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मित्र हो तो पृथ्वीराज चौहान जैसा


#मित्र_हो_तो_पृथ्वीराज_चौहान_जैसा

पृथ्वीराज चौहान जिस समय युद्ध मे व्यस्त नही होते थे, उस समय वे अपने मित्र और कवि "चंद " के साथ काव्य रचना करते ।

एक दिन चंद दरबार की ओर जा रहे थे, तो उनके पिता कल्हण में उनसे कहा " अब मेरी उम्र हो चली है पुत्र , मैं चाहता हूं, तुम्हारा विवाह हो जाये, तुम्हारा क्या विचार है ?

चंद ने शर्माते हुए अपने पिता से कहा, पिताजी अभी मेरी उम्र ही क्या है ? अभी तो हमारे महाराज ही कुंवारे है , पिताजी किशोरावस्था भी कोई विवाह की उम्र होती है ? हमे अभी खेलने कूदने दीजिये ।

तुम्हारी मर्जी पुत्र ! वैसे मेने एक बहुत सुंदर और शुशील कन्या तुम्हारे लिए देखी थी, इसलिए यह प्रस्ताव दिया। तुम ना चाहते हो, तो ना सही ...

अच्छा कौन है वह ? कवि चंद ने अपने पिता से पूछा ...

" अभी जब तुम्हे विवाह करना ही नही है, तो जानकर क्या करोगे ?? जाओ अभी तुम्हे मंदिर भी तो जाना है, देर हो रही होगी, महाराज भी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे होंगे । "

कवि चंद दरबार जाने से पूर्व रोज ज्वाला देवी के मंदिर में पूजा करने जाते थे ।

एक दिन चंद ने मंदिर जा रहे थे, तो कानो में देवी की स्तुति के मधुर गीत उनके कानों पर पड़े ... वह स्वर किसी स्त्री के कंठ से निकल रहे थे ।

चंद मंत्रमुग्ध होकर मंदिर की ओर बढ़ते रहे, मंदिर के पास जाकर उन्होंने देखा कि अत्यंत सादे वस्त्रों में एक युवती हाथ मे पूजा का थाल लेकर देवी की आराधना कर रही है । उसका मुख देवी की ओर था, तथा पीठ पर उसके काले रेशमी बाल नागिन की तरह झूल रहे थे । चंद मंत्रमुग्ध होकर भजन सुनता रहा, चंद को ख्याल ही नही रहा, की वह मंदिर में देवी की पूजा करने आया है । तभी सहसा चंद को ज्ञात हुआ कि जो भजन यह युवती गा रही है, यह तो स्वम् उन्होंने ही लिखा है, ओर इस मंदिर के बाहर इस भजन को उन्होंने गाया भी नही,फिर कैसे ???? चंद सवालों में उलझ गए ...

यही सब सोचता हुआ चंद आगे बढ़ा, इतने समय मे आरती भी पूर्ण हो गयी । युवती ने मा दुर्गा के चरणों मे अपना शीश नवाया, ओर जैसे ही थाली लेकर वह पीछे घूमी अपने सामने चंद को देखकर वह ठिठक गयी ।

चंद को लगा, जैसे उनके सामने साक्षात देवी प्रकट हो गयी है । ऐसा सोंदर्य चंद ने पहले कभी नही देखा था । पल तो पल नही, बल्कि कई पलो तक चंद उस युवती को निहारता रहा, चंद को देखकर वह युवती कुछ घबरा सी गयी, सहसा वह अपनी जगह से हिली ओर जाने के लिए आगे बढ़ी, तभी चंद ने अपना स्वर गंभीर किया और उस युवती से कहा ....

" रुको !!

वह चंद के आदेशात्मक स्वर को सुनकर रुक गयी, ओर धरती की ओर देखने लगी।

कौन हो तुम ?? चंद का स्वर पुनः वहां गुजरा ।

गौरी ... उस युवती ने धीरे से उत्तर दिया ...

गौरी ?? कौन गौरी ? कहाँ रहती हो ?? यहां कैसे आयी, इस मंदिर में तो किसी गैर का प्रवेश वर्जित है, किसकी बेटी हो तुम ??

युवती चंद के प्रश्नों से घबरा गई, ओर रोने लगी । मैं कोई चोर नही हूँ, जो इस तरह आप मुझसे सवाल कर रहे है । मेरे पिता इस मंदिर के पुजारी है । आज उनकी सेहत अच्छी नही थी , इसलिए में पूजा करने आ गयी ।

झूठ बोलती हो तुम ... मेने तो कभी तुम्हे पुजारी जी के साथ नही देखा ।

" नही देखा तो मैं क्या करूँ ? इस बार गौरी ने कुछ हेकड़ी से अपनी आंखें ऊपर की । मेने पिताजी से कहा भी था, में उस मंदिर में कभी नही जाऊंगी ।

" फिर यहां आयी क्यो ? उसका भोलापन देखकर चंद मन ही मन खुश हो रहा था ।

"पिताजी आज बीमार है, इसलिए में यहां आ गयी कहा तो सही मेने ... " !!!

