#क्षत्रिय_महिलाएं_भी_वीरता_में_पुरषो_से_कम_नही
राजपूतो में स्त्रियों का बड़ा आदर होता है, ओर राजपूत स्त्रिया भी वीरपत्नी या वीरमाता कहलाने में खुद को गोरवान्वित महसूस करती थी !! उन वीरांगनाओं का पतिव्रत धर्म , शूरवीरता ओर साहस तो जगतविख्यात है । इसके ना जाने कितने असंख्य उदारहण इतिहास है मौजूद है ।
इसकी कुछ घटनाओ का जिक्र में करता हूँ, जब राजा दाहिर वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे, ओर कासिम ने सिंध पर अधिकार कर लिया, तो दाहिर का एक पुत्र डरकर बिना युद्ध किये भाग आया ! लेकिन दाहिर की पतबी कुछ हजार सैनिको के साथ मिलकर पहले तो कुछ समय लड़ी, लेकिन वाद में पराजय बिल्कुल नजदिग देखकर उन्होंने जोहर किया !!
महाराणा रायमल के पुत्र पृथ्वीराज की पत्नी का अपने पति के साथ जाकर पठानों से युद्ध करना तो जगत विख्यात है ।
रायसेन का राजा सलहदी तंवर जब बहादुरशाह गुजराती के साथ युद्ध मे हारकर जब मुसलमान हो गया , तो बहादुरशाह ने तोपों से उसके गढ़ पर हमला करना शुरू कर दिया ! तब मुसलमान बने उस पूर्व राजपूत ने कहा आप स्त्रियों और बच्चो को ना सताएं , में अंदर जाकर उन्हें समझाता हूँ, की वो इस्लाम ग्रहण करें !!
अंदर दुर्गावती उनकी पत्नी, जो राणा सांगा की पुत्री थी, उसने अपनी पति की बात सुनते ही उसे धिक्कारना शुरू किया !! " ऐसी निर्ज्जता से तो मर जाना ही अच्छा है, खुद हाथों में तलवार लेकर उसने अपने पति और उस मुसलमान अफसर का सिर धड़ से अलग कर दिया, जो साथ मे अंदर आया था, बाद में उस वीरांगना ने जोहर किया !! जोहर का पालन भी दुर्गावती ने कायरतापूर्वक प्राण त्यागकर नही किया था !! पहले 100 सगे संबंधियों के साथ वो मुसलमानो से खूब लड़ी ! हजारो मस्तक काट के जोहर की अग्नि में प्रवेश किया !!
मारवाड़ के राजा जसवंतसिंह जब ओरेंगेजब से युद्ध हारकर आये थे, तो उनकी पत्नियों ने अपने कक्ष का दरवाजा तक उनके लिए नही खोला था, उनका साफ कहना था, राजपूत स्त्रियां केवल " विजय या वीरगति " में ही विश्वास रखती है !!
रानी पद्मिनी ने भी कोई जोहर आसानी से हथियार डालकर नही किया था, रति के समान सुंदर उन कोमल कन्या ने 3 दिन तक खड्ग ढाल उठाकर कई मल्लेछो को मौत के घाट उतारा था !!
यह राजपूतो में पर्दे की प्रथा थी ही नही !! राजमहल में वो सिंहनी की भांति अपने पति के साथ बराबर में आकर बेठती थी ! यह प्रथा तो मुसलमानो की कुद्रष्टि उनपर नही पड़े , इसलिए चल पड़ी ! हिन्दुओ को चरित्र कभी इतना गिरा हुआ नही था, की स्त्रियां पर्दे के पीछे रहें !!
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