काफी शोध के बाद ये पोस्ट लिखी गयी है, आप इस पर निसंदेह पूर्ण रूप से विश्वास कर सकते हैं
"पृथ्वीराज रासो की सच्चाई"
* यह ग्रन्थ चन्दबरदाई ने पृथ्वीराज चौहान के जीवन पर लिखा
* इस ग्रन्थ को सभी लोग सही मानते हैं, पर कई महान इतिहासकारों ने इसकी सच्चाई पर प्रश्न चिन्ह लगाए हैं
* मेवाड़ के सबसे प्रसिद्ध व ख्यातिप्राप्त वीरविनोद ग्रन्थ के लेखक कविराज श्यामलदास लिखते हैं "पृथ्वीराज रासो नाम के ग्रन्थ को किसी भाट ने 1583 ई. से 1613 ई. के बीच लिखकर मशहूर कर दिया | मैं नहीं जानता कि इस भाट ने किस मतलब से ये ग्रन्थ लिखकर राजपूताना की तवारीख को बर्बाद किया"
* अब यहाँ कुछ तर्क रखे जाते हैं, जिससे साबित होता है कि ये ग्रन्थ 16वीं सदी में लिखा गया -
1) चन्दबरदाई ने पृथ्वीराज चौहान के देहान्त का वर्ष 1101 ई. लिखा है, जबकि उनका देहान्त 1192 ई. में होना सभी जानते हैं | अब यदि कोई ये कहे कि चन्दबरदाई ने एेसा गलती से लिख दिया होगा, तो यह भी सम्भव नहीं है क्योंकि पृथ्वीराज रासो में संवत् वगैरह सब कुछ काव्य रुप में लिखा है |
(अब यदि चन्दबरदाई पृथ्वीराज चौहान का मित्र होता तो पृथ्वीराज चौहान के देहान्त की तारीख सही तारीख से 90 वर्ष पहले की नहीं लिखता)
2) इसी तरह पृथ्वीराज चौहान के जन्म का वर्ष चन्दबरदाई कुछ इस तरह बताता है -
"एकादस से पंचदह विक्रम साक अनन्द |
तिही रिपुपुर जय हरन को भे पृथिराज नरिन्द | |"
अर्थात् शुभ संवत् विक्रमी 1114 (1057 ई.) में राजा पृथ्वीराज अपने शत्रु का नगर अथवा देश लेने को उत्पन्न हुआ
3) पृथ्वीराज रासो के मुताबिक मेवाड़ के रावल समरसिंह भी पृथ्वीराज चौहान के साथ 1101 ई. में मारे गए
(इस बात में कोई सन्देह नहीं है कि रावल रतनसिंह रावल समरसिंह के पुत्र थे और रावल रतनसिंह 1302 ई. में राजगद्दी पर बैठे | रावल समरसिंह के देहान्त के 201 वर्ष बाद उनके पुत्र रत्नसिंह का मेवाड़ की गद्दी पर बैठना सम्भव नहीं)
4) पृथ्वीराज रासो में मेवाड़ के रावल समरसिंह का विवाह पृथ्वीराज चौहान की बहिन से होना लिखा है, जबकि रावल समरसिंह 1273 ई. में राजगद्दी पर बैठे, तो उनकी पुत्री का विवाह पृथ्वीराज चौहान से होना सम्भव नहीं है, क्योंकि पृथ्वीराज चौहान रावल समरसिंह से 100 वर्ष पहले के थे |
5) रावल रतनसिंह व रानी पद्मिनी के बारे में चन्दबरदाई ने लिखा है कि "अलाउद्दीन ने रावल रतनसिंह को पराजित किया | रानी पद्मिनी समेत कई औरतें कैद हुई व कैदखाने में मर गई"
सम्भव है कि रानी पद्मिनी के जौहर की बात चन्दबरदाई को मालूम न होगी, इसलिए इस बारे में उसका कोई दोष नहीं है, पर ये जौहर 1303 ई. होना तो जग जाहिर है, फिर 1192 ई. में मरने वाले चन्दबरदाई द्वारा इस घटना का हाल लिखना साबित करता है कि चन्दबरदाई पृथ्वीराज चौहान के ज़माने का नहीं था