तो भजन गाने के लिए भी पिताजी ने ही कहा होगा ?

" अब भजन गाने पर भी पाबंदी है क्या ? भगवान की पूजा तो कोई भी कर सकता है । ""

हां, कर सकता है, लेकिन यह देवी का मंदिर है, भगवान का नही । मन ही मन मुस्कुराते हुए चंद बोला ...

गौरी ने आंखे तरेरकर चंद की ओर देखा ओर कहा .... देवी भी भगवान ही होती है, इतना भी मालूम नही आपको ??

अब तक नही मालूम था, आज ही पता चला .. लेकिन भगवान चोरी के भजनों से खुश नही होते ।

चोरी का भजन !! भला चोरी के भजन से भगवान की पूजा कौन करता है ।? गौरी ने पूछा ...

तुम करती हो ...!!

मैं ??? मेने कब किसी का भजन चुराया ?

अभी जो भजन तुम गया रही थी, यह भजन मेने ही बनाया था, ओर इसे ही गाकर में देवी को प्रसन्न करता हूँ ।

ओर वो जैसे प्रसन्न हो जाती है ...?? गौरी ने कहा ..

, क्यो नही होती ?? होती तो है ... ओर लगता है, देवी तो मुझपर कुछ ज़्यादा ही प्रसन्न हो गयी है ।

इसी बीच पृथ्वीराज भी मंदिर की ओर आ रहे थे ...

इधर गौरी ने जवाब दिया . . भगवान आपसे अगर इस भजन पर प्रसन्न हो जाते, तो एक ही एक भजन आप रोज क्यो बनाते, भगवान को प्रसन्न करने के लिए नित- नए भजनों की रचना आप करते !!

पृथ्वीराज ने गौरी की यह बात सुन ली ... लेकिन वो बिना आवाज किये, चंद ओर गौरी की बातें सुनते रहे ।

चंद ने जवाब दिया ... वाह !! यह भी खूब रही ... नए नित भजनों की रचना करना मेरी रुचि है, लेकिन देवी को में इसी भजन से प्रसन्न करता हूँ, लेकिन अब तुमने कहा है, तो नित नए भजनों से देवी को प्रसन्न करूँगा ।

ठीक है ! तुम नित नए भजन बनाना, ओर में उन्हें कंठस्थ करूंगी, क्यो की भजन चोरी करना मेरी रुचि है । गौरी चंद की ओर जीभ निकालकर उन्हें चिढ़ा कर तेजी से मंदिर से बाहर की ओर चली गयी । गौरी को अपनी ओर आता देख पृथ्वीराज भी दीवार की ओट लेकर खड़े हो गए, ओर इसी बीच चंद भी मंदिर से निकलकर राजदरबार की ओर चले गए ।

दरबार मे जब पृथ्वीराज की भेंट चंद से हुई तो पृथ्वी उन्हें देख मुस्कुराएं ... सब ठीक है न मित्र ??

कुछ भी ठीक नही है पृथ्वी !! तुम अभी मेरे साथ एकांत में चलो मुझे तुमसे कुछ जरूरी बात करनी है ।

क्या हुआ चंद ?? पृथ्वीराज फिर मुस्कुराएं ...

तुम चलो मेरे साथ .. अब जो बातें होंगी एकांत में ही होगी ।

आखेट के लिए चले ? वहां एकांत रहेगा ..

नही !! वहां तुम्हारे साथ पूरा ताम-झाम रहेगा ।

कोई नही चलेगा, सिर्फ तुम ओर में चलेंगे ..

उस दिन दरबार नही लगा, दोनो मित्र तेजी से वन की ओर रवाना हो गए । सभी सैनिक हैरान हो गए, आज पृथ्वीराज अकेले ? कहीं कोई दुर्घटना ना हो जाये, अब जितने मुँह, उतनी बातें ...

दोनो वन पहुंच गए, तथा एक सुंदर सरोवर के किनारे अपने अश्वो को रोक दिया । " यहां कोई नही है, अब अपनी बात कहो .... यहां एकांत ही एकांत है । पृथ्वीराज ने चंद से कहा ..

चंद नव अनने सीने पर हाथ रखा, ओर कहा, कुछ समय सांस तो लेने दो .... इतनी बड़ी बात, ऐसे कही नही जाती ...

लगता है, कविराज को प्रेम हो गया है । पृथ्वीराज ने चंद की ओर मुस्कुरा कर देखा ..

अरे !! तुमने कैसे जाना .. चंद ने दोनो आंखे फाड़कर पृथ्वीराज की ओर देखा ..

