#महायोद्धा_अर्णोराज_चौहान
सिंध पर आक्रमण के बाद इस्लामी दीमक भारत मे लग चुकी थी, जो धीरे धीरे इस महान देश की सभ्यता और संस्कृति को निगलती जा रही थी, भारत की रक्षा का भार उस समय चौहान उठाने को तैयार थे, ऐसे ही एक वीर चौहान ने धरती पर जन्म लिया, जिसके तोड़ का योद्धा उस समय मिल पाना मुश्किल था , जिसके कारण चौहान वंश भारत पर राज करने लगा , वह वीर, जिसने अपनी तलवार की धार से मल्लेछो को इतना आतंकित कर दिया, की मुसलमानों ने कई वर्षो तक तक भारत पर आक्रमण करने का साहस नही किया ---
करेण चापस्य हरेर्मनीषा
बलेन मानस्य नयेन मंत्रिभी
स चाहमानोंयमिति प्रथाम ययो
पृथ्वीराज विजय के इन श्लोकों से ज्ञात होता है , पुष्कर तुरुष्क ( मल्लेछ उर्फ मातंग ) भय से पीड़ित था । मल्लेछो ने पवित्र स्थलों, यज्ञ कुंडों को अपवित्र तथा भर्स्ट कर दिया । इसलिए ब्रह्मा के आह्वाहन पर भगवान विष्णु ने जन्म लिया, विष्णुबल से युक्त वह व्यक्ति, हाथ मे धनुष लेकर चाहमान कहलाया, ओर इसी वंश में आगे चलकर वीर पृथ्वीराज चौहान का जन्म हुआ ।
चौहानो का एक ही कार्य था .. की वह शीघ्र से शीघ्र मल्लेछो का उपद्रव शांत करें । जैसा कि पृथ्वीराज विजय में कहा गया है :-
उपप्लवतद द्रुतमेव वार्यताम ( पृथ्वीराज विजय )
अर्थात वह मल्लेछो के उपद्रव को शीघ्र से शीघ्र शांत करें ।
चौहानो की एक शाखा शाकम्बरी प्रदेश में निवास करती थी, जो वर्तमान में राजस्थान के सीकर जिले में स्थित है । मरुभूमि की इन विकट परिस्थितियों ने चौहान राजाओ को कर्मठ बनाया था । क्यो की चौहानो से पूर्व यह भूमि, मरुजांगल या जांगल प्रदेश कहलाती थी । जिसका अर्थ जंगल से है। इन जंगलो के अधिपति चौहान बने थे, बाद में इन्ही जंगलो को भव्य इमारतों ओर जन-व्यवस्थाओ से स्वर्ग से सुंदर बना दिया गया था ।
हम्मीर महाकाव्य ओर पृथ्वीराज विजय के अनुसार चौहान वंश के गौरव को दसों दिशाओं में फैलाने वाले महाराज " वासुदेव चौहान " थे । हम्मीर विजय में वासुदेव को साक्षात कृष्ण का ही अवतार कहा गया है । पृथ्वीराज विजय में भी इसी बात का वर्णन है ।
इन्ही वासुदेव के वंश में एक ओर प्रतापी राजा सामन्त राज का जन्म हुआ । चौहानो के बिजोलिया लेखों में प्रथम नाम सामन्तराज का ही है । इन्हें ईसा की सातवीं शताब्दी का माना जाता है, , नागभट प्रतिहार प्रथम के सामन्त के रूप में इन्होंने व्यवस्था का कार्य संभाला था । सामन्तराज के बाद दुर्लभराज द्वितीय तक कोई इतिहासपुरुष राजा चौहानो में नही हुए । लेकिन उन्होंने जिस तरह चौहान साम्राज्य को बनाने में अपना सर्वस्व झोंक दिया था, उसकी प्रशंसा चौहानो के ग्रन्थो में अवश्य की गई है ।
अर्णोराज चौहान से चौहान राजपूत भारत की परमशक्ति के रूप में अपना स्थान बना चुके थे । अर्णोराज चौहान अजयराज चौहान के सुपुत्र थे । अजयराज वहीं प्रतापी राजा है , जिनके नाम पर आज का अजमेर नगर बसा हुआ है, इस नगरी का पुराना नाम अजयमेरु था ।पृथ्वीराज विजय से ज्ञात होता है, राजस्थान की ओर बढ़ते मुहम्मद गजनवी से भी अजयराज का सामना हुआ था, गजनवी चौहानो से भयाक्रांत होकर सिन्ध के रास्ते ही भाग खड़ा हुआ । उसके बाद अपने पुत्र अर्णोराज को राज्य सौंप अजयराज सन्यास लेकर तपस्या के लिए निकल गए ।
अर्णोराज चौहान का समयकाल 1133 ईस्वी से 1142 ईस्वी तक का था । पृथ्वीराज विजय के सर्ग 5 ओर श्लोक 193 में अर्णोराज की महिमा का वर्णन कुछ इस तरह किया गया है :-
अर्नोराजोथ सादाशिवंनिशमनुध्याय रूपं प्रसन्ना
दसमात्रेव जन्मनयतूलबलमिव प्राप्तपंचाननतम्व
