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रामभद्र प्रतिहार परिहार



#__रामभद्र__प्रतिहार_/_परिहार 🚩

मित्रों आज की यह पोस्ट लक्ष्मणवंशी प्रतिहार राजपूतों पर आधारित है। आज हम आपको प्रतिहार नरेश मिहिर भोज के पिता रामभद्र प्रतिहार के बारे मे जानकारी देगे।
नागभट्ट द्वितीय की मृत्यु 833 ईस्वीं में होने के पश्चात उसका पुत्र रामभद्र प्रतिहार राज्य का उतराधिकारी बना। मिहिरभोज के वराह लेख से ज्ञात होता है कि उसकी माता का नाम इष्टादेवी था। कुछ - कुछ स्थानों पर रामभद्र के लिए राम अथवा रामदेव भी कहा गया है।

               🚩 रामभद्र जैसा नाम वैसे ही गुणों से युक्त था। वह वीर, पराक्रमी, शत्रुओं को पराजित करने मे प्रशस्त तथा धर्मपरायण व्यक्ति था। ग्वालियर प्रशस्ति उसके गुणों की प्रशंसा करते हुए उल्लेख करती है कि जिस प्रकार अयोध्यापति राम ने धर्म की रक्षा की उसी प्रकार रामभद्र ने भी पापियों एवं क्रूर अत्याचारियों से धर्म की रक्षा की।

           [" तजजन्माराम नामा प्रवरहरिबलन्यस्त भूभृत प्रबन्धै।।
आवध्तन - वाहिनीनां प्रसभम अधिपतीन उदधृत क्रूर सत्वान।।
पाप - आचार - अन्तराय - प्रथमन रुचिर: संगत कीर्तिदारै:।।
त्राता धम्मॅस्य तैस - समुचित चरितै: पूर्ववन निव्वॆभासे।। 12 ।।
अर्थात -- " तब गुणी एवं चरित्रवान धर्मरक्षक राम भगवान राम की भांति हुआ जिसने श्रेष्ठ बंदरो की सहायता से निर्मित सेतुबंध द्वारा शक्तिशाली उदधृत और क्रूर जंतुओं से भरे हुए समुद्र को पार किया तथा राक्षस रुपी विघ्न का हनन करके अपनी पत्नी और कीर्ति को प्राप्त कर लिया तथा धर्म की रक्षा के कारण प्रकाशमय हुआ।।"
डाॅ के एम मुंशी ने भी ग्वालियर प्रशस्ति के आधार पर रामभद्र प्रतिहार को बहादुर, योग्य, पवित्रआत्मा, क्रूर लोगो का हनन करने वाला तथा धर्म की रक्षा करने वाला कहा है।

"Rambhadra Pratihar was brave and virtuous, Pure soil, opposed to worldliness and defender of faith "
दुर्भाग्य से रामभद्र प्रतिहार अधिक जीवित नही रहा केवल मात्र तीन वर्ष शासन करने के पश्चात उसकी मृत्यु हो गई।

(1) विद्रोहों का दमन - शक्तिशाली प्रतिहार नरेश नागभट्ट द्वितीय की मृत्यु के पश्चात प्रतिहार वंश के अनेक शत्रुओं ने साम्राज्य से विद्रोह कर अपने को स्वतंत्र करने का प्रयत्न किया, जिनका दमन रामभद्र ने बडी सफलता पूर्वक किया। उसके पिता नागभट्ट द्वितीय ने साम्राज्य की बडी सुदृढ़ नींव रखी थी, अतः रामभद्र को विद्रोहों को दबाने मे विशेष कठिनाई नही आई। उसके साम्राज्य के सेनापति जो कि मुख्य रूप से सामन्त राजा थे। जिन्होंने नागभट्ट द्वितीय के साम्राज्य विस्तार के समय अदभुत वीरता एवं कुशलता का परिचय दिया था, उन्होंने रामभद्र की आज्ञा से इन सभी क्रूर विद्रोह को कुचल दिया। ग्वालियर प्रशस्ति में उल्लेख मिलता है __
" अनन्य - साधन - अधीन - प्रताप - अक्रांत - दि रामुख: ।।
उपायैस सम्पदां स्वामी य: सव्रीडमउपास्यत ।। 13 ।।"
अर्थात - उसने (रामभद्र ने) जो कि ऐश्वर्यवान, सम्पदा का स्वामी था तथा प्रतापी था, केवल पराक्रम से अपने शत्रुओं को आक्रांत किया। वह अनंत शक्तियों (साम दाम दण्ड भेद) से संपन्न था।"
डाॅ त्रिपाठी ने भी अपने ग्रन्थ में लिखा है कि "रामभद्र के शासन काल में कोई विशेष संकट अवश्य उत्पन्न हुआ था, जिसमें उसके सामांतो ने दुष्ट पापाचारियों का वध किया था।"

