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18october PROUD RAJPUT #PARIHAR #ROYAL #DYNASTY


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PARIHAR ROYAL KSHATRIYA PRINCELY STATE IN HIMACHAL.
                                       
(A)#KUMHARSAIN - RAJPUT PARIHAR http://www.indianrajputs.com/view/kumharsain. ((B)#KHANETI - RAJPUT PARIHAR http://www.indianrajputs.com/view/khaneti . (C)#KOTKHAI. - RAJPUT PARIHAR http://www.indianrajputs.com/view/kotkhai. (D)#DELATH - RAJPUT PARIHAR http://www.indianrajputs.com/view/delath. सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार अथवा परिहार वंश के क्षत्रिय थे। मनुस्मृति में प्रतिहार, प्रतीहार, परिहार तीनों शब्दों का प्रयोग हुआ हैं। परिहार एक तरह से क्षत्रिय शब्द का पर्यायवाची है। क्षत्रिय वंश की इस शाखा के मूल पुरूष भगवान राम के भाई लक्ष्मण माने जाते हैं। लक्ष्मण का उपनाम, प्रतिहार, होने के कारण उनके वंशज प्रतिहार, कालांतर में परिहार कहलाएं। कुछ जगहों पर इन्हें अग्निवंशी बताया गया है, पर ये मूलतः सूर्यवंशी हैं। पृथ्वीराज विजय, हरकेलि नाटक, ललित विग्रह नाटक, हम्मीर महाकाव्य पर्व (एक) मिहिर भोज की ग्वालियर प्रशस्ति में परिहार वंश को सूर्यवंशी ही लिखा गया है। लक्ष्मण के पुत्र अंगद जो कि कारापथ (राजस्थान एवं पंजाब) के शासक थे, उन्ही के वंशज परिहार है। इस वंश की 126वीं पीढ़ी में हरिश्चन्द्र का उल्लेख मिलता है। इनकी दूसरी क्षत्रिय पत्नी भद्रा से चार पुत्र थे। जिन्होंने कुछ धनसंचय और एक सेना का संगठन कर अपने पूर्वजों का राज्य माडव्यपुर को जीत लिया और मंडोर राज्य का निर्माण किया, जिसका राजा रज्जिल बना।इसी का पौत्र नागभट्ट था, जो अदम्य साहसी, महात्वाकांक्षी और असाधारण योद्धा था। इस वंश में आगे चलकर कक्कुक राजा हुआ, जिसका राज्य पश्चिम भारत में सबल रूप से उभरकर सामने आया। पर इस वंश में प्रथम उल्लेखनीय राजा नागभट्ट प्रथम है, जिसका राज्यकाल 730 से 756 माना जाता है। उसने जालौर को अपनी राजधानी बनाकर एक शक्तिशाली परिहार राज्य की नींव डाली। इसी समय अरबों ने सिंध प्रांत जीत लिया और मालवा और गुर्जर राज्यों पर आक्रमण कर दिया। नागभट्ट ने इन्हे सिर्फ रोका ही नहीं, इनके हाथ से सैंनधन, सुराष्ट्र, उज्जैन, मालवा भड़ौच आदि राज्यों को मुक्त करा लिया। 750 में अरबों ने पुनः संगठित होकर भारत पर हमला किया और भारत की पश्चिमी सीमा पर त्राहि-त्राहि मचा दी। लेकिन नागभट्ट कुद्ध्र होकर गया और तीन हजार से ऊपर डाकुओं को मौत के घाट उतार दिया जिससे देश ने राहत की सांस ली। इसके बाद इसका पौत्र वत्सराज (775 से 800) उल्लेखनीय है, जिसने परिहार साम्राज्य का विस्तार किया। उज्जैन के शासन भण्डि को पराजित कर उसे परिहार साम्राज्य की राजधानी बनाया।उस समय भारत में तीन महाशक्तियां अस्तित्व में थी। परिहार साम्राज्य-उज्जैन राजा वत्सराज, 2 पाल साम्राज्य-गौड़ बंगाल राजा धर्मपाल, 3 राष्ट्रकूट साम्राज्य-दक्षिण भारत राजा धु्रव। अंततः वत्सराज ने पाल धर्मपाल पर आक्रमण कर दिया और भयानक युद्ध में उसे पराजित कर अपनी अधीनता स्वीकार करने को विवश किया। लेकिन ई. 800 में धु्रव और धर्मपाल की संयुक्त सेना ने वत्सराज को पराजित कर दिया और उज्जैन एवं उसकी उपराजधानी कन्नौज पर पालों का अधिकार हो गया। लेकिन उसके पुत्र नागभट्ट द्वितीय ने उज्जैन को फिर बसाया। उसने कन्नौज पर आक्रमण उसे पालों से छीन लिया और कन्नौज को अपनी प्रमुख राजधानी बनाया। उसने 820 से 825-826 तक दस भयावाह युद्ध किए और संपूर्ण उत्तरी भारत पर अधिकार कर लिया। इसने यवनों, तुर्कों को भारत में पैर नहीं जमाने दिया। नागभट्ट का समय उत्तम शासन के लिए प्रसिद्ध है। इसने 120 जलाशयों का निर्माण कराया-लंबी सड़के बनवाई। अजमेर का सरोवर उसी की कृति है, जो आज पुष्कर तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। यहां तक कि पूर्व काल में राजपूत योद्धा पुष्पक सरोवर पर वीर पूजा के रूप में नाहड़ राय नागभट्ट की पूजा कर युद्ध के लिए प्रस्थान करते थे। उसकी उपाधि ‘‘परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर थी। नागभट्ट के पुत्र रामभद्र ने साम्राज्य सुरक्षित रखा। इनके पश्चात् इनका पुत्र इतिहास प्रसिद्ध मिहिर भोज साम्राट बना, जिसका शासनकाल 836 से 885 माना जाता है। सिंहासन पर बैठते ही भोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। भोज ने प्रतिहार साम्राज्य को धन, वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। अपने उत्कर्ष काल में उसे सम्राट मिहिर भोज की उपाधि मिली थी। अनेक काव्यों एवं इतिहास में उसे सम्राट भोज, भोजराज, वाराहवतार, परम भट्टारक, महाराजाधिराज आदि विशेषणों से वर्णित किया गया है।

