाश्रेसी यतो विद्धानं विरुद्धकथारुचि ।
उतरोतर युक्तिनां वक्ता वाचस्पतिर्यथा ।।

ना तो थोथे कामो को करने में उनकी रुचि थी, ओर ना ही उन्हें फूहड़ बातें करना पसंद था, धर्मविरुद्ध बातें वे सहन नही कर पाते थे । वाद विवाद करते समय वे गुरु ब्रहस्पति की तरह अपने तर्क दिया करते थे। अर्थात श्री राम किसी काम को भी भली भांति, पूरी तरह सोचकर, समझकर, तथा उसके बारे में सारे पक्ष जानकर ही उस कार्य को करते । इसीलिए उनके तर्क उस विषय मे एकदम सॉलिड होते थे। 

श्री राम के बारे में बाल्मीकि रामायण में बड़ी ही सुंदरता से वर्णन किया गया है, ऐसा सुंदर वर्णन आपको अन्य किसी पुस्तक में नही मिल सकता । श्री राम व्यक्ति को देखकर ही उसके सारे हालात जान लेने वाले महात्मा थे, अर्थात महात्मा श्री राम स्वम् भी योगीराज ओर सिद्धपुरुष थे। 

श्री राम ने स्नातक तक शिक्षा ग्रहण की, इन वर्षों में वे वेदों तथा शास्त्रो के पूर्ण ज्ञाता बन चुके थे । और शस्त्र विद्या में तो श्री राम अपने पिता दसरथ से भी आगे थे। 

निभृतः संवृताकारो गुप्तमंत्र सहायवान ।
अमोघक्रोधहर्षश्च त्यागसंयमकालवित ।।

उनका स्वभाव बहुत नम्र था, उनके मन को कोई नही पढ़ सकता था । उनका क्रोध या हर्ष निष्फल नही जाता था । और कहां त्याग करना है, ओर कहाँ अधिकारपूर्वक लेना है, इसका भलीभांति ज्ञान श्री रामचन्द्र को था ।

https://www.rajputland.in/
#ҡรɦαƭ૨เყα_૨αʝρµƭ

Comments

Popular posts from this blog

सुर्यवंशी गहरवार वंश

#__सुर्यवंशी___गहरवार___वंश 👈🙏🚩 #_गहरवार_क्षत्रीय_वंश सुदूर अतीत में #__सूर्यवंशी राजा मनु से संबन्धित हैं। #_अक्ष्वाकु के बाद #__रामचन्द्र के पुत्र "#_लव' से उनके वंशजो की परंपरा आगे बढ़ाई गई है और इसी में काशी के गहरवार शाखा के कर्त्तृराज को जोड़ा गया है।          लव से कर्त्तृराज तक के उत्तराधिकारियों में गगनसेन, कनकसेन, प्रद्युम्न आदि के नाम महत्वपूर्ण हैं। कर्त्तृराज का गहरवार होना घटना के आधार पर हैं जिसमें काशी मे ऊपर ग्रहों की बुरी दशा के निवारणार्थ उसके प्रयत्नों में "#__ग्रहनिवार' संज्ञा से वह पुकारा जाने लगा था।    कालांतर "ग्रहनिवार' का अपभृंश गहरवार बन गया। बनारस के राजाओं की अनेक समय तक  #__सूर्यवंशी सूर्य-कुलावंतस काशीश्वर पुकारा जाता रहा है। इनकी परंपरा इस प्रकार है - कर्त्तृराज, महिराज, मूर्धराज, उदयराज, गरुड़सेन, समरसेन, आनंदसेन, करनसेन, कुमारसेन, मोहनसेन, राजसेन, काशीराज, श्यामदेव, प्रह्मलाददेव, हम्मीरदेव, आसकरन, अभयकरन, जैतकरन, सोहनपाल और करनपाल। करनपाल के तीन पुत्र थे - वीर, हेमकरण और अरिब्रह्म। करनपाल ने हेम...

क्षत्राणी

# क्षत्राणी मैंने उसको जब-जब देखा, लोहा देखा। लोहे जैसा तपते देखा, गलते देखा, ढलते देखा मैंने उसको गोली जैसा चलते देखा। # यह_ही_है_क्षत्राणी यथार्थ में देखा जाए तो क्षत्राणीयों का इतिहास व उनके क्रियाकलाप उतने प्रकाश में नहीं आए जितने क्षत्रियों के। क्षत्राणीयों के इतिहास पर विहंगम दृष्टि डालने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि क्षत्रिय का महान त्याग व तपस्या का इतिहास वास्तव में क्षत्राणीयों की देन है। राजा हिमवान की पुत्री  # गंगा  ने अपनी तपस्या के बल पर भगवान् श्रीनारायण के चरणों में स्थान पाया और भागीरथ की तपस्या से वे इस सृष्टि का कल्याण करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुई। उन्हीं की छोटी बहन  # पार्वती  ने अपनी तपस्या के बल पर भगवान् सदाशिव को पति के रूप में प्राप्त किया व दुष्टों का दलन करने वाले स्वामी कार्तिकेय और देवताओं में अग्रपूजा के अधिकारी गणेश जैसे पुत्रों की माता बनी। महाराजा गाधि की पुत्री व विश्वामित्र जी की बड़ी बहन  # सरस्वती  अपनी तपस्या के बल पर ही जलरूप में प्रवाहित होकर पवित्र सरस्वती नदी का रूप धारण कर सकीं। इसी प्रकार  # नर्मदा...

जय देव

# MUST_READ_AND_SHARE जय देव !  # धर्मवीर_बाबा_हासिल_देव_जी_की_जय_हो  !  # आज_बाबा_हासिल_देव_जी_की_जयंती_है  , बाबाजी को कोटि कोटि नमन ! जिस तरह जय सिंह खिंची चौहान जी , सिक्ख गुरु जी , बाबा बन्दा बहादुर जी और सम्भाजी महाराज के साथ बर्बरता करके शहीद किया गया था उसी तरह इस वीर राजपूत को शहीद किया गया था ! ये वो  # राजपूत_वीर  थे जिन्होंने शहादत देदी लेकिन सर नहीं झुकाया ! दिल्ली के बादशाह ने उन्हें तसीहें देकर शहीद कर दिया लेकिन बाबाजी बादशाह के आगे झुके नहीं ! राजा हमीर देव जम्वाल का बिक्रमी 1456 से लेकर 1483 तक जम्मू पर राज था ! उनके दो बेटे थे - अजैब देव और हासिल देव ! राजा हमीर के देहांत के बाद उनका बड़ा बेटा अजैब देव राजा बना और कुछ समय बाद राजा अजैब देव के छोटे भाई बाबा हासिल देव जी को जम्मू की रियासत का वज़ीर बना दिया गया ! राजा अजैब देव जी की बिक्रम सम्वत 1514 में मृत्यु हो गई ! राजा का बेटा कुंवर बीरम देव उस समय बोहत छोटे थे ! वज़ीर हासिल देव जी ने अपने भतीजे को पाला और साम्राज्य को चलाने में पूर्ण मदद की , और साफ सुथरे ढंग से राज्ये चलाना सिखाय...