6) पृथ्वीराज रासो में रावल रतनसिंह के बाद की तेरह पीढियों के बारे में भी लिखा गया है | चन्दबरदाई के अनुसार जब अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर हमला किया, तब रावल रतनसिंह समेत चित्तौड़ के कुल 13 राणा एक साथ मारे गए |
कोई भी सामान्य बुद्धि वाला व्यक्ति इस बात पर विश्वास नहीं करेगा, क्योंकि एक समय पर एक ही राणा हो सकता है और तेरह पीढियों का एक साथ मरना भी समझ से बाहर है
7) चन्दबरदाई व पृथ्वीराज रासो के बारे में एक भी प्रशस्ति 12वीं सदी की नहीं मिली है, जबकि पृथ्वीराज चौहान का आश्रित कवि जयानक का नाम उस समय से ही मशहूर था, जिसने पृथ्वीराज विजय नामक बेहतरीन ग्रन्थ लिखा |
8) चन्दबरदाई ने पृथ्वीराज चौहान द्वारा गुजरात के भीमदेव का वध करने की बात लिखी, जबकि एक प्रशस्ति के अनुसार 1199 ई. में भीमदेव ने भूमि दान की | इसका अर्थ यह हुआ कि पृथ्वीराज चौहान के देहान्त के 7 वर्ष बाद तक भीमदेव जीवित था |
9) विवाह वगैरह के खयाली किस्से -
> पृथ्वीराज चौहान का संयोगिता के साथ प्रेम-प्रसंग यदि कोई पृथ्वीराज रासो से पढे, तो शायद ही विश्वास कर पाए
चन्दबरदाई के अनुसार एक तोते द्वारा संदेशों के आदान-प्रदान से ये प्रेम प्रसंग चला
> पृथ्वीराज चौहान द्वारा एक अन्य रानी हंसावती से विवाह के बारे में चन्दबरदाई ने फिर उसी तोते द्वारा संदेशों के आदान-प्रदान की बात लिखी
> चन्दबरदाई के अनुसार एक हंस के कहने पर पृथ्वीराज चौहान ने देवगिरी के राजा की पुत्री पद्मावती से विवाह किया
> पृथ्वीराज रासो के अनुसार उज्जैन के राजा भीमदेव परमार की पुत्री इन्द्रावती से पृथ्वीराज चौहान का विवाह हुआ, जबकि उज्जैन के परमारों की वंशावली देखने पर मालूम हुआ कि वहाँ भीमदेव नाम का कोई राजा हुआ ही नहीं
10) पृथ्वीराज रासो के अनुसार जयचन्द गंगा में डूब मरा
जयचन्द की मृत्यु 1194 ई. में हुई थी, जबकि यदि चन्दबरदाई 1192 ई. में ही मर गया होता, तो वो ये बात नहीं लिख सकता
(जयचंद जी को गद्दारी का ऐसा प्रमाण पत्र दिया जा चुका है कि ये एक आइडल बन चुके हैं गद्दारी के। जो व्यक्ति स्वयं मुहम्मद गौरी की फौज से बहादुरी से लड़कर वीरगति को प्राप्त हुआ, उसे गद्दारी का मेडल देने वाले लोग होते कौन हैं)
11) चन्दबरदाई ने मुहम्मद गौरी के पिता का नाम विश्वविजेता सिकन्दर लिखा है, जो कि मुहम्मद गौरी से 1300 वर्ष पहले का था
असल में मुहम्मद गौरी अलाउद्दीन गौरी का बेटा था
12) चन्दबरदाई ने कभी फारसी तवारिखें नहीं पढी, जिस वजह से उसने मुहम्मद गौरी के सिपहसालारों के जो नाम लिखे हैं, वे सभी काल्पनिक हैं और हर एक नाम के पीछे "खां" लगा दिया, जो कुछ इस तरह हैं -
* खुरासान खां
* मूसन खां
* दादू खां
* सालम खां
* सकत खां
* हीरन खां
* ताजन खां
* हासन खां
* पीरोज खां
* अली खां
* ऊमर खां
* रेसन खां