इतने विशाल और विस्तृत साम्राज्य का प्रबंध अकेले सुदूर कन्नौज से कठिन हो रहा था। अस्तु भोज ने साम्राज्य को चार भागो में बांटकर चार उप राजधानियां बनाई। कन्नौज- मुख्य राजधानी, उज्जैन और मंडोर को उप राजधानियां तथा ग्वालियर को सह राजधानी बनाया। प्रतिहारों का नागभट्ट के समय से ही एक राज्यकुल संघ था, जिसमें कई राजपूत राजें शामिल थे। पर मिहिर भोज के समय बुदेलखण्ड और कांलिजर मण्डल पर चंदलों ने अधिकार जमा रखा था। भोज का प्रस्ताव था कि चंदेल भी राज्य संघ के सदस्य बने, जिससे सम्पूर्ण उत्तरी पश्चिमी भारत एक विशाल शिला के रूप में खड़ा हो जाए और यवन, तुर्क, हूण आदि शत्रुओं को भारत प्रवेश से पूरी तरह रोका जा सके। पर चंदेल इसके लिए तैयार नहीं हुए। अंततः मिहिर भोज ने कालिंजर पर आक्रमण कर दिया और इस क्षेत्र से चंदेलों को भगा दिया। मिहिर भोज परम देश भक्त था-उसने प्रण किया था कि उसके जीते जी कोई विदेशी शत्रु भारत भूमि को अपावन न कर पायेगा। इसके लिए उसने सबसे पहले राजपूताने पर आक्रमण कर उन राजाओं को ठीक किया जो कायरतावश यवनों को अपने राज्य में शरण लेने देते थे। इस प्रकार राजपूताना से कन्नौज तक एक शक्तिशाली राज्य के निर्माण का श्रेय मिहिर भोज को जाता है। मिहिर भोज के शासन काल में कन्नौज साम्राज्य की सीमा रमाशंकर त्रिपाठी की पुस्तक हिस्ट्री ऑफ कन्नौज, पेज 246 में, उत्तर पश्चिम् में सतलज नदी तक, उत्तर में हिमालय की तराई, पूर्व में बंगाल तक, दक्षिण पूर्व में बुंदेलखण्ड और वत्स राज्य तक, दक्षिण पश्चिम में सौराष्ट्र और राजपूतानें के अधिक भाग तक विस्तृत थी। सुलेमान तवारीखे अरब में लिखा है, कि भोज अरब लोगों का सभी अन्य राजाओं की अपेक्षा अधिक घोर शत्रु है। सुलेमान आगे यह भी लिखता है कि हिन्दोस्ता की सुगठित और विशालतम सेना भोज की थी-इसमें हजारों हाथी, हजारों घोड़े और हजारों रथ थे। भोज के राज्य में सोना और चांदी सड़कों पर विखरा था-किन्तु चोरी-डकैती का भय किसी को नहीं था। जरा हर्षवर्धन के राज्यकाल से तुलना करिए। हर्षवर्धन के राज्य में लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे,पर मिहिर भोज के राज्य में खुली जगहों में भी चोरी की आशंका नहीं रहती थी।