तो मेरा अनुमान सही है ... पृथ्वी ने चंद की आंखों में झांककर देखा । क्यो ?? गलत तो नही न में ?

नही !! एकदम ठीक पहचाना तुमने मित्र !!

नाम क्या है उसका ? पृथ्वीराज ने पूछा ..

पहले तुम यह बताओ, की तुम्हे कैसे ज्ञात हुआ, की मुझे प्रेम हो गया ?

चंद तुम्हारी आंखे बता रही है, की कविराज कहीं आंख लड़ा बैठे है । वर्ना मुझे इतनी दूर एकांत में तुम कभी ना लाते । एकांत तो महल में भी मिल सकता था, लेकिन वहां यह वातावरण नही मिलता । प्रकृति की गौद में ही प्रेमियों के ह्रदय खिला करते है । जहां उनकी कल्पनाएं उड़ान भरती है , ओर आहें भरने के लिए इससे अच्छी जगह ओर कौनसी हो सकती है ??

आह !! सही कहा तुमने मित्र ...

अच्छा अब जल्दी से उसका नाम बताओ, कहाँ रहती है वो ? मुझे नही दिखाओगे ?

कैसी बात करते हो पृथ्वी , मित्र को नही दिखाऊंगा, तो किसे दिखाऊंगा ?? लेकिन डरता हूँ, कहीं वह तुम्हारी नजरो में चढ़ गई तो ??

" अगर ऐसी ही बात है, तो में जरूर उसे तुमसे छीन लूंगा । आखिर हम राजा है यहां के !!

इसी बात से तक मैं डर रहा हूँ । वह है ही ऐसी, की उसे देखकर कोई भी पागल हो जाता है ।

है राम !! फिर तो मुझे मत ही दिखाओ मित्र, अगर में पागल हो गया, तो यहां राजपाठ कौन करेगा ??

हां !! यह बात भी है ... चंद ने बड़ी मायूसी के साथ पृथ्वी की ओर देखा ...

दोनो मित्रो की आंख मिली, ओर दोनो जोर से ठहाका मारकर हंसने लगे। हंसी रुकी तो शेर की दहाड़ सुनी। पृथ्वीराज ने तुरन्त अपनी तलवार म्यान से निकाल ली ।

चंद ने आगे बढ़कर तुरन्त पृथ्वी की बांह पकड़ ली, ओर कहा ... नही मित्र आज किसी का वध नही । यह शेर ओर शेरनी सरोवर में पानी पीने आये है । कितना सुंदर दृश्य है, वह जंगल का राजा है । एक राजा को दूसरे राजा के साथ सम्मानजनक व्यव्यहार करना चाहिए ...

पृथ्वी ने अपनी तलवार म्यान में डाल की ... ओर टकटकी लगाकर शेर शेरनी को पानी पीते देखने लगे, कुछ समय मे ही शेर, शेरनी दोनो वहां से चले गए ।

अहा !! कितना मनोरम दृश्य था चंद !! पृथ्वीराज के मुख से सहसा निकला.. " आज तुमने पृथ्वीराज को भी कवि ह्रदय बना दिया चंद ।

तुमने आज मुझे जिंदगी को दूसरे नजरिये से देखने को मजबूर कर दिया चन्दवरदाई । बचपन से मैने केवल रणखेतो में तलवारों की झंकार ही सुनी है ... केवल रक्त देखा है, यह फूल, बाग, सरोवर यह सब मेने जीवन मे कभी देखे ही नही "" पृथ्वीराज शांत होकर शिला पर बैठ गए ।

ह्म्म्म ... अचानक चंद ने पृथ्वी के बोले गए शब्दो को स्मरण किया , पृथ्वीराज ने उसे चंद नही चंदबरदाई कहा था ...

आज यह मेरे नाम के साथ बरदाई नाम ?? मैं समझा नही ...

शास्त्री जी की बेटी का नाम बरदाई है मित्र !! मंदिर में ही मेने तुम्हारी आंखे पढ़ ली थी, उसके बाद में पूजा कर सीधे शास्त्री जी के निवास स्थान गया था, जहां तुम्हारे लिए उस लड़की का हाथ मांग आया । उस लडक़ी को उसके पिता प्यार से गौरी कहते है, उसका नाम बरदाई है मित्र , ओर पहला शुभ मुहूर्त देखकर तुम्हारा विवाह भी सुनिश्चित कर दिया है । आज से तुम चंदबरदाई हुए मित्र ....

चंद पृथ्वी को कुछ कह ही नही पाया ... केवल पृथ्वीराज को ह्रदय से लगा लिया ... कविराज चंद के पास भी आज शब्द नही थे, जिनसे वह पृथ्वीराज की महिमा का वर्णन कर सके । ओर पृथ्वीराज बिना चंद के बोले भी उनके मन की सारी बात पढ़ रहे थे ......

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