(2) बंगाल के पाल शासक से युद्ध - रामभद्र के शासन काल में दुष्ट शत्रु बंगाल के पाल शासक हो सकते है अथवा राष्ट्रकूट हो सकते है। परंतु राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष प्रथम अपने आंतरिक संकटो एवं संघर्षों में उलझा हुआ था तथा अपने राज्य को बचाने में लगा हुआ होने के कारण उसके द्वारा किसी भी संकट की आशंका नही हो सकती। दूसरा शत्रु पाल नरेश देवपाल हो सकता है। देवपाल 810 ईस्वीं में पाल नरेश धर्मपाल का उतराधिकारी बना। यह संभावना हो सकती है कि उसने अपने पिता की पराजय का बदला लेने के लिए शक्ति संगठित कर नागभट्ट द्वितीय की मृत्यु के पश्चात प्रतिहार साम्राज्य पर आक्रमण किया हो। देवपाल भी एक शक्तिशाली शासक था। उसने अपने पराक्रम से अपने साम्राज्य को बहुत विस्तृत कर लिया था। बादल स्तम्भलेख के अनुसार पाल नरेश देवपाल ने प्रतिहारों पर विजय प्राप्त की थी। यह समय निश्चित रूप से रामभद्र के शासन काल का ही हो सकता है। चूँकि इस स्तंभ लेख मे प्रतिहार नरेश का नाम नही मिलता। इसलिए इतिहासकारों में मतैक्य नहीं है।
डॉ बी एन पुरी के अनुसार बादल अभिलेख में जिस नरेश की पराजय का उल्लेख मिलता है, वह रामभद्र प्रतिहार ही था।
डॉ रमाशंकर त्रिपाठी की बादल स्तम्भ लेख में पराजित नरेश मिहिर भोज था, रामभद्र नहीं।
डॉ आर सी मजूमदार का मत है, दूसरा प्रतिहार राजा भोज अपनी सफलताओं के बाद भी देवपाल से पराजित हुआ और अपने परिवार की ख्याति को तब तक सुरक्षित न रख सका, जब तक देवपाल जीवित रहा।
उस काल की परिस्थितियों का विश्लेषण करने पर यह सपष्ट हो जाता है कि पाल नरेश देवपाल ने प्रतिहार नरेश रामभद्र को ही पराजित कर अपने पिता धर्मपाल की पराजय का प्रतिशोध लिया था। परंतु वह अपनी विजय को अधिक समय तक संभालकर नहीं रख सका जैसा कि ग्वालियर प्रशस्ति श्लोक 12 व श्लोक 13 में सपष्ट उल्लेख है कि रामभद्र ने अपने सामंत राजाओं की सहायता से पाल नरेश को पराजित किया तथा अपने साम्राज्य को सुरक्षित रखा।
कुछ इतिहासकारों ने कालंजर मंडल एवं गुर्जरात्रा प्रदेष एवं ग्वालियर प्रदेश के प्रतिहार साम्राज्य से स्वतंत्र होने का उल्लेख किया है। इसकी पुष्टि में वराह अभिलेख के महाराज नागभट्ट देव के एवं दौलतपुर अभिलेख से महाराज वत्सदेव के दान के उल्लेख का वर्णन करते हुए कहा है कि रामभद्र प्रतिहार के शासन में इन दोनों की पुष्टि नहीं मिलती। परंतु यह कोई शक्तिशाली तथ्य नहीं है। क्योंकि रामभद्र प्रतिहार को केवल तीन वर्ष का ही शासन करने को मिला जिसमें उसने विद्रोहों का दमन किया जैसा कि ग्वालियर प्रशस्ति बताती है। इसलिए यह आवश्यक नहीं है कि अनय् बातों के लिए अवकाश मिला हो। ऐसा भी उल्लेख कहीं नही मिलता कि उपरोक्त क्षेत्रों में कोई विद्रोह हुए हों।
ग्वालियर में रामभद्र प्रतिहार द्वारा मनोनीत प्रशासक वैल्लभट्ट वहां शासन कर रहा था।
कालंजर मंडल के चंदेल एवं मण्डौर के प्रतिहार रामभद्र के समय भी अधीनस्थ सामन्त रहते हुए शासन कर रहे थे। अतः जब तक कोई मजबूत साक्ष्य नहीं हो तब तक ऐसा उललेख उचित नही कहा जा सकता।
वराह अभिलेख के अनुसार रामभद्र की मृत्यु विक्रम संवत 893 यानि 836 ईस्वीं में हुई।

जय जय माँ #__भवानी 
                       जय जय #__राजपूताना। 🦁🗡

https://www.rajputland.in/
#ҡรɦαƭ૨เყα_૨αʝρµƭ

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