भोज का तृतीय अभियान पाल राजाओ के विरूद्ध हुआ। इस समय बंगाल में पाल वंश का शासक देवपाल था। वह वीर और यशस्वी था-उसने अचानक कालिंजर पर आक्रमण कर दिया और कालिंजर में तैनात भोज की सेना को परास्त कर किले पर कब्जा कर लिया। भोज ने खबर पाते ही देवपाल को सबक सिखाने का निश्चय किया। कन्नौज और ग्वालियर दोनों सेनाओं को इकट्ठा होने का आदेश दिया और चैत्र मास सन् 850 ई. में देवपाल पर आक्रमण कर दिया। इससे देवपाल की सेना न केवल पराजित होकर बुरी तरह भागी, बल्कि वह मारा भी गया। मिहिर भोज ने बिहार समेत सारा क्षेत्र कन्नौज में मिला लिया। भोज को पूर्व में उलझा देख पश्चिम भारत में पुनः उपद्रव और षड्यंत्र शुरू हो गये। इस अव्यवस्था का लाभ अरब डकैतों ने उठाया और वे सिंध पार पंजाब तक लूट पाट करने लगे। भोज ने अब इस ओर प्रयाण किया। उसने सबसे पहले पंजाब के उत्तरी भाग पर राज कर रहे थक्कियक को पराजित किया, उसका राज्य और 2000 घोड़े छीन लिए। इसके बाद गूजरावाला के विश्वासघाती सुल्तान अलखान को बंदी बनाया- उसके संरक्षण में पल रहे 3000 तुर्की और हूण डाकुओं को बंदी बनाकर खूंखार और हत्या के लिए अपराधी पाये गए पिशाचों को मृत्यु दण्ड दे दिया। तदनन्तर टक्क देश के शंकर वर्मा को हराकर सम्पूर्ण पश्चिमी भारत को कन्नौज साम्राज्य का अंग बना लिया। चतुर्थ अभियान में भोज ने परिहार राज्य के मूल राज्य मण्डोर की ओर ध्यान दिया। त्रर्वाण,बल्ल और माण्ड के राजाओं के सम्मिलित ससैन्य बल ने मण्डोर पर आक्रमण कर दिया। मण्डोर का राजा बाउक पराजित ही होने वाला था कि भोज ससैन्य सहायता के लिए पहुंच गया। उसने तीनों राजाओं को बंदी बना लिया और उनका राज्य कन्नौज में मिला लिया। इसी अभियान में उसने गुर्जरता, लाट, पर्वत आदि राज्यों को भी समाप्त कर साम्राज्य का अंग बना लिया।

भोज के शासन ग्रहण करने के पूर्व राष्ट्रकूटों ने मध्य भारत और राजस्थान को बहुत सा भाग दबा लिया था। राष्ट्रकूट सम्राट अमोघवर्ष, भोज को परास्त करने के लिए कटिबद्ध था। 778 में नर्मदा नदी के किनारे अवन्ति में राष्ट्रकूट सम्राट अमोधवर्ष और मान्यरखेट के राजा कृष्ण द्वितीय दोनो की सम्मिलित सेना ने भोज का सामना किया। यह अत्यन्त भयंकर युद्ध था। 22 दिनों के घोर संग्राम के बाद अमोघवर्ष पीछे हट गया। इतिहासकारों का मानना है कि छठी सदी में हर्षवर्धन के बाद उसके स्तर का पूरे राजपूत युग में कोई राजा नहीं हुआ। लेकिन यह सभी को पता है कि हर्षवर्धन का जब एक तरह से दक्षिण भारत के सम्राट पुलकेशिन द्वितीय से मुकाबला हुआ था तो हर्षवर्धन को पीछे हटना पड़ा था। भोज के समय में राष्ट्रकूट भी दक्षिण भारत के एक तरह से एकछत्र शासक थे। परन्तु यहां पर राष्ट्रकूट सम्राट अमोधवर्ष को पीछे हटना पड़ा। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि हर्षवर्धन और मिहिर भोज में श्रेष्ठ कौन?