सर्वोर्वीरपुंडरीकप्रगटविघटनोन्मत मातंगराज
त्रासायासावतार ब्यवासितमकरोत पुष्करक्षेत्रमेकम
अर्थात
कमलरूपी पृथ्वी को जब हाथी जितने शक्तिशाली मल्लेछ मुसलमान नष्ठ कर रहे थे, उसी संकट के समय भगवान शिव की कृपा से , अर्णोराज चौहान ने उन मातंगों ( हाथी जितने शक्तिशाली मुसलमान ) के लिए सिंह रूप धारण कर लिया ।
वास्तव में अर्णोराज चौहान का जन्म , चौहानो को विश्व शक्ति बनाने, तथा मुसलमानो के संघार के लिए ही हुआ था । उनके पिता अजयराज का संघर्ष लाहौर के गजनवी मल्लेछो से चल रहा था, लेकिन अर्णोराज के समय तक तो यह मल्लेछ पुष्कर के निकट तक पहुंच गए । मल्लेछो के आक्रमण की खबर सुनते ही, सारे चौहान युद्ध के लिए झटपट तैयार हुए । विदेशी आक्रमणकारी मुसलमानो को अजमेर नगर में घुसने ही नही दिया गया । वीर चौहान युद्ध का निमंत्रण पाते ही, यमराज की तरह स्वम् मल्लेछो के सामने जा खड़े हुए, ओर बड़ी बुरी तरह शत्रुओं को रौंद डाला, उन्हें काट डाला गया । लगभग सारे मल्लेछ चौहानो की दुधारी तलवार की भेंट चढ़ गए, कुछ जान बचाकर भागे भी, लेकिन अर्णोराज ने ऐसी व्यवस्था की , की इन भागते मल्लेछो को पानी की एक बूंद भी नसीब ना हो पाए, कुछ भागते मुस्लिम मरुभूमि की गर्मी और आंधियों की चपेट में आकर मर गए, कुछ थकान और प्यास से । बाकी सारे मुसलमानो को चौहानो ने काट डाला था । इस प्रकार तुर्को के भयँकर आक्रमण को अर्णोराज ने रोक लिया था । इस विजय के उपलक्ष्य में अर्णोराज ने अजमेर में महान उत्सव बनाया गया । इसी उत्सव में अर्नोसागर नाम की एक झील का निर्माण भी अर्णोराज ने करवाया ।
लेकिन चौहानो पर आक्रमण कर, मुसलमानो ने स्वम अपनी कब्र खोद ली । पृथ्वीराज विजय के अनुसार अर्णोराज ने सिंध ओर पंजाब तक धावा बोला, ओर वहां विजय प्राप्त कर, उदीच्यराट की उपाधि धारण की । अर्णोराज ने सभी मल्लेछो के ह्रदय में इतना भय भर दिया, की उनकी अब हिम्मत नही बची थी, की हिन्दुओ पर कोई भी आक्रमण वे कर सके ।। अर्णोराज के सिन्ध पर आक्रमण को पिशाचों पर आक्रमण कहा गया है । इस विजय के बाद अर्णोराज ने हरियाणा प्रदेश पर आक्रमण किया, जहां दिल्ली के तोमरवंशी राजा ढिल्लिका शाशन कर रहे थे । अर्णोराज ने उन्हें भी परास्त किया ।
बिजौलिया अभिलेखों में लिखा है, अर्णोराज ने बुलंदशहर पर आक्रमण कर, उसे भी अपने अधिकार में ले लिया था। अर्णोराज चौहान ने मालवा के नरवर्मन पर भी आक्रमण किया, तथा उंन्हे परास्त कर, उनके कई हाथियों को अपने अधिकार में ले लिया ।
अर्णोराज चौहान का अंतिम संघर्ष चालुक्यों के साथ रहा था । जयसिंह सिद्धराज ओर कुमारपाल अर्णोराज के समकालीन थे । प्राप्त स्रोत्रों से ज्ञात होता है, चालुक्यों के साथ हुए युद्ध मे अर्णोराज की पराजयः हुई थी । परन्तु चौहानो की शक्ति और उनके हठ को देखते हुए, जयसिंहः सिद्धराज ने दूरदर्शिता दिखाते हुए, अपनी पुत्री का विवाह अर्णोराज के साथ कर , इस शत्रुत्ता को मित्रता में बदल दिया । किंतु कुमारपाल के शाशन में यह युद्धविराम टूट गया, ओर चौहानो तथा चालुक्यों में दुबारा संघर्ष छिड़ गया । इस युद्ध मे अर्णोराज परास्त हुए । इस पराजयः के बाद अर्णोराज ज़्यादा समय तक जीवित नही रह सके, उन्ही के ज्येष्ठ पुत्र जगदेव ने उनकी हत्या कर दी ।
मात्र एक पराजयः को छोड़ दे, तो अर्णोराज एक महान विजेता थे । जिन्होंने मालवा के शक्तिशाली राजाओ सहित विदेशी मल्लेछ शक्ति तक को परास्त किया ।
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