* काइम खां
* देगन खां
* तोसन खां
* गजनी खां
* आलम खां
* ममरेज खां
* जलाल खां
* राजन खां
* जोसन खां
* ततार खां
* सोसन खां
* मुस्तफा खां
* पीरन खां
* मीरन खां
* जलू खां
* हाजी खां
* विराहम खां
* नवरोज खां
* सुरेम खां
* कोजक खां
* मोहबत खां
* मिरजा खां
* दोसन खां
* जलेब खां
* गाजी खां
* मीर खां
* एलची खां
* सहदी खां
* नगदी खां
* महदी खां
* लालन खां
* सेरन खां
* एरन खां
* समोसन खां
* गालिब खां
पढने से ही ये नाम खयाली मालूम पड़ते हैं | मुहम्मद गौरी के सिपहसालारों के कुछ असली नाम इस तरह हैं -
* अमीर हाज़िब हुसैन हवशी
* अमीर हाज़िब हुसैन अली गाज़ी
* मलिक ताजुद्दीन ज़ंगी बामियान
* मलिक हिमामुद्दीन अली किर्माज़
* मलिक ज़ियाउद्दीन
* मलिक ताजुद्दीन मकरान
* मलिक नासिरुद्दीन तमरान
* मलिक शहाबुद्दीन मादिनी
व अन्य
सबसे खास बात ये है कि चन्दबरदाई ने मुहम्मद गौरी के काज़ी का नाम "मदन" लिखा है, जबकि मुहम्मद गौरी का काज़ी "काज़ी ममालिक सद्र शहीद निजामुद्दीन अबूबक्र" था
13) पृथ्वीराज चौहान की मदद के लिए रावल समरसिंह दिल्ली पहुंचे
इस बारे में चन्दबरदाई रावल समरसिंह की तारीफ करते हुए लिखता है "दक्खनि साहि भंजन अलग्ग चन्देरी लिइ किय नाम जग्ग"
इन शब्दों से चन्दबरदाई का प्रयोजन मांडू के बादशाह से है, क्योंकि चन्देरी उन्हीं के कब्जे में थी और मांडू राजपूताना से दक्षिण की तरफ है और चन्देरी को राणा सांगा ने मांडू के बादशाह से लिया था |
चन्दबरदाई यह भी नहीं जानता था कि मांडू की बादशाहत की बुनियाद दिलावर गौरी ने 1403 ई. में कायम की थी |
चन्देरी राणा सांगा ने 1518 ई. में ली थी, इसलिए साफ जाहिर होता है कि इस ग्रन्थ को 1518 ई. के बाद लिखा गया |
14) पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज चौहान ने शब्दभेदी बाण चलाकर मुहम्मद गौरी का वध किया, जबकि पृथ्वीराज चौहान के देहान्त के 14 वर्ष बाद 1206 ई. में मुहम्मद गौरी दमयक गाँव में कक्खड़ों के हाथों मारा गया और ये बात उस ज़माने के लेखों में ज़ाहिर है
* सम्राट पृथ्वीराज चौहान का इतिहास गौरवशाली है, इस बात में कोई सन्देह नहीं है | पर चन्दबरदाई की लिखी हुई हर एक बात झूठी साबित होती है |
यदि पृथ्वीराज चौहान का सही इतिहास जानना है, तो पृथ्वीराज रासो की जगह जयानक के "पृथ्वीराज विजय" को आधार मानना होगा |
आज लोगों को पृथ्वीराज चौहान के बारे में जितनी जानकारी है, वे सिर्फ कहानियाँ हैं, न कि इतिहास |
इतिहास जानने के लिए सही ग्रन्थ पढना चाहिए, अन्यथा जीवनभर आप एक महान वीर की कहानियाँ ही सुनते रह जाएंगे और सही इतिहास से वंचित रह जाएंगे
पोस्ट लेखक :- "राजपूताना इतिहास और विरासत पेज टीम"
जय सम्राट पृथ्वीराज चौहान.....
जय राजपूताना......I
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