मैनपुरी का नाम अमर करने वाले स्वत्रंत्रता के महानायक की कहानी – जयंती स्पेशल
यूँ तो मैनपुरी के इतिहास में कई महान राजा हुए हैं ! जिन्होंने चौहान वंश की परंपरा को सदैव गौरवशाली बनाये रखा !
पर महाराजा तेज सिंह वो नाम था जिन्होंने मैनपुरी का नाम स्वर्णिम अक्षरों में पूरे देश लिख दिया ! उनकी बहादुरी और त्याग को आज तक उनकी प्रजा नही भूला पाई है.
आइये जानते है कौन थे महाराजा तेज सिंह व उनका इतिहास !
मैनपुरी में चौहान वंश की स्थापना करीब 11वीं सदी में हो गयी थी . जब राजस्थान से चौहान वंश की एक शाखा ने मैनपुरी में आकर अपना राज्य स्थापित किया . और ये परम्परा निरन्तर सैकड़ो साल तक चलती रही और इसी वँश में सन 1834 में एक पुत्र का जन्म हुआ जिनका नाम रखा गया कुंवर तेज सिंह चौहान . कुंवर तेज सिंह बचपन से ही बड़े बहादुर और देश प्रेमी थी जैसे जैसे कुंवर तेज सिंह बड़े हो रहे थे बैसे बैसे ही उस दौर में अंग्रेजो के अत्याचार प्रजा के प्रति बढ़ रहे थे और इस बात की गमम्भीरता को कुंवर तेज सिंह बखूवी समझने लगे थे । सन 1951 जब कुंवर तेज सिंह करीब 17 वर्ष के हुए ही थे तभी उनके पिता श्री राजा नरपत सिंह की मृत्यु हो गयी और 17 वर्ष की उम्र में ही कुँवर तेज सिंह को मैनपुरी की गद्दी सभालनी पड़ी और यंही से तेज सिंह को उपाधि मिली मैनपुरी नरेश महाराज तेज सिंह (जूदेव) की ! अभी 17 बर्षीय महाराज तेज सिंह को अपने राज्य और राजनीति का थोड़ा अध्यन हो ही पाया था कि उधर 10 मई 1857 को मेरठ में स्वत्रंत्रता संग्राम की आग भड़क चुकी थी जिसकी खबर जैसे ही महाराजा तेज सिंह को लगी उनका खून खौल उठा और उन्होंने उसी बक्त मन मे प्रण किया कि यही सही मौका है अंग्रेजो को मुंह तोड़ जवाब देने का और मेरठ क्रांति के दो दिन बाद ही महाराजा तेज सिंह ने अंग्रेजो के खिलाफ विगुल फूंक दिया लेकिन महाराज तेज सिंह के चाचा राव भवानी सिंह इस बात से सहमत नही थे ..और उन्होंने महाराज तेज सिंह का साथ नही दिया ….
तत्कालीन अंग्रेजी कलेक्टर जेम्स पावर को जब तक कुछ समझ आता तब तक मैनपुरी नरेश महाराजा तेज सिंह व उनके सैनिकों ने अपनी तैयारी पूरी करली थी और 12 मई को जिले में स्थित अंग्रेजी सैनिकों और ठिकानों पर धावा बोल दिया ये खबर सुनकर जिले के कई जमींदार और युवाओ ने भी महाराजा तेज सिंह का साथ देने का निर्णय लिया. और महाराजा तेज सिंह ने अंग्रेजी ठिकानों पर हमला शुरू कर दिया इसी कड़ी में नेटिव इन्फ़्रेंटी के भारतीय जवानों ने भोगांव की तहसील लूट ली अब कई सामाजिक और सैनिक संगठन मगराजा तेज सिंह के साथ अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई शुरू कर चुके थे..जिंसने कई अंग्रेजी सैनिक मारे जा चुके थे जिले में अंग्रेजो के लगभग सभी ठिकानों पर महाराजा तेज सिंह के सैनिकों का कब्जा हो चुका था . 12 मई से 28 जून तक चले इस घमासान के बाद अंग्रेजो ने हार मान ली और भारतीयों का इतना जबरदस्त आक्रोश को देखते हुए तत्कालीन कलेक्टर जॉन पावर अपनी बची सेना के साथ जान बचाकर आगरा भाग गया . लेकिन कलेक्टरेट में रखे खजाने की सुरक्षा में लगे अफसर लारेंस व डेडोवन की मैनपुरी के सैनिकों ने हत्या कर दी और 30 जून को महाराजा तेज़ सिंह ने मैनपुरी को स्वत्रन्त्र राज्य होने की घोषणा कर दी इस साहसी आदेश के बाद मैनपुरी की जनता में महाराजा तेज सिंह के प्रति सम्मान और प्रेम और बढ़ गया था . आगरा – ग्वालियर – कानपुर के अंग्रेजी शासन और अधिकारियों के लिए मैनपुरी सबसे बड़ी समस्या बन चुका था उस समय मैनपुरी इस पूरे क्षेत्र अंग्रेजी सत्ता का सबसे बड़ा दुश्मन माना जाने लगा था . अगले 5 महीने लगातार संघर्षों से मैनपुरी स्वत्रंत्रता सेनानियो और देशभक्तों का बहुत बड़ा गढ़ बन चुका था .. करीब 5 महीने बाद दिसम्बर के महीने में एक सुनियोजित ढंग से आगरा – ग्वालियर – कानपुर की अंग्रेजी सेनाओं ने मिलकर बिर्गेडियर सीटन के नेतृत्व में मैनपुरी पर बहुत ही बड़ा हमला किया जिसका जवाब महाराजा तेज सिंह ने बखूवी दिया लेकिन अंग्रेजो की बन्दूको का मुकाबला मैनपुरी के भाला और तलवार वाले सैनिक कब तक करते घण्टो की लड़ाई के बाद कई अंग्रेजी सैनिकों के साथ मैनपुरी के सैकड़ो सैनिक व क्रानितकारी शहीद हो चुके थे।..और बचे हुए ग़मम्भीर हालात में थे . इसके बाद एक छोर से अंग्रेजो ने मैनपुरी किले पर चढ़ाई कर दी थी जिसे देखकर महाराजा तेज सिंह कुछ सैनिकों के साथ कुरावली होते हुए इटावा की तरफ रवाना हुए लेकिन वँहा उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया .और बनारस जेल भेज दिया गया जंहा उन्हें नजरबन्द रखा गया और वंही उनको सालों साल सजा के रूप में आगे भी नजरबन्द रखा गया लेकिन सन 1897 में उनकी बनारस में ही मृत्यु होगयी और भारत के महान स्वत्रंत्रता सेनानी का सूरज अस्त हुआ …मैनपुरी के ऐसे महान शासक और स्वत्रंत्रता सेनानी की बहादुरी और त्याग को पूरा देश हमेशा याद करता रहेगा….
आभार
राघवेंद्र सिंह राठौर
Ref – राजपूतों की वंशावली और इतिहास पेज – 655
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