स्कंद पुराण के वस्त्रापथ महात्म्य में लिखा है जिस प्रकार भगवान विष्णु ने वाराह रूप धारण कर हिरण्याक्ष आदि दुष्ट राक्षसों से पृथ्वी का उद्धार किया था, उसी प्रकार विष्णु के वंशज मिहिर भोज ने देशी आतताइयों, यवन तथा तुर्क राक्षसों को मार भगाया और भारत भूमि का संरक्षण किया- उसे इसीलिए युग ने आदि वाराह महाराजाधिराज की उपाधि से विभूषित किया था। वस्तुतः मिहिर भोज सिर्फ प्रतिहार वंश का ही नहीं वरन हर्षवर्धन के बाद और भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना के पूर्व पूरे राजपूत काल का सर्वाधिक प्रतिभाशाली सम्राट और चमकदार सितारा था। सुलेमान ने लिखा है-इस राजा के पास बहुत बडी सेना है और किसी दूसरे राजा के पास वैसी घुड़सवार सेना नहीं है। भारतवर्ष के राजाओं में उससे बढ़कर अरबों का कोई शत्रु नहीं है। उसके आदिवाराह विरूद्ध से ही प्रतीत होता है कि वाराहवतार की मातृभूमि को अरबों से मुक्त कराना अपना कर्तव्य समझता था। उसके साम्राज्य में वर्तमान उत्तर प्रदेश, मध्य भारत, ग्वालियर, मालवा, सौराष्ट्र राजस्थान बिहार, कलिंग शामिल था। यह हिमालय की तराई से लेकर बुदेलखण्ड तक तथा पूर्व में पाल राज्य से लेकर पश्चिम में गुजरात तक फैला था। अपनी महान राजनीतिक तथा सैनिक योजनाओं से उसने सदैव इस साम्राज्य की रक्षा की। भोज का शासनकाल पूरे मध्य युग में अद्धितीय माना जाता है। इस अवधि में देश का चतुर्मुखी विकास हुआ। साहित्य सृजन, शांति व्यवस्था स्थापत्य, शिल्प, व्यापार और शासन प्रबंध की दृष्टि से यह श्रेष्ठतम माना गया है। भयानक युद्धों के बीच किसान मस्ती से अपना खेत जोतता था, और वणिक अपनी विपणन मात्रा पर निश्चिंत चला जाता था। मिहिर भोज को गणतंत्र शासन पद्धति का जनक भी माना जाता है, उसने अपने साम्राज्य को आठ गणराज्यों में विभक्त कर दिया था। प्रत्येक राज्य का अधिपति राजा कहलाता था, जिसे आज के मुख्यमंत्री की तरह आंतरिक शासन व्यवस्था में पूरा अधिकार था। परिषद का प्रधान सम्राट होता था और शेष राजा मंत्री के रूप में कार्य करते थे। वह जितना वीर था, उतना ही दयाल भी था, घोर अपराध करने वालों को भी उसने कभी मृत्यदण्ड नहीं दिया, किन्तु दस्युओं, डकैतों, हूणो, तुर्कों अरबों, का देश का शत्रु मानने की उसकी धारणा स्पष्ट थी और इन्हे क्षमा करने की भूल कभी नहीं की और न ही इन्हें देश में घुसने ही दिया। उसने मध्य भारत को जहां चंबल के डाकुओं से मुक्त कराया, वही उत्तर, पश्चिमी भारत को विदेशियों से मुक्त कराया। सच्चाई यही है कि जब तक परिहार साम्राज्य मजबूत रहा, देश की स्वतंत्रता पर आंँच नहीं आई। पर जैसे ही यह कमजोर हुआ, तो पहले महमूद गजनवी के हमलों से देश को बुरी तरह लूटा गया तो बाद में पृथ्वीराज चौहान और जयचंद्र के समय में 12वीं सदी के अंत में देश में सचमुच के गुलामी की शुरूआत हो चली। मिहिरभोज की यह दूरदर्शिता ही थी कि उसने राज्यकुल संघ बना रखा था। वहीं शूरवीर और इतिहास का महान नायक कहे जाने वाला पृथ्वीराज चौहान बिना किसी ठोस वजह के सभी प्रमुख देशी राज्यों जैसे कन्नौज, गुजरात, कालिंजर से लड़ रहा था, जबकि मोहमम्द गौरी बराबर सीमा पर दस्तक दे रहा था। जिसका परिणाम था देश की गुलामीय सम्राट मिहिर भोज का साम्राज्य हर्षवर्धन के साम्राज्य से भी बड़ा था और यह महेन्द्रपाल और महिपाल के शासनकाल ई. सन् 931 तक कायम रहा। इस दौर में प्रतिहार राज्य की सीमाएं गुप्त साम्राज्य से भी ज्यादा बड़ी थी। इस साम्राज्य की तुलना पूर्व में मात्र मौर्य साम्राज्य और परवर्ती काल में मुगल साम्राज्य से ही की जा सकती है। वस्तुतः इतिहास का पुर्नमूल्यांकन कर यह बताने की जरूरत है कि उस पूर्व मध्यकाल दौर के हमारे महानायक सम्राट मिहिर भोज ही थे।

Post Credit : Kunwar Lokeshwer Singh Sen

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