#गाथा_वीर_चौहानों_की -- भाग - 6
आपने पिछली पोस्ट में पढ़ा, चौहान अब सामन्त से " महाराज " बन चुके थे, यह ऐतिहासिक कार्य महाप्रतापी राजा वाक्यतिराज ने किया ।
वाक्यतिराज के तीन पुत्र थे, विंध्यराज, सहराज एवं लक्ष्मण -- इन तीनो पुत्रो में सिंहराज वाक्यतिराज के सबसे योग्य पुत्र थे,
विंध्यराज तथा सहराज ने बहुत ही अल्प समय तक राज्य किया, ओर उनके तीसरे पुत्र लक्ष्मण ने नाडोल में चाहमानों की एक अलग शाखा स्थापित की ।। हर्ष चरित्र से यह ज्ञात होता है कि सिंहराज ने तोमर सेनापति सालवान को बंदी बना लिया था, ओर सिंहराज ने उसे तब तक मुक्त नही किया, जब तक खुद सम्राट उन्हें नही छुड़वाने आये, सेनापति तोमर राजवंश के परिवार का ही एक सदस्य था ।। जो शाशक राजकुमार रुद्र को छुड़वाने आये थे, वे रघुकुल वंश के थे -- अर्थात प्रतिहार राजा तोमर राजकुमार को छुड़वाने आएं थे ।
लगभग 10 वी सदी के आते आते प्रतिहार साम्राज्य की नींव ही हिल गयी थी, जब प्रतिहारो की इमारत ढ़ह रही थी, तो चौहान राजा सिंहराज ने उस जगह अपनी इमारत की नींव रखनी शुरू कर दी ।। प्रतिहार राजा का बन्दी को छुड़वाने आना साफ बतलाता है, की चौहानों का कद सिंहराज के समय तक कितना बढ़ चुका था । कन्नौज के ऑर्टिहरो के पतन के साथ ही शाकुंभरी के चौहानों की शक्ति बढ़ती जा रही थी ।।
हर्ष चरित्र में सिंहराज के विषय मे कहा गया है कि उसने अपनी वीरता से रघुकुल- भु- चक्रवर्ती , परमभट्टारक -महाराजधिराज-चक्रवर्ती - परमेश्वर आदि की उपाधियां धारण की ।। सिंहराज अपने पिता के समान ही बहुत प्रतापी राजा थे ।।
आठवी सदी से लेकर 10 वी सदी तक चौहानों ने बहुत स्वामिभक्ति के साथ प्रतिहारो की सेवा की थी, वे प्रतिहार राजाओ के लिए युद्ध करने के लिए सेना लेकर सदैव तैयार रहते थे ।। प्रतिहार साम्राज्य के विस्तार में भी चौहान सामंतों ने अपनी सेना सहित पूर्ण योगदान दिया था । किंतु दिन प्रतिदिन प्रतिहारो की घटती शक्ति और निकुंशता के कारण चौहानों ने अपनी शक्ति को बढ़ाना प्रारम्भ कर दिया ।।
चौहान राजा वाक्यतिराज राज ने सर्वप्रथम चौहानों को सामन्त से साम्राज्य तक की सोची, लेकिन वे इसमे पूर्ण रूप से सफल नही हुए, लेकिन आगे आने वाले चौहान राजाओ को सही राह दिखा दी ।। वाक्यतिराज के इस स्वपन को चौहान सिंहराज ने पूरा किया ।।
सिंहराज के बाद चौहान साम्राज्य का वास्तविक विस्तार शुरू हुआ , विग्रहराज चौहान द्वितीय पहला चौहान राजा था, जो प्रतिहारो से पूरी तरह मुक्त हो चुका था, विग्रहराज द्वितीय बहुत ही वीर तथा प्रतापी चाहमान शाशक था, विग्रहराज द्वितीय ने चौहानो के समस्त शत्रुओ को परास्त किया । विग्रहराज द्वितीय ने चालुक्य नरेश मूलराज को भी आत्मसमर्पण के लिए बाध्य किया ।। उसके बाद उसने भृगुकच्छ में आशापुरी देवी के मंदिर का निर्माण किया । हम्मीर महाकाव्य के अनुसार विग्रहराज ने चालुक्य नरेश मूलराज का वध करके उनके राज्य को चौहान साम्राज्य में मिला लिया ।।
पृथ्वीराज विजय में उल्लेख किया गया है कि चाहमान शासक विग्रहराज द्वितीय ने अपनी विशाल एवम शक्तिशाली सेना के साथ नर्मदा नदी तक अपनी विजय यात्रा निकाली ।। उस रास्ते मे आने वाले जिस राजा ने भी चौहानों का विरोध किया, विग्रहराज ने उन सभी को परास्त किया और आगे बढ़ गया ।। इस प्रकार विग्रहराज चौहान द्वितीय ने अपनी विजय पताका उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक फैलाई ।। दक्षिण में विग्रहराज ने आशापुरी माँ का बहुत ही भव्य मंदिर बनवाया था, आशापुरी देवी के मंदिर की सीढ़ियां नर्मदा नदी के तट को भी स्पर्श करती थी ।
विग्रहराज द्वितीय की अश्वसेना को इतना शक्तिशाली सेना कहा जाता है कि जब उसके घोड़े दौड़ते थे, तो सूर्य के प्रकाश को भी छिप जांना पड़ता था ।।
लेकिन् विग्रहराज का दूसरा चरित्र यह भी था, की वह बहुत ही धार्मिक तथा दयालु राजा था, उसने अपने शत्रुओं को भी गले से लगाया, जब वे उनकी शरण मे आएं । सुबुक्तगीन ने जब अफगानिस्तान के राजा जयपाल पर आक्रमण किया था, तब विग्रहराज ने अपनी सेना जयपाल की मदद के लिए भेजी थी ।।
चौहानों की अंधाधुंध विजय ओर साम्राज्यविस्तार की गाथा जारी